संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री अपारवल सिंह जी कुशवाह को श्रद्धांजलि

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26 जनवरी 2016 को भोपाल संघ कार्यालय पर झंडाबंदन का चित्र  आज संघ के वरिष्ठ प्रचारक पूज्य अपारबल सिंह जी के स्वर्गवास का हृदयद्रावक स...

26 जनवरी 2016 को भोपाल संघ कार्यालय पर झंडाबंदन का चित्र 

आज संघ के वरिष्ठ प्रचारक पूज्य अपारबल सिंह जी के स्वर्गवास का हृदयद्रावक समाचार मिला | लम्बी बीमारी के बाद आज जब उनसे अंतिम विदाई की घड़ी आ ही गई है, तब मन व्यथित है | मुझ जैसे अनेकों स्वयंसेवकों पर अविरल उनके स्नेह और अपनत्व की वर्षा जो होती रही थी | ईश्वर उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें | यूं तो उनका नाम अपरबल सिंह था, किन्तु पूज्य सुदर्शन जी ने एक बार सहज कहा, कि अपरबल का क्या अर्थ, नाम अपारबल होना चाहिए, तो तबसे हमारे ठाकुर साहब अपारबल हो गए | 

भाद्रपद मास के मध्य में ८ अगस्त १९३८ को लहार रोड पर भिंड से २० की.मी. दूर स्थित ग्राम लहरोली में अपारवल सिंह जी उपाख्य ठाकुर साहब का जन्म हुआ ! पिताजी चार भाई थे ! एक भाई अविवाहित तो दूसरे निसंतान ! दूसरे नंबर के अविवाहित चन्दन सिंह ही परिवार के मुखिया ! उन दिनों जागीरदारी प्रथा थी ! सो लगान बसूली करना, पंचायत में बैठना आदि जिम्मेदारियां चन्दन सिंह जी ही निभाते ! पिताजी सबसे छोटे और उनके भी चार लड़कों में सबसे छोटे हमारे ठाकुर साहब अपारवल सिंह जी ! चारों भाइयों की संताने हैं ! ६०-७० लोगों का भरापूरा परिवार ! बड़े भाई राम दुलारे सिंह जी लहरौली गाँव के सरपंच भी रह चुके हैं ! आज भी परिवार की जमीन नही बटी, मकान भी संयुक्त ही है ! भले ही काम धंधों के कारण अलग अलग शहरों में रहते हों, किन्तु सुख दुःख में सब एक राय से काम करते हैं ! 

१३ वर्ष की आयु में ही शादी के वन्धन में बंध गए ! पर शादी को कभी वन्धन नही बनने दिया ! इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि शादी के बाद ही बी.ए. किया ! बड़े भाई की इच्छा थी कि अपारवल सिंह जी पुलिस की नौकरी में जाएँ, किन्तु इनकी रूचि नही थी ! गाँव के प्राईवेट स्कूल में नारायण गुरू शासकीय सेवा छोडकर प्रधानाचार्य बने तो सन १९६० में अपारवल जी भी बहां अवैतनिक अध्यापक हो गए ! नारायण गुरू जब ट्रेनिंग में मुरैना गए तब श्री लज्जाराम तोमर स्कूल में वाईस प्रिंसीपल बनकर आये ! शाखा तो गाँव में सन ५५ से लगती थी किन्तु अपारवल सिंह जी को पहली बार लज्जाराम जी भिंड प्राथमिक वर्ग में आग्रह करके ले गए ! वर्ग के मुख्य शिक्षक रौन के रामपाल सिंह कुशवाह थे ! रामपाल सिंह जी १९४८ के प्रतिवंधकाल की जेल यात्रा के कारण शासकीय शिक्षक पद से हटा दिए गए थे ! उन्होंने बाद में मानिकचंद जी वाजपेयी मामाजी की प्रेरणा से एक मुद्रणालय स्थापित किया ! 

वर्ग से आने के बाद अपारवल जी भिंड तहसील कार्यवाह बने ! घर की कोई विशेष जिम्मेदारी ना होने के कारण सतत प्रवास करने में कोई दिक्कत नही थी ! १९६१ में दमोह से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग करने के बाद लहरौली की विद्यालय शाखा के मुख्य शिक्षक बने ! इस विद्यालय में बड़ी संख्या में आसपास के कई गाँवों के बच्चे पढने आते थे ! इस कारण यह शाखा स्कूल की छुट्टी के बाद लगाना शुरू किया ! इस शाखा के माध्यम से आसपास के १८ गाँवों में संघ का प्रवेश हुआ ! सन ६७ में तहसील विस्तारक भिंड बनाए गए तथा मुख्यालय भिंड रखा गया ! जिला प्रचारक गवारीकर जी की सादगी, स्वाभिमान तथा कर्मठता ने इन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया ! दोनों साथ साथ चान्ना होटल पर भोजन करते जहां चार आने की एक रोटी के साथ दाल फ्री मिलती थी ! इस कारण सस्ते में भोजन हो जाता ! गवारीकर जी का भोजन तो आठ आने में ही निबट जाता ! दो रोटी और चार कटोरी दाल में ही पेट भर जाता ! उन दिनों ईमानदारी की स्थिति यह थी कि तत्कालीन समाजवादी विधायक स्व. रघुवीरसिंह कुशवाह भी पैसे के अभाव में भोजन करने बहां आते थे ! इसी प्रकार जेठा टी शॉप पर चाय के साथ गप्प गोष्ठी होती ! चाय की स्थिति तो यह थी कि जब आपातकाल में कार्यालय से अपारवल जी गिरफ्तार किये गए तब बहां तलाशी में गवारीकर जी की डायरी मिली ! उसमें अधिकांशतः चाय के खर्चे लिखे हुए थे ! यह देखकर पुलिस अधिकारी ने पूछा कि कोई चाय का होटल चलाते थे क्या ? 

सन ७०-७१ में अपारवल जी को सह जिला प्रचारक मान्य किया गया ! उसी दौरान गवारीकर जी स्वास्थ्य कारणों से इंदौर गए तो पूरा दायित्व भार ठाकुर साहब पर ही आ गया ! तभी १९७२ में पत्नी के देहावसान ने मन को व्यथित तो किया किन्तु समाज के प्रति और अधिक दायित्व वोध प्रदान किया ! ठाकुर साहब दूनी गति से कार्य में जुट गए ! प्रांत प्रचारक बनने के बाद मा. सुदर्शन जी ने संघ प्रचारकों को स्वयं गण लेने हेतु निर्देशित किया ! भिंड में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरकिशन भूता जी का दबदबा था ! भूताशाही के उस दौर में भी अपारवल जी साईकिल में दंड बांधकर प्रतिदिन अलग अलग शाखाओं पर जाते तथा तरुणों को उत्साह पूर्वक एकत्रित कर गण लेते ! पहले ही वर्ष ४० नई शाखाएं क्षेत्र में खड़ी हो गईं ! दूसरे वर्ष नगर में अनेक जैन नौजवान शाखा पर आने लगे ! परिवार भले ही कांग्रेसी हो पर युवक संघ से जुडने लगे ! भिंड नगर में २१ शाखाएं लगने लगीं ! श्री राम जाटव, पवन जैन, विजय जैन, विष्णु खंडेलवाल, मनमोहन बोहरे, जयकुमार जैन आदि उसी समय संघ से जुड़े ! सब दंड लेकर शाखा आते ! संघ की धाक का समय था बह ! 

सन ७३-७४ में एस.पी.बब्बर से व्यक्तिगत संपर्क बढ़ा ! एक बस संचालक माधोसिंह नगर का कुख्यात दादा था ! जिससे उधार लेता बापिस करने का नाम भी नही लेता ! कोई डर के कारण कुछ नहीं कहता ! बही उसने एक स्वयंसेवक नरेंद्र जैन के साथ भी किया ! उनकी दूकान से किराना उधार ले जाकर उसका भुगतान नही किया ! नरेंद्र के पिताजी ने माँगा तो उन्हें अपमानित कर दिया ! इस पर योजना बनाकर नरेंद्र जैन और माधोसिंह की बातचीत रिकार्ड करबाई, जिसमें माधोसिंह दादा एस.पी. को भी अपशब्द बोल रहा था ! बह टेप एस.पी. बब्बर को सुनबाया ! फिर क्या था ? खुद एस.पी. ने जाकर उसे ना केवल गिरफ्तार किया बल्कि पूरा जुलूस ही निकाल दिया ! इस पर कांग्रेसियों ने बब्बर की शिकायत की कि बह संघी हो गया है ! एस.पी.बब्बर ने जबाब दिया गुंडों को ठीक करना पुलिस की ड्यूटी है ! आप लोग कोई संघी गुंडा बताओ, मैं उसे छोडूं तब कहना ! कांग्रेसी निरुत्तर हो गए ! 

सन ७४ में ही २०० स्वयंसेवकों का पथ संचलन निकला ! विशेष बात यह थी कि यह संचलन स्वयं के घोष के साथ निकला ! इस हेतु दिल्ली से नया घोष लाया गया ! इस अवसर पर बौद्धिक हेतु मा. तराणेकर जी पधारे थे ! उनसे संचलन के पूर्व ही कह दिया कि गाँधी जी के बन्दर याद रखिये ! कुछ देखना सुनना बोलना नहीं है ! घोष खुद का तो है, पर अभ्यास नही हुआ है ! सीखते हुए ही बजायेंगे ! संचलन के बाद हुए बौद्धिक में तराणेकर जी ने भिंड के उत्साह की भूरि भूरि प्रशंसा की ! इतना ही नहीं तो विभाग शारीरिक प्रमुख प्रभाकर अम्बरडेकर जी को भी इस विषय में बताया ! 

उस समय जैन डिग्री कालेज नसिया के मैदान में शाखा लगती थी ! प्रवंधन उसे बंद कराना चाहता था ! कुछ संघ के स्वयंसेवक भी प्रवंधन में थे ! उन्होंने इस विषय में जानकारी दी ! उन्हें सलाह दी गई कि वे भी प्रवंधन की बैठक में इस बात का समर्थन ही करें और शाखा बंद करने के लिए एक समिति गठित करबायें, जिसका अध्यक्ष भी किसी संघ विरोधी को बनबा दें ! उन लोगों ने ऐसा ही किया, पर कोई भी अध्यक्ष बनने को तैयार ही नही हुआ ! आखिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ? बात बहीं फेल हो गई ! 

१९७५ के आपातकाल में मामा जी ने योजनापूर्वक एक स्वयंसेवक को कांग्रेस की टोपी पहनाकर थाने में बैठा दिया ! जो बहां के समाचार तो लाकर देता ही, साथ ही साथ कान्ग्रेसियों के ही नाम संघी बताकर थाने में लिखवा देता ! कांग्रेसी बेचारे पुलिस के चक्कर में फंस जाते ! यह कला भिंड के अलावा कहाँ मिलेगी ? 

आपातकाल के दौरान ठाकुर साहब को शिवपुरी का दायित्व दिया गया | अपारबल सिंह जी उन दिनों अलग अलग घरों में रहा करते थे ! वे किसी परिवार में बच्चों के मामा तो कहीं ताऊ तो कहीं भाई बनकर रहे ! एक डुप्लीकेटिंग मशीन पिपरसमा गाँव में श्री दिनेश गौतम के खलिहान में छुपाकर रखी गई ! जहाँ से हस्त लिखित पेम्पलेट छापकर रात के समय घरों में और दुकानों में डाल दिए जाते थे ! इन पर्चों ने जन जागरण में बड़ा योगदान दिया ! 

आपातकाल की समाप्ति के पश्चात अपारवल जी ने संघ प्रचारक के रूप में बिखरे सूत्रों को जोड़कर पुनः संघ कार्य को गतिमान बनाया ! इन्ही के समय संघ कार्य की दृष्टि से शिवपुरी को विभाग बनाया गया, और अपारवल सिंह जी उपाख्य ठाकुर साहब को प्रथम विभाग प्रचारक ! बाद में आपको भोपाल के प्रांतीय संघ कार्यालय समिधा की व्यवस्था का दायित्व दिया गया | तबसे अब तक अर्थात अपने महाप्रयाण तक ठाकुर साहब और समिधा का सम्बन्ध बना ही रहा |

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