अग्नि के अविष्कारक ऋषि अथर्वन

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वेदों में ज्ञान-विज्ञान की बहुत सारी बातें भरी पड़ी हैं। आज का विज्ञान जो खोज रहा है वह पहले ही खोजा जा चुका है। बस फर्क इतना है कि आज क...


वेदों में ज्ञान-विज्ञान की बहुत सारी बातें भरी पड़ी हैं। आज का विज्ञान जो खोज रहा है वह पहले ही खोजा जा चुका है। बस फर्क इतना है कि आज का विज्ञान जो खोज रहा है उसे वह अपना आविष्कार बता रहा है और उस पर किसी पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों का लेबल लगा रहा है। हालांकि यह इतिहास सिद्ध है कि भारत का विज्ञान और धर्म अरब के रास्ते यूनान पहुंचा और यूनानियों ने इस ज्ञान के दम पर जो आविष्कार किए और सिद्धांत बनाए उससे आधुनिक विज्ञान को मदद मिली। आज हम बात करने जा रहे है ऋषि अथर्वन की जिन्होंने अग्नि का अविष्कार किया |

हर काल अपने साथ बहुत सी महान खोजें लेकर आया और उन्हीं महान खोजों में से एक आग का आविष्कार है। ये खोज कितनी महत्वपूर्ण थी, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज खाने को पकाकर खाना इसी आग के कारण संभव हो पाया है। अथर्वन् , जिनको अंगिरस् या अथर्वाङ्गिरस भी कहा जाता है, अग्नि के प्रथम आविष्कारक हैं । अगर मानव को सचमुच ही किसी आविष्कार पर गर्व हो सकता है, तो यह अग्नि का ही आविष्कार है । सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण इस आविष्कार का ठीक-ठीक मूल्यांकन आज कठिन है , जब अग्नि आज सर्वसाधारण हो चुकी है और उसे पैदा करने के हमारे साधन इतने आसान हैं । किन्तु जरा उन दिनों की बात सोचिए, जब इस धरती पर अग्नि का आविर्भाव नहीं हुआ था और जब प्रकाश और ऊष्मा केवल सूर्य से ही प्राप्त होती थी । अग्नि के पहले आविष्कर्त्ता के जीवन सम्बन्धी ब्योरे हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं । हम उसके कई नामों से परिचित हैं । इनमें अथर्वन् या अथर्वा उनका निजी नाम है और अग्नि का आविष्कर्त्ता होने के कारण उनका नाम अंगिरस् भी पड गया । उनके नाम पर अग्नि का मन्थन करने वालों की पूरी-की-पूरी जाति आंगिरस नाम से विख्यात हुई, जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद की विभिन्न ऋचाओं से हैं । अंगिरस अग्नि के अविष्कारक होने के कारण समाज में उच्च स्थान के अधिकारी थे और इन्हें समाज में सम्मान प्राप्त था | इन्ही अंगिरस कुल के एक ऋषि घोर-अंगिरस श्री कृष्ण के आचार्य थे | वेद मंत्रो से प्राप्त जानकारी के आधार पर अथर्वन प्रथम ऋषि हैं जिन्होंने अग्नि को मुख्यता लकड़ी पर मंथन अथवा रगड़ के द्वारा खोजा और एसा प्रतीत होता है की अंगिरस नाम से जाने वाली इस जाति ने अग्नि-मंथन के कार्य में महारथ प्राप्त कर ली थी और इसीलिए जलते हुवे कोयले का नाम अन्गिरसों के नाम पर अंगार पड़ा | वैदिक कथाओ के अनुसार अंगिरस न सिर्फ मंथन से अपितु पत्थरों के आपस में घर्षण से भी आग उत्पन्न करना जानते थे और इसीलिए वो हमेशा ही काष्ठ पर निर्भर नहीं थे अपितु परिस्तिथि अनुसार अन्य उपायों से भी आग जला सकते थे | वेदों , पुराणों व अनेक प्राचीन आख्यानो में अन्गिरसों से सम्बंधित रूपक कथाएं हैं जो उपरोक्त विधियों का वर्णन कराती है 


मन्थन या रगडकर आग सबसे पहले अथर्वा ने ही प्राप्त की थी

"पुरीष्योसि विश्वम्भराअथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्ने ।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत । मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ।।"
(यजुर्वेदः---11.32)
ग्रिफिथ ने इसका इस तरह अनुवाद किया---

"आप पुरीष्य (पशु-पोषक) हैं, विश्व भर के आश्रय हैं, अथर्वन् ने ही हे अग्ने ! सबसे पहले आपका मन्थन किया था, हे अग्ने ! अथर्वन् ने कमल से मन्थन करके पुरोहित विश्व के सिर से तुम्हारा आविर्भाव किया ।

आग की खोज से पहले मनुष्य असहाय थे । इस असहाय और निराश अवस्था के बीच यजुर्वेद की इस आशापूर्ण वाणी में किसी की ध्वनि गूँज उठी----

"स्वर्ग तुम्हारी पीठ पर है, धरती तुम्हारा आधार है, वायु तु्म्हारी आत्मा है और समुद्र तुम्हारी योनि है :----

"दद्यौस्ते पृष्ठं पृथिवी सधस्थमात्मान्तरिक्षं समुद्रो योनिः । 
विख्याय चक्षुषा त्वमसि तिष्ठ पृतन्यत ।।"

(यजुर्वेदः--11.20)

उसने यह सलाह सुनी । मनुष्य ने न केवल लकडी से आग का मन्थन किया, उसने उसे धरती से खोदकर, पत्थरों में से , वज्र (चकमक पत्थर) से भी निकाला ।

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