क्रांतिदूत

राजस्थान के रोचक जातीय समीकरण और कालवी की करणी सेना !



जाट की बेटी, जाट की रोटी, जाट का नोट, जाट का वोट, केवल जाट को

राजस्थान में जातिवाद संभवतः भारत के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में अधिक है । राजपूत भले ही अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव पर इठलायें, किन्तु हकीकत यह है कि वे जातीय समीकरणों में राजस्थान के अन्य समाजों से पीछे हैं ।

राजस्थान की आबादी में सबसे अधिक हिस्सेदारी जाटों की है, जोकि लगभग 12 प्रतिशत, जबकि राजपूत लगभग 7 प्रतिशत ही हैं। अन्य प्रमुख समुदायों में गुर्जर, बिश्नोई, मीना, ब्राह्मण, मेघवाल, वैश्य और मुस्लिम शामिल हैं। राज्य की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति, किसी पहेली की तरह जटिल है और जातीय समीकरण समय के अनुसार बदलते रहते हैं ।

उदाहरण के लिए, बिश्नोई समुदाय की आस्था और विश्वास सभी वन्यजीवों की सुरक्षा है, जबकि राजपूत स्वभावतः जंगली जानवरों का शिकार करते हैं, अतः इन समुदायों में पारस्परिक विरोध का इतिहास है। जबकि बिश्नोई एक प्रकार से जाटों के प्राकृतिक सहयोगी रहते हैं।

दूसरी तरफ गुर्जर जातीय और ऐतिहासिक रूप से राजपूतों के करीब हैं। 7-8 शताब्दियों के दौरान, राजस्थान पर गुर्जर-प्रतिहार राजवंश का शासन था, जिसने सबसे पहले अरब आक्रमणकारियों का सामना किया और भारतीय उप-महाद्वीप पर उनके कई आक्रमणों को सफलतापूर्वक विफल भी किया । किन्तु 12 वीं शताब्दी आते आते, गुर्जर कमजोर हो गए, और मात्र पशुपालक के रूप में उनकी पहचान रह गई | जाति वर्गीकरण में भले ही उन्हें राजपूतों की तुलना में कम माना गया, किन्तु दोनों समुदायों ने घनिष्ठ संबंध बनाए रखे। उदाहरण के लिए, राजपूत राजपरिवारों में नवजात शिशु को स्तनपान कराने के लिए गुर्जर महिला को रखना एक आम बात थी | इसका मूल कारण यह मान्यता थी कि इससे युवा राजकुमार में गुर्जरों के उग्र गुण भी आयेंगे ।

जाट और गुर्जर दोनों समाजों की सामान्यतः मीनाओं के साथ अनबन रहती है, जो जो राजस्थान में अनुसूचित वर्ग की जनजाति हैं।

लेकिन सबसे रोचक और जटिल गठबंधन है जाट और राजपूतों का, जिनमें प्रतिद्वंद्विता और सहयोग, दोनों देखा जाता है। 

सामान्यतः राजस्थान की कुल २५ संसदीय सीटों और २०० विधानसभा सीटों में से एक तिहाई पर जाटों का प्रभाव माना जाता है | वर्तमान में उनके 40 विधायक हैं भी । किन्तु इतनी बड़ी संख्या होने के बाद भी राज्य में कभी कोई जाट मुख्यमंत्री नहीं बना। शायद इसी भावना का लाभ वसुंधरा राजे जी को मिलता रहा है, जो मूलतः तो महाराष्ट्रीयन मराठा हैं, किन्तु उनका विवाह धौलपुर के जाट राजपरिवार में हुआ है । अतः वे स्वयं को “जाट बहू” कहकर जाटों के साथ सहज भावनात्मक सम्बन्ध कायम कर लेती हैं | स्मरणीय है कि राजस्थान में केवल धौलपुर और भरतपुर में ही जाट राजा रहे हैं | उनका राजवंशी होना ही उन्हें राजपूत मान्यता भी दिलवाता है |

राजस्थान की इस जातीय प्रतिद्वंद्विता को मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर हुए सरकारी नौकरियों में आरक्षण ने एक हिंसक मोड़ दे दिया और राजस्थान एक नया युद्धक्षेत्र बन गया |

लंबे समय से चली आ रही मांग के चलते, 1999 में जैसे ही जाटों को राजस्थान में अन्य पिछड़े वर्ग का दर्जा दिया गया, बैसे ही जाट-राजपूत समुदायों में कड़वाहट घुल गई । चूंकि गुर्जर और मीना को तो पहले से ही आरक्षण प्राप्त था, अतः गौरवशाली अतीत वाले राजपूत समुदाय में अपने अस्तित्व को लेकर भय व्याप्त हो गया । 1952 के पहले विधानसभा में चुनाव में जहाँ कुल 160 विधानसभा सदस्यों में से ५४ राजपूत विधायक थे, जबकि 12 जाट चुने गए थे। किन्तु 1998 में जाट विधायकों की संख्या बढ़कर 42 हो गई, जबकि राजपूत आधे ही रह गए ।

इसे बड़ा मुद्दा बनाकर लोकेंद्र सिंह काल्वी ने बीजेपी को छोड़कर अपनी पार्टी - राजस्थान सामाजिक न्याय मंच की स्थापना की, और आर्थिक रूप से पिछड़े राजपूतों के लिए आरक्षण की मांग करने का फैसला किया। यह अलग बात है कि लोकेंद्र सिंह काल्वी की यह नई पार्टी शीघ्र ही धराशाई हो गई और कालवी बापस भाजपा में लौट आए | किन्तु इस आयाराम गयाराम की राजनीति से उनकी रही सही साख भी प्रभावित हुई ।

लेकिन राजस्थान की जातीय राजनीति ने जल्द ही उन्हें एक और अवसर प्रदान कर दिया । 2006 में, राबिनहुड जैसी ख्याति रखने वाले एक गिरोह के सरगना, आनंदपाल सिंह ने अपने दो पूर्व सहयोगियों की हत्या कर दी | संयोग से दोनों ही जाट थे। बस फिर क्या था ? पूरे प्रदेश में राजपूतों के खिलाफ जाटों के प्रदर्शनों की एक श्रृंखला चालू हो गई, जिसने प्रशासन को हिलाकर रख दिया। जाटों के दबाब में राज्य सरकार झुक गई और आनंदपाल सिंह गिरोह के साथ सम्बन्ध रखने के आरोप में कई राजपूत युवा गिरफ्तार हुए | गेंहू के साथ घुन भी पिसता है, स्वाभाविक ही कुछ निरपराध भी पीड़ित हुए । इससे राजपूतों में व्यापक असंतोष खदबदाने लगा, जो पहले से ही जाट, गुर्जर और मीनाओं को दिए गए जाति आधारित आरक्षण को शासन द्वारा किया जाने वाला सामाजिक उत्पीड़न मान रहे थे ।

राज्य उस समय अत्याधिक अशांत था | स्थिति भांपकर चतुर सुजान लोकेंद्र सिंह काल्वी ने राजपूत करनी सेना की स्थापना कर व्यवस्था के खिलाफ राजपूतों को एकजुट करने की पहल की और 23 सितंबर 2006 को, करनी सेना अस्तित्व में आई ।

संगठन ने सबसे पहले फिल्म जोधा अकबर को अपना निशाना बनाया और उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किये | दूसरा मुद्दा बना राजस्थान विश्वविद्यालय का अशांत परिसर, जो कि एक प्रकार से राजनैतिक दलों का रंगरूट भर्ती केंद्र रहता आया है । कहा जाता है कि कई मायनों में, विश्वविद्यालय ही पूरे प्रदेश पर राज्य करता है तथा यही राजस्थान की जाति आधारित राजनीति का केंद्र बिंदु है। राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रावास भी जाति आधारित हैं, जैसे कि राजपूत छात्रावास, जाट छात्रावास, गुर्जर हॉस्टल, मीना हॉस्टल, यादव हॉस्टल और मुस्लिम छात्रावास आदि आदि ।

2009 में, जाट और राजपूत छात्रों के बीच हुए कैंपस विवाद को तूल देकर, करनी सेना ने परिसर में जाट महासभा के विरुद्ध बड़ा अभियान चलाया और इस प्रकार राजपूत समर्थन जुटाया। आगे चलकर अगस्त 2016 में जब, जयपुर विकास प्राधिकरण ने जयपुर के कच्छवाहा राजपूत शाही परिवार के स्वामित्व वाले राजमहल पैलेस के द्वार बंद कर दिये, तब भी करनी सेना ने बड़े पैमाने पर राजपूतों के विरोध प्रदर्शन आयोजित किये और 'जाट बहू' वसुंधरा राजे की अगुवाई वाली सरकार की भूमिका को राजपूत समुदाय के उत्पीड़न के रूप में प्रचारित किया । अंततः अधिकारियों को झुकना पड़ा और इस विजय ने राजपूत समुदाय के भीतर करनी सेना की प्रतिष्ठा को और मजबूत किया | देखते ही देखते राजपूत हितों के रक्षक के रूप में लोकेंद्र सिंह काल्वी की छवि बनती गई ।

यह अलग बात है कि अराजकता ही लोकेंद्र सिंह कालवी की बुनियाद है, जबकि इससे आज तक उन्हें कोई विशेष लाभ भी नहीं मिला | इस बार पद्मावत को लेकर उनके द्वारा छेड़ा गया अभियान क्या उन्हें कोई राजनैतिक लाभ दिला पायेगा ? या यह पूरा तमाशा उनकी आतिशबाजी का अंतिम प्रदर्शन सिद्ध होगा ? इसका उत्तर तो आने वाला समय ही देगा । 

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