बाबूलाल गौर - जिनकी काली टोपी नेहरू जी ने भी नहीं उतरवाई !

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आज मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल जी गौर साहब के देवलोक गमन का समाचार पाकर मन व्यथित है | कुछ देखे, कुछ पढ़े, कुछ सुने ...



आज मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल जी गौर साहब के देवलोक गमन का समाचार पाकर मन व्यथित है | कुछ देखे, कुछ पढ़े, कुछ सुने प्रसंग आँखों के सामने चलचित्र की तरह आ रहे हैं | 29 जून 2002 को संयोग से मैं भोपाल में था | आपातकाल के बाद शिवपुरी में प्रचारक रहे श्री विजय जी शर्मा उन दिनों भोपाल भाजपा के संभागीय संगठन मंत्री थे | स्वाभाविक ही उनसे आत्मीय सम्बन्ध भी थे, तो मैं उनसे मिलने भाजपा कार्यालय पहुंचा | वे बैरागढ़ की मंडल बैठक में भाग लेने को निकल रहे थे, तो मुझे भी साथ ले लिया | उस मंडल बैठक में डेढ़ सौ दो सौ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति देखकर मैं हैरत में पड़ गया | स्थानीय विधायक के रूप में बाबूलाल जी गौर भी बैठक में उपस्थित थे | मेरी जिज्ञासा जानकर उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ मंडल बैठक में यह बंधन नहीं है कि केवल पदाधिकारी ही भाग लेंगे, मंडल में रहने वाले सभी कार्यकर्ता बैठक में आते है | मुझे समझ में आ गया कि क्यों बाबूलाल जी गौर साहब एक ही विधानसभा से लगातार जीतते आ रहे है | उसी दिन जो दूसरा द्रश्य देखा उसने तो मेरी धारणा और पुख्ता कर दी | बैठक के दौरान ही स्व. अटल जी के मंत्रीमंडल में श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को उप प्रधानमंत्री नियुक्त किये जाने का समाचार आया | स्वाभाविक ही कार्यकर्ता अत्यंत प्रफुल्लित हो गए | आनन फानन में एक सभा का आयोजन तय हो गया | सभा का नजारा तो अजब गजब ही था | भाषणों के बाद कार्यकर्ता खुशी में ढोल की थाप पर नाचने लगे | मैं हैरत से देख रहा था कि और तो और गौर साहब भी उनका पूरी सिद्दत से साथ दे रहे थे |

कार्यकर्ताओं की खुशी में उनके साथ थिरकने वाले, और उनके दुःख में दुखी होने वाले जन नायक थे बाबूलाल जी गौर | 

सन 1946 से आरएसएस के स्वयंसेवक, आपातकाल के दौरान सन 75 में 19 माह मीसाबंदी रहे बाबूलाल जी गौर के सामाजिक जीवन का प्रारम्भ संघर्ष के साथ ही हुआ | देश की आजादी के पहले भोपाल एक नबाबी रियासत थी | नबाब का शासन होने के कारण हिन्दुओं के हित में कोई कार्य करना बहुत ही कठिन था | किन्तु यहाँ संघ कार्य प्रारम्भ हुआ, और मजबूत भी हुआ | संघ कार्य के मजबूत होने में यहाँ की कपड़ा मिल का भी बहुत योगदान रहा | कपड़ा मिल में मुसलमानों की बहुतायत थी | २३०० मजदूर मुसलमान थे और मात्र ७०० हिन्दू | उन्ही दिनों रायपुर के दो स्वयंसेवक दादा देशपांडे और वसंत देशपांडे मिल में काम करने भोपाल आये | दादा देशपांडे पहले रायपुर में प्रचारक भी रह चुके थे | उन्होंने सुझाव दिया कि अपने स्वयंसेवकों की रोज शाखा हो इसलिए मिल में ही पाली के अनुसार शाखा लगाई जाए | इसके बाद प्रातः ७-३०, दोपहर ३-३० और रात्री ११-३० बजे शाखा लगाई जाने लगी | धीरे धीरे सभी मजदूर शाखा आने लगे | इस पाली शाखा से ही बाद में सर्व श्री माणिक चंद चौबे, नानूराम दादा, शिवचरण भैयन, मुकुंदीलाल आदि के साथ बाबूलाल जी गौर भी संघ के संपर्क में आये |

इस पाली शाखा के कारण भेल में संघ स्वयंसेवकों की धाक जमने लगी | संगठन की शक्ति के कारण आत्मविश्वास बढ़ा | बुरी आदतों के शिकार होने के कारण मजदूर आम तौर पर कर्ज में डूबे रहते थे | कुछ पठान इनको ऊंची व्याज पर कर्ज देते और पगार मिलने के दिन मिल के दरबाजे पर डंडे के दम पर बसूलते | उस दिन गेट पर दादाओं का जमघट लगा रहता था | इस कारण कई मजदूरों को वेतन से हाथ धोकर खाली हाथ लौटना पड़ता था | संघ के अधिकारियों ने मजदूरों की बुरी आदतें छुडाने और उन्हें कर्ज के बोझ से छुटकारा दिलाने के लिये कमर कसी | संघ के संस्कारों के कारण उनकी बुराईयाँ तो दूर हो ही रही थीं, उन्हें कर्ज के बोझ से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से एक बचत समिति गठित की गई | इस योजना के अंतर्गत पगार मिलने पर प्रत्येक मजदूर एक रुपया अपने खाते में जमा करबाता | माह के अंत में पर्ची डालकर जिस मजदूर का नाम निकलता, समिति उसका कर्जा चुका देती | इस प्रकार एक एक करके मजदूरों पर से कर्ज का बोझ घटने लगा | कर्ज उतरने के कारण पूरा वेतन उनके हाथ में आने लगा और उनके जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार होने लगा | श्री बाबूलाल गौर अत्यंत प्रामाणिकता से इस समिति का हिसाब रखते थे |

संघ के संपर्क के कारण इन लोगों में स्वाभिमान और संघ निष्ठा इतनी घर कर गई थी कि किसी से कोई भय या संकोच नहीं करते थे | नागपुर में इंटक का राष्ट्रीय अधिवेशन था | बाबूलाल जी गौर इंटक की स्टाफ असोसिएशन के अध्यक्ष के नाते उसमें भाग लेने गए थे | उस समय तक भारतीय मजदूर संघ अस्तित्व में नही आया था | सम्मेलन की कार्यवाही के दौरान वे संघ की काली टोपी लगाकर सबसे आगे बैठा करते थे | अधिवेशन को संबोधित करने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू भी आये थे | उनकी उपस्थिति में बाबूलाल जी को मंच पर जाना था | मंच की व्यवस्था देख रहे कार्यकर्ताओं ने बाबूलाल जी से कहा कि मंच पर नेहरू जी के सामने जाने से पहले यह टोपी उतार दो | किन्तु बाबूलाल जी ने टोपी उतारने से साफ़ इनकार कर दिया | नेहरू जी यह सब संवाद सुन रहे थे | उन्होंने बात को टालते हुए कहा कि 'टोपी नही उतारते तो रहने दो, टोपी से क्या होता है, काम तो इंटक में ही करते हैं' |

संघ स्वयंसेवक, लोकप्रिय राजनेता और सबसे बढ़कर एक अच्छे और सच्चे इंसान श्री बाबूलाल जी गौर साहब को सादर श्रद्धांजलि | ईश्वर उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें |

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बाबूलाल गौर - जिनकी काली टोपी नेहरू जी ने भी नहीं उतरवाई !
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