वृद्धावस्था की संवेदनाओं को स्पर्श करता उपन्यास "द स्काई गेट्स डार्क, स्लोली"

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ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते...  लेकिन मानना हममें से बहुतों को भी यह मानना गवारा नहीं होता !! :  न केवल वरिष्ठ नागरिकों के ...



ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते... 

लेकिन मानना हममें से बहुतों को भी यह मानना गवारा नहीं होता !! : 

न केवल वरिष्ठ नागरिकों के लिए बल्कि सभी के लिए अच्छा है कि वे समझ लें ... 

कि वृद्धावस्था एक वास्तविकता है, जिसे देरसबेर सभी को गले लगाने के लिए तैयार रहना चाहिए 

*The Sky Gets Dark, Slowly* 

माओ डुन साहित्यिक पुरस्कार विजेता झोउ डैक्सिन का नवीनतम उपन्यास, "द स्काई गेट्स डार्क, स्लोली", वृद्धावस्था की संवेदनाओं को स्पर्श करता है.... 

दुनिया में तेजी से बढ़ती हुई आबादी में बुजुर्गों की जटिल, भावनात्मक दुनिया को सामने लाता है। 

इसमें वे लिखते हैं... 

“कई बुजुर्ग बोलते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं, लेकिन सचाई यह है कि “बुड्ढे बच्चे एक समान” । वस्तुतः कई बुजुर्गों को तो उन स्थितियों परिस्थितियों की जानकारी ही नहीं होती, जिनका उन्हें सामना करना होता है ....एक बच्चे की तरह अनभिज्ञ ! 

अतः जैसे ही बुढापा आता है, तो उन्हें लगता है...मानो अँधेरा छा गया .... 

किन्तु यदि कुछ बातों को ध्यान में रखा जाए तो आप वृद्धावस्था का भी लुत्फ़ ले सकेंगे और घबराएंगे तो बिलकुल भी नहीं। 

(1) 

आपके सहयोगियों और साथियों की संख्या कम होती जायेगी । आपके माता-पिता और दादा-दादी की पीढ़ी के लोग तो शायद ही बचे हों, अगर होंगे भी तो उन बेचारों के लिए खुद की देखभाल करना ही मुश्किल होगी, आपकी क्या ख़ाक चिंता करेंगे । रहा सवाल युवा पीढ़ी का तो वह भी अपने आप के साथ व्यस्त और मस्त होंगे। यहां तक ​​कि आपकी पत्नी या पति भी हो सकता है आपसे पहले ही विदा ले लें, तो आने वाले दिन आपके लिए खालीपन के हो सकते हैं। आपको अकेले रहना और एकांत का आनंद लेना सीखना होगा। 

(2) 

समाज आपकी कम से कम देखभाल करेगा। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका पिछला कैरियर कितना शानदार था या आप कितने प्रसिद्ध थे, उम्र बढ़ने के साथ उनकी नजर में आप महज एक वृद्ध या वृद्धा भर हैं । अब आप केंद्र बिंदु नहीं रह सकते, और आपको एक कोने में चुपचाप खड़े होकर स्थितियों का मुकाबला करना सीखना होगा। अच्छा हो कि आप नई पीढी के कोलाहल और विचारों की प्रशंसा करना सीख लें, कमसेकम ईर्ष्या और आलोचना से तो बचना ही होगा। 

(3) 

आगे मार्ग ऊबड़खाबड़ और अनिश्चितता से भरा होगा । फ्रैक्चर, कार्डियो-संवहनी रुकावट, मस्तिष्क शोष, कैंसर ... ये सभी संभावित मेहमान हैं जो आपके पास किसी भी समय पधार सकते हैं, और आप उन्हें दूर भी नहीं कर पाएंगे। आपको बीमारी और बीमारियों के साथ रहना होगा, उन्हें दोस्तों के रूप में देखना होगा, अपने शरीर में कोई भी परेशानी आने पर पुराने स्वस्थ जीवन की याद कर दुखी न हों । बल्कि एक सकारात्मक मानसिकता बनाए रखना उचित होगा, पर्याप्त व्यायाम करना आपका कर्तव्य है, और आपको इसे लगातार बिना नागा नियमित करना होगा। 

(4) 

बिस्तर पर रहने को सदा तैयार रहें, स्वयं को नन्हा शिशु ही मानें । जब हम अपनी मां की गोद में आये थे, तो उन्होंने हमें बिस्तर पर ही तो रखा था, तमाम दुनियावी संघर्षों के बाद, जीवन यात्रा के समापन अवसर पर, हम अपने जिस शुरुआती बिंदु पर लौटते हैं – उसका नाम है बिस्तर – शरीर की देखभाल के लिए भी दूसरों पर मोहताज । फर्क सिर्फ इतना है कि बचपन में मां की ममतामई देखभाल थी, तो अब विदा की बेला में हो सकता है कि हमारी देखभाल हमारे परिजन न करें। अगर परिजन करेंगे भी, तो भी उनकी देखभाल माँ जैसी होना तो संभव ही नहीं है; अधिक संभावना तो इसी बात की है कि बेजार लोगों द्वारा ही आपकी देखभाल की जाएगी, जिनके चेहरे पर भले ही मुस्कुराहट हो पर दिल में ऊब ही होगी । शान्ति से लेटे रहो... किसी को परेशान मत करो; जो भी आपकी देखभाल कर रहे हैं, उनके प्रति सदैव आभारी रहो। 

(5) 

ठग और लुटेरे जानते हैं कि बुजुर्गों के पास बहुत सारी जमापूंजी हैं, वे धोखा देकर उसे हथियाना चाहेंगे: फर्जी फोन कॉल, टेक्स्ट मैसेज, मेल, फूड और प्रोडक्ट के सैंपल, गेट-रिच-क्विक स्कीम, दीर्घायु या उत्तम स्वास्थ्य के झूठे प्रोडक्ट्स की जानकारी… मूल रूप से, वे सभी चाहते हैं कि आपका धन कैसे हडपें । अतः सावधान रहें, ज्यादा से ज्यादा सावधान रहें, अपने संचित धन को अपने पास ही रखें और अपने पैसे बुद्धिमानी से खर्च करें। 

आकाश में अंधेरा छाने से पहले, संध्या काल में प्रकाश क्रमशः धुंधला और धुंधला होता जाता ही; स्वाभाविक रूप से जीवन के संध्या काल में भी आगे के मार्ग को देखना कठिन होगा, आगे बढ़ते रहना कठिन होगा। किन्तु ध्यान रहे कि हमारे यहाँ कहा गया है “साठा सो पाठा” । वस्तुतः हमारे पास जीवन क्या है इसे समझने का बहुत अच्छा अवसर है, हम उस अवसर का आनंद लें, और सामाजिक परेशानियों या अपने बच्चों - पोतों के मामलों को अपने सर पर ना लादें । अपनी उम्र के हिसाब से काम करें, क्षमता से अधिक करने की कोशिश आपको भी परेशानी देगी और आपके प्रियजनों को भी, विनम्र बने रहें – ध्यान रहे कि आपके कारण दूसरों को जितना दुख होगा, उतना ही खुद को भी नुकसान होगा। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, सभी को यह समझने में सक्षम होना चाहिए कि सम्मान क्या है और इसके क्या मायने हैं। जीवन के उत्तरार्ध में तो आपको यह समझना ही होगा कि इसका क्या मतलब है, मोह और आसक्ति को त्यागकर प्रकृति के प्रवाह में सानंद बहें, समभाव के साथ जियें। 



******* हम सब के लिए, यह एक अच्छा पाठ है, बहुत सुंदर, बहुत सच्चा ....! 

मुश्किल से अभी दिन शुरू ही हुआ था और ... शाम के छह बज गए। 

बमुश्किल सोमवार आया था और अभी से यह शुक्रवार आ गया। 

... और महीना भी लगभग खत्म हो चला। 

... अरे यह क्या, साल भी लगभग खत्म । 

... और देखते ही देखते हमारे जीवन के 50 या 60 या 70 साल बीत गए। 

... और हमारे सामने ही हमने अपने माता-पिता, दोस्तों को खो दिया । 

और यह भी हमें पता है कि अब वे दिन वापस नहीं आने वाले। 



तो ... आइए अब जो समय बचा है उसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश करें ... 

अपनी पसंदीदा गतिविधियों को देखना बंद न करें ... 

आइए जीवन में उल्लास के रंग भरें ... 

आइए जीवन की उन छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराएं जो हमारे दिलों में मरहम लगाती हैं। 



और अभी भी, हमें समय का आनंद लेना जारी रखना चाहिए। 

आइए "बाद में" शब्द को खत्म करने की कोशिश करें ... 

मैं इसे बाद में करूंगा... 

मैं बाद में कहूंगा ... 

मैं इसके बारे में बाद में सोचूंगा ... 

हम सब कुछ 'बाद' के लिए छोड़ देते हैं जैसे कि "बाद" हमारे कब्जे में रहेगा । 



हमें समझना होगा कि : 

बाद में, कॉफी ठंडी हो जाती है ... 

बाद में, प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं ... 

बाद में, आकर्षण समाप्त हो जाता है ... 

बाद में, स्वास्थ्य बिगड़ जाता है ... 

बाद में, बच्चे बड़े हो जाते हैं ... 

बाद में, माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं ... 

बाद में, वादे भूल जाते हैं ... 

बाद में , दिन - रात बन जाता है ... 

बाद में, जीवन समाप्त हो जाता है ... 

और इन सब “बाद में” के बाद हम पाते हैं कि अक्सर बहुत देर हो चुकी है ...। 



तो ... 'बाद में' के लिए कुछ भी नहीं छोड़ना ... 

क्योंकि हमेशा “बाद में” का इंतजार करने पर, हम सबसे अच्छे पल खो सकते हैं, 

सबसे अच्छा अनुभव, 

सबसे अच्छा दोस्त, 

सबसे अच्छा परिवार ... 

तो दिन “आज” है ... पल “अभी” है ... 



हम अब उस उम्र में नहीं हैं जहां हम कल पर टाल सकें, हमें जो करना है, अभी करना है । 



हो सकता है कि आप इसे “बाद में” पढ़ने को छोड़ दें ... 

और संभव है कि आप इसे किसी के साथ साझा भी नहीं करें ...। 

यहां तक ​​कि उन लोगों के साथ भी साझा न करें जो अभी तक "वरिष्ठ" नहीं हैं। 

कोई बात नहीं आप सदा स्वस्थ और प्रसन्न रहें ।

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क्रांतिदूत: वृद्धावस्था की संवेदनाओं को स्पर्श करता उपन्यास "द स्काई गेट्स डार्क, स्लोली"
वृद्धावस्था की संवेदनाओं को स्पर्श करता उपन्यास "द स्काई गेट्स डार्क, स्लोली"
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