अंग्रेजियत में रमे पिता की संतान महर्षि अरविंद की भारत भक्ति और आध्यात्मिक यात्रा

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विचार है कि पवित्र श्रावण मास में भारत की कुछ दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों पर चर्चा की जाए। इस क्रम में सबसे पहले लेते हैं महर्षि अरविन्द को। ...


विचार है कि पवित्र श्रावण मास में भारत की कुछ दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों पर चर्चा की जाए। इस क्रम में सबसे पहले लेते हैं महर्षि अरविन्द को। अरविंद घोष के कई रूप हैं। भारत भक्त अरविंद, क्रांतिकारी अरविंद, विचारक अरविंद, आध्यात्मिक अरविंद। तो सबसे पहले भारत भक्त अरविन्द। हममें से कई लोगों ने पूर्व प्रधान मंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेई जी का वह भाषण सुना होगा - भारत एक जमीन का टुकड़ा नहीं है, वह जीता जागता राष्ट्र पुरुष है, हिमालय जिसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है, कश्मीर जिसका किरीट है आदि आदि। मुझे लगता है कि वस्तुतः उस वक्तव्य की प्रेरणा उन्हें महर्षि अरविंद से प्राप्त हुई होगी।
15 अगस्त 1872 को कोलकता में जन्मे महर्षि अरविन्द के पिता डॉक्टर कृष्णधन घोष अंग्रेजियत में कितना डूबे हुए थे, इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि उन्होंने अपने पुत्र अरविंद का नाम भी एक्रायड अरविंद घोष रखा था। इसी प्रकार अपने सबसे छोटे पुत्र का नाम रखा था एम्मनुएल घोष। कृष्णधन घोष भारत में डॉक्टरी की शिक्षा लेने के बाद महज बीस वर्ष की आयु में ब्रिटैन की यात्रा पर गए और स्कॉटलैंड से एमडी की उपाधि लेकर लौटे। उनका नजरिया था कि भारत का अंग्रेजियत के रंग में रंगना न केवल अच्छा बल्कि परम आवश्यक भी है। उन्होंने अपने तीनों पुत्रों को पढ़ने के लिए मेनचेस्टर में एक चर्च के पादरी विलियम एच ड्रिवेट व उनकी पत्नी को इस निर्देश के साथ सौंप दिया कि इन बालकों पर भारतीय प्रभाव बिलकुल भी न पड़ने दिया जाए। यहाँ तक कि किसी भारतीय से उनका परिचय तक न होने दिया जाए। लेकिन अपने मन कछु कुछ और है, विधना के कछु और के अनुसार अरविंद क्या बने, उसका प्रतीक है उनके द्वारा किया गया भारतमाता का गुणगान । आईये महर्षि अरविंदो घोष द्वारा वर्णित भारत के स्वरुप को मन मंदिर में बसाएं।
भारत माता, हाँ जिनका स्थूल रूप भारतवर्ष की भूमि है, पर जो अपने दिव्य रूप में साक्षात भगवती शक्ति है, दुर्गा है, अन्नपूर्णा है, जगज्जननी है, वह भारतमाता।
सहस्त्रों शताब्दियों से जो पृथ्वी के ह्रदय रूप में प्रतिष्ठित है, जिसने लक्ष लक्ष ऋषियों, संतों, दार्शनिकों, भक्तों, योगियों, कवियों, वैज्ञानिकों, कलाकरों, वीरों, सम्राटों इत्यादि को जन्म देकर विश्व को सजाया संवारा है, प्रगति पथ पर बढ़ाया है, वह भारत माता।
जिसने विश्व भर को विष के प्रत्युत्तर में अमृत, घृणा के प्रत्युत्तर में प्रेम, अत्याचार के प्रत्युत्तर में करुणा, भीरुता के प्रत्युत्तर में साहस, दुर्बलता के प्रत्युत्तर में शक्ति और अज्ञान के प्रत्युत्तर में ज्ञान दिया, वह भारतमाता।
हिमालय जिसका स्वर्ण मुकुट है, हिन्द महासागर जिसके चरण पखारता है, हरितांचल जिसकी हरित साड़ी है,गंगा यमुना सिंधु की जलधाराएं जिसकी मुक्ता मालाएं हैं, सूर्य और चंद्र जिसकी आरती उतारते हैं तथा षडऋतु के सरगम पर प्रकृति स्वयं जिसकी वंदना के गीत गाती है, वह भारतमाता।
जिसने भौतिकता को आत्मसात करने वाली परिपूर्ण आध्यात्मिकता की गंगा को प्रवाहित करने वाले तत्व साक्षात्कारी महापुरुषों की अखंड परंपरा प्रगट की, जिसकी गोदी में खेलने को देवता भी ललकते हैं, स्वयं भगवान् ने जिसको बार बार जननी कहा, वह भारतमाता।
जिसके पुत्रों ने परब्रह्म के दिव्य रूप को देखा और उसकी झलक दिखाकर विश्व को मुग्ध कर लिया, जिसने मानवों को "अमृतस्य पुत्राः" की अनुभूति दी, जिसने विश्व की आध्यात्मिक प्रयोगशाला के रूप में सभ्यता के प्रारम्भ से ही कार्य किया है, वह भारतमाता।
जो विश्व को आध्यात्मिकता के रंग में रंगने के लिए सुदीर्घ काल से सतत प्रयत्नशील है, पृथ्वी पर दिव्य जीवन की स्थापना ही जिसका जीवनोद्देश्य है, जिसकी दिव्य मालिका के रत्न ही एक एक महापुरुष के रूप में विश्व को अपनी ज्योति से चमत्कृत करते रहे हैं, वह भारतमाता।
जिसका जयघोष वन्देमातरम एक महान मन्त्र है, जिसकी उपासना अभ्युदय और निश्रेयस को साधने का वीरव्रत है, जिसकी साधना सफलता है, जिसके ध्यान में स्वयं को भूलकर मग्न हो देशभक्ति है, जिसकी कृपा सात्विकता की वर्षा है, जिसका स्पर्श मात्र जड़वाद के विरुद्ध कवच है, जिसका अस्तित्व विश्व की आशा है, जिसका इतिहास प्रकाश का तालबद्ध संगीत है, जिसका निश्वास वेद हैं, वह ज्योतिर्मयी भारतमाता।
उस भारत माता की जय हो, माता की जय हो, वन्देमातरम।

महर्षि अरविंद की आधात्मिक यात्रा भाग 2- भारत में श्री अरविंद के क्रांतिपथ का श्री गणेश

जैसा कि पूर्व में वर्णित किया जा चुका है, पिता श्री कृष्णधन घोष ने भारतीयता की छाया भी बच्चों पर ना पड़े, इस दृष्टि से तीनों भाईयों को इंग्लैंड में ही पढ़ाया, वह भी एक पादरी के संरक्षण में । किन्तु आर्थिक कठिनाईयों के कारण वे लगातार आर्थिक व्यवस्था न कर सके और विवशतः इन विद्यार्थियों को अपनी व्यवस्था स्वयं करना पडी। श्री अरविंद 1884 से 1889 तक लन्दन के सेंट पॉल स्कूल में पढ़े और उसके बाद किंग्स कॉलेज केम्ब्रिज में प्रविष्ट हुए। इस दौरान जिस क्लब के कमरे में ये लोग रहते थे, बड़े भाई विनय मोहन उसके सेक्रेटरी जेम्स एस कॉटन के निजी सहायक बन गए। वेतन था महज पांच शिलिंग प्रति सप्ताह। कितनी विषम आर्थिक कठिनाईयों झेली होंगी, इन लोगों ने, यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है। न ढंग के कपडे थे पहनने को और रात्रि भोजन तो प्रायः नसीब ही नहीं होता था। इसके बावजूद प्रतिभा ऐसी कि सेंट पॉल स्क़ूल में पढ़ाई के दौरान ही श्री अरविंद को अस्सी पोंड की छात्र वृत्ति मंजूर हो गई और एक बड़ा सहारा तीनों भाईयों को मिल गया। नियमित पढ़ाई के साथ साथ इटेलियन, जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश आदि यूरोपीय भाषाओं का ज्ञान भी अरविंद ने प्राप्त कर लिया। इतना ही नहीं तो कविता और निबंध लेखन में अनेक साहित्यिक पुरष्कार भी उन्होंने प्राप्त किये। फिर अवसर आया पिता की इच्छा के अनुसार आई सी एस की परीक्षा देने का। बड़े भाई ने भी दी और अरविंद ने भी। किन्तु सफलता मिली केवल अरविंद को। लेकिन तब तक अरविंद पर दूसरा ही नशा छा चुका था। उन्हें भारत की पराधीनता चुभने लगी थी। लन्दन में रहते हुए वे लोटस एंड डेगर अर्थात कमल और कटार नामक संस्था के सदस्य बन गए थे, जिसके प्रत्येक सदस्य को प्रतिज्ञा करनी होती थी कि वह आजीवन भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्य करेगा। क्रांति पथ पर यह अरविंद का प्रथम कदम था। दूसरा कदम उन्होंने उठाया कि आई सी एस की परीक्षा तो उत्तीर्ण कर ली, किन्तु बने नहीं। पिता को बुरा न लगे, इसलिए रास्ता यह निकाला कि अंतिम घुड़सवारी की परीक्षा देने पहुंचे ही नहीं। अनेक अवसर दिए गए, पर हर बार समय पर नहीं पहुंचे। बहाना एक ही, आवागमन में असुविधा। सचाई तो यही थी कि आई सी एस बनकर वे ब्रिटिश तंत्र का पुर्जा नहीं बनना चाहते थे। वह तो एक प्रकार से भारत की पराधीनता में सहयोगी बनना ही होता। और इक्कीस वर्षीय नौजवान अरविंद ने इस प्रकार भौतिक वैभव और विलासिता पूर्ण जीवन को ठोकर मार दी।
जब वे १८९३ में भारत आये, उस समय उनका जहाज डूबने के गलत समाचार से मर्माहत होकर पिता की हृदयाघात से मृत्यु हो गई, और उनकी माँ विक्षिप्तावस्था में उन्हें पहचानने की स्थिति में भी नहीं रहीं।
मृत्यु के पूर्व ही पिता अपने एक परिचित के माध्यम से अरविंद को बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड़ का निजी सहायक नियुक्त करवा गए थे। इस पद पर श्री अरविंद 8 फरवरी 1893 से 18 जून 1907 तक रहे, इस दौरान वे बड़ौदा कालेज में अध्यापन भी करते रहे। इसी बीच 1901 में 29 वर्षीय अरविंद का विवाह 14 वर्षीय मृणालिनी से हुआ।
स्वाभाविक ही किसी के भी मन में सवाल उठेगा, तो फिर इंग्लैंड में ली गई स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा का क्या हुआ ? नौकरी करते रहे, पढ़ाते रहे बस ? जी नहीं, लक्ष्य पर सदा निगाहें रहीं। बड़ौदा में रहते समय ही १८९८ में एक बंगाली नौजवान यतीन्द्र नाथ बैनर्जी को सैन्य प्रशिक्षण के लिए बड़ौदा की सेना में भर्ती करवा दिया और उसे प्रेरित किया कि वह आगे चलकर बंगाल में क्रांतिकारी कार्यों के लिए स्वयं को पूर्ण प्रशिक्षित करे। अपने छोटे भाई वारिन्द्र घोष को भी बंगाल में जन जागरण और क्रन्तिकार्य हेतु संगठन विस्तार का जिम्मा दिया। उसके पूर्व उन्होंने अनुज वारिन्द्र को शपथ दिलाई। एक हाथ में नंगी तलवार और दूसरे हाथ में गीता लेकर वारिन्द्र ने शपथ ली -
जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, और जब तक भारत परतंत्रता की बेड़ियों से आजाद नहीं हो जाता, तब तक मैं क्रांतिकार्य करता रहूँगा। अपने कोलकता जाने से पूर्व ही श्री अरविंद बड़ौदा में रहते रहते ही बंगाल में पांच सदस्यीय केंद्रीय परिषद्म बना चुके थे, जिसमें भगिनी निवेदिता, यतीन्द्र नाथ बैनर्जी, वारेन घोष, सी आर दास, और सुरेंद्र नाथ ठाकुर शामिल थे। इतना ही नहीं तो महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों के साथ भी इस दल का तालमेल था। मार्गदर्शन के लिए स्वयं श्री अरविंद भी समय समय पर कोलकता जाते रहे।
बड़ौदा में रहते समय समसामयिक घटनाओं पर उनकी पैनी नजर थी। मुंबई के एक अंग्रेजी समाचार पत्र इंदु प्रकाश में छद्मनाम से उनके द्वारा लिखित लेखमाला "न्यू लैम्प्स फॉर ओल्ड" अर्थात पुरानों के स्थान पर नए दीप" ने तहलका मचा दिया। इन लेखों में श्री अरविंद ने न केवल अंग्रेजी राज की बखिया उधेड़ी, वरन तत्कालीन कांग्रेस की ढुलमुल नीतियों की भी कटु आलोचना की। आईये कुछ लेखों के अंशों पर नजर डालें। अंग्रेजों का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा -
वे अशिष्ट एवं धृष्ट हैं, उनका शासन दोषों से पूर्ण है, उनमें कोई उदात्त भावना है ही नहीं, वे संकुचित ह्रदय और वणिक वृत्ति से परिपूर्ण हैं । लेकिन इस सबमें मुझे कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि वे बहुत ही साधारण मानव हैं, जिन्हें संयोग से अनुकूल परिस्थितियां मिल गई हैं।
श्री अरविंद को तत्कालीन इंडियन नेशनल कांग्रेस की नीतियों से ज्यादा निराशा थी। उन्होंने लिखा -
हमारे लिए निराशा की मरुभूमि में कांग्रेस ही आशा के शीतल जल की पुष्करिणी थी, वह स्वतंत्रता संग्राम का अभियान ध्वज थी। किन्तु ये सब आशा सरिताएं मृगतृष्णा मात्र सिद्ध हुईं। जिन नेताओं में कांग्रेस का विश्वास है, वे सुयोग्य नेता नहीं हैं। हमारी स्थिति इस समय अन्धेनैव धीयमाना यथान्धाः अर्थात अंधे के नेतृत्व में चलने वाले अंधों जैसी हो गई है। यह एक मध्यमार्गी संगठन है, जो न निस्वार्थ है न निश्छल। इसके देशप्रेम के दावे खोखले हैं। इसकी नस नस में भीरुता है। वह कठोर सत्य के उद्घाटन से कतराती है, सीधी सच्ची बात कहने में कतराती है, और सदा भयभीत रहती है कि कहीं सरकार रुष्ट न हो जाए।
स्वाभाविक ही इन लेखों की प्रतिक्रिया हुई और श्री महादेव गोबिंद रानाडे ने सम्पादक से संपर्क कर इतने तीखे लेख न छापने का आग्रह किया। स्पष्ट ही श्री अरविंद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित थे, उन दिनों तिलक जी के भी यही स्वर थे।और कांग्रेस का नेतृत्व
1905 में श्री अरविंद लिखित भवानी मंदिर पुस्तक गाँव गाँव में बांटी गई, जिसने बंग विभाजन के उस दौर में अभूतपूर्व चेतना जागृति का कार्य किया। आईये उस पुस्तक के भी कुछ अंशों पर नजर डालते हैं -
भारतीय स्वाभाव में प्रेम, उत्साह और भक्ति की कोई कमी नहीं है, लेकिन शक्ति के ईंधन का अभाव है। शक्ति - शारीरिक, मानसिक, नैतिक और सर्वोपरि आध्यात्मिक शक्ति, शक्ति के अभाव में हम स्वप्न के मनुष्य के समान हैं, जिसके हाथ तो दिखाई देते हैं, लेकिन उन हाथों से कुछ पकड़ा नहीं जा सकता। आज के भारत की स्थिति उस वृद्ध के समान है, जिसके पास ज्ञान का असीमित भण्डार है, अनुभव है, इच्छाएं भी हैं, किन्तु आयुजन्य निस्तेजता, भीरुता, और दुर्बलता ने उसे निरीह बना दिया है। यदि भारत को जीवित रहना है, तो उसे पुनः यौवन संपन्न बनाना होगा, शक्ति की वेगपूर्ण महा तरंगित धाराओं को उसमें उंडेलना होगा, उसकी आत्मा को प्राचीन काल के समान शक्ति का महासागर बनाना होगा। यह सोच मूर्खतापूर्ण है कि भारत कभी ठीक नहीं हो सकता। कोई भी मनुष्य या राष्ट्र तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक वह स्वयं जानबूझकर नष्ट होना न चाहे। जैसे करोड़ों देवताओं के सम्मिलित शक्ति पुंज से भवानी महिषासुर मर्दिनी का अवतार हुआ था, बैसे ही भवानी मां भारती देशवासियों की शक्ति का पुंजीभूत स्वरुप है, भारत राष्ट्र उसका मंदिर है। भारत नष्ट नहीं हो सकता, हमारी जाति विलुप्त नहीं हो सकती, यह सनातन धर्म ही सभी धर्मों, विज्ञान दर्शनों का समन्वय करेगा। इसी महान कार्य को करने के लिए स्वामी रामकृष्ण आये, विवेकानंद ने उपदेश दिया। हमारी जाति की आवश्यकता है, शक्ति, शक्ति और अधिक शक्ति।
उसके बाद 1906 में तो वे बड़ौदा की 700 रुपये मासिक की शासकीय नौकरी छोड़कर मात्र 150 रुपये मासिक पर नॅशनल कॉलेज कोलकता में पूर्णतः शिक्षक होकर कोलकता पहुँच ही गए ।

महर्षि अरविंद की आधात्मिक यात्रा भाग 3 - सूरत कांग्रेस अधिवेशन में तिलक जी को पीटने का हुआ प्रयास, अरबिंद बने राजनेता से साधक

जैसा कि पिछले वीडिओ में वर्णित किया गया श्री अरविंद बड़ौदा की 700 रुपये मासिक की शासकीय नौकरी छोड़कर मात्र 150 रुपये मासिक पर नॅशनल कॉलेज कोलकता में पूर्णतः शिक्षक होकर कोलकता पहुँच गए । यह घटना भी अपने आप में अद्भुत है। थाना महाराष्ट्र में मजिस्ट्रेट रहे श्री चारुचंद्र दत्त श्री अरविंद के गुप्त सहयोगियों में से एक थे। उनके घर पर एक दिन श्री अरविंद की राजा सुबोध मलिक नामक एक धनवान देशभक्त बंगाली से भेंट हुई। श्री मलिक जानते थे कि श्री अरविंद अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के मुखर आलोचक है। उन्होंने सुझाव दिया कि श्री अरविंद उनके दान से खुले नए नॅशनल कॉलेज में प्रिंसिपल बनकर राष्ट्रीय शिक्षा के अपने नए प्रयोग का प्रारम्भ करें।

श्री अरविंद ने सहर्ष यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, क्योंकि इससे जहाँ एक ओर तो राष्ट्रीय शिक्षा सम्बन्धी अपने विचारों को मूर्त रूप देने का अवसर उन्हें मिल रहा था, वहीँ दूसरी ओर राजनीति में खुलकर भाग लेने तथा क्रांतिकारी संगठन को बल देने की स्वतंत्रता भी मिल रही थी। उन दिनों बंग भंग विरोधी आंदोलन भी चरम पर था। कांग्रेस में दो विचार धाराएं एक साथ चल रही थीं। एक था जिसे नरम दल कहा जाता था, जो अंग्रेजों की मंशा के अनुरूप कांग्रेस को सेफ्टी वाल्व बनाये रखना चाहता था तो दूसरा बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में राष्ट्रवादियों का समूह जिसमें पंजाब से लाला लाजपतराय तथा बंगाल के विपिन चंद्र पाल भी सम्मिलित थे। लाल बाल पाल के नाम से मशहूर यह तिकड़ी उन दिनों देशप्रेमियों के मनो मस्तिष्क पर छाई हुई थी। श्री अरविंद भी कोलकता में बिपिन चंद्र पाल के साथ खुलकर जुड़ गए। आई सी एस के वैभव भरे पद को ठुकरा चुके अरविंद के लिए धन का तो कोई महत्व था ही नहीं। वे तो माँ भारती की आराधना को ही अपना जीवन लक्ष्य बना चुके थे।

गुजरात के प्रसिद्ध राजनेता व लेखक श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी भी बड़ौदा में श्री अरविंद के छात्र रहे थे। उन्होंने 22 जुलाई 1962 को भवंस जरनल में लिखा कि श्री अरविंद छात्रों को पढ़ाने के साथ साथ राष्ट्रप्रेम की घुट्टी भी पिलाते थे। वे भारत के मानचित्र को भारत माता का चित्र कहते थे, भारत जिसकी देह, देशवासी जिसके कोष तथा भारतीय संस्कृति जिसकी आत्मा है। वे छात्रों को भारत माता की नवधा भक्ति से पूजा करने का उपदेश देते थे।

बाद में मुजफ्फरपुर बमकांड में गिरफ्तार होने पर पत्नी को 1905 में लिखे गए जिस पत्र को सबूत के रूप में श्री अरविन्द के खिलाफ अंग्रेजों ने उपयोग किया, उसके कुछ अंश श्री अरविंद की भारत भक्ति के परिचायक हैं -

अन्य लोग स्वदेश को जड़ पदार्थ मैदान, खेत, वन पर्वत नदी भर समझते हैं, मैं स्वदेश को माँ मानता हूँ, उसकी भक्ति करता हूँ, पूजा करता हूँ। माँ की छाती पर बैठकर अगर कोई राक्षस रक्तपान करने के लिए उद्यत हो, तो अच्छा पुत्र क्या करता है ? निश्चिन्त होकर भोजन करने, स्ट्रॉ पुत्र के साथ आमोद प्रमोद करने के लिए बैठ जाता है या मां का उद्धार करने के लिए दौड़ पड़ता है ?

तो ऐसे श्री अरविंद को कम वेतन पर जातीय शिक्षा परिषद द्वारा संचालित नॅशनल कॉलेज का प्रिंसिपल बनने में कोई संकोच या आपत्ति नहीं हुई। यह अलग बात है कि वही नॅशनल कॉलेज आज जाधवपुर यूनिवर्सिटी के नाम से कुख्यात है। उन दिनों भी राष्ट्रीय दृष्टि से प्रारम्भ किये गए इस कॉलेज पर भी जल्द ही अंग्रेज परस्तों का कब्जा हो गया और उन्होंने कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों पर राजनीति में भाग न लेने की बंदिशें लगा दीं, तो श्री अरविंद भी श्री विपिन चंद्र पाल प्रवर्तित वन्देमातरम समाचार पत्र में लेखन व संपादन हेतु अधिक समय देने लगे।

ऐसे में 27 जून 1907 को वनमातरम समाचार पत्र में इण्डिया फॉर इंडियंस शीर्षक से एक पाठक का पत्र प्रकाशित हुआ। बस फिर क्या था, 16 अगस्त को उनका गिरफ्तारी वारंट निकला और 19 अगस्त को उन्होंने स्वयं को गिरफ्तारी के लिए पुलिस के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। बंगाल ही नहीं पूरे देश में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। इंडियन पेट्रियोट, मद्रास स्टेंडर्ड, आदि समाचार पत्रों ने अग्रलेख लिखे। सरकार मुकदमे के दौरान यह सिद्ध नहीं कर सकी कि उस पत्र के लेखक श्री अरविंद थे और उनकी रिहाई हुई। उनके स्वागत में न केवल आम जन उमड़े बल्कि गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने तो एक भावुकता पूर्ण लम्बी कविता ही लिख दी, जिसके कुछ अंशों का अनुवाद इस प्रकार है -

हे श्री अरविंद रवींद्र का नमस्कार स्वीकार करो। हे देशबंधु तुम देशात्मा की वाणी मूर्ति हो, तुम्हें न सम्मान की चाह है न धन की, न किसी की। तुम्हारे हाथ में दुःख का दारुण दीप ध्रुव तारे के सद्रस देश में व्याप्त अंधकार को विदीर्ण कर रहा है। तुम्हारी जय हो, विजय हो।

आईये उस समय की कांग्रेस की स्थिति पर भी नजर डालते हैं -

1906 के कोलकता अधिवेशन में यह तय हो गया था कि अगला अधिवेशन नागपुर में होगा, किन्तु नरम पंथियों को लगा कि राष्ट्रवाद के गढ़ महाराष्ट्र में वे कमजोर पड़ जाएंगे, अतः अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति की मुम्बई बैठक में स्थान परिवर्तन का प्रस्ताव पास कर सूरत में अधिवेशन करना तय हुआ। नरम पंथियों ने जैसा सोचा था, बैसा ही हुआ और 1100 राष्ट्रवादियों की तुलना में नरम दल के 1300 प्रतिनिधि वहां पहुंचे। 26 दिसंबर 1907 को अधिवेशन शुरू हुआ, लोकमान्य तिलक और लाला लाजपत राय ने एकता बनाये रखने का भरपूर प्रयास किया, किन्तु झगड़ा इतना बढ़ा कि अधिवेशन शुरू होते ही समाप्त हो गया। हुआ कुछ यूं कि जब तिलक जी ने अपनी कोई बात कहने का प्रयास किया, तो सभापति डॉ. रासबिहारी घोष ने इसकी अनुमति नहीं दी, इतना ही नहीं तो कुछ गुजराती स्वयंसेवकों ने उन पर प्रहार करने के लिए कुर्सियां उठा लीं। यह भला मराठा अस्मिता को कहाँ सहन होता। लोगों ने एक चीज हवा में उछलते देखी। वह था लाल चमड़े का बना मुड़े हुए नुकीले मुंह वाला एक मराठी जूता, जिसके तले में कीलें भी जड़ी हुई थीं। एक नौजवान द्वारा फेंका यह जूता सीधे सुरेंद्र नाथ बैनर्जी के गाल पर आघात करता हुआ, फीरोजशाह मेहता के बगल से किसी उल्का की तरह निकल गया। अनेक मराठा नवयुवक मंच पर भी दौड़ आये। उसके बाद कहाँ का अधिवेशन और कहाँ की कांग्रेस। २८ दिसंबर को दोनों दलों की अलग अलग सभाएं हुईं। सूरत कांग्रेस तो भंग हो गई, किन्तु उसने इतिहास बना दिया। नरम पंथ कांग्रेस का केवल शरीर रह गया, जबकि आत्मा संगठन के बाहर राष्ट्रवादियों के साथ रही और अंततः 1916 आते आते देश की राजनैतिक शक्ति वे ही बन गए।

सूरत कांग्रेस भंग होने के बाद निराश मनः स्थिति में श्री अरविंद अपनी पुरानी कर्मभूमि बड़ौदा पहुंचे, जहाँ एक नया अनुभव उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। छोटे भाई वारीन ने उनकी इच्छा जानकर ग्वालियर से एक महाराष्ट्रियन योगी श्री विष्णु भास्कर लेले को उनके एक शिष्य के माध्यम से बड़ौदा बुलवाया और सरदार मजूमदार के बाड़े में सबसे ऊपर की मंजिल के एक कक्ष में श्री अरविंद की योग साधना प्रारम्भ हुई। तीन दिन में ही उनका मन एक शास्वत शान्ति से ओतप्रोत हो गया। बड़ोदा से वे श्री लेले के साथ ही मुम्बई आये और उसके बाद के उनके भाषणों में आध्यात्मिक राष्ट्रीयता का स्वर अधिक मुखरित होने लगा। कोलकता लौटकर श्री अरविंद के तीनों रूप एक साथ चलने लगे, राजनेता, क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक और आध्यात्मिक साधक। श्री लेले एक बार फिर अपने इस अद्वितीय शिष्य से कोलकाता में मिले और यह जानकर हतप्रभ हो गए कि वे बम और साधना एक साथ चलाना चाहते हैं और उन्होंने उन्हें अपने शिष्यत्व से मुक्त कर दिया। श्री अरविंद ने लिखा कि उन्होंने अपने अंतस की प्रेरणा से मुझे मेरे अन्तर्यामी परमेश्वर के सुपुर्द कर दिया और मुझे उन्हीं की इच्छानुसार कार्य करने का उपदेश दिया।

श्री अरविंद जिस बमकांड में संलिप्तता के आधार पर 4 मई 1908 को बंदी बनाकर अलीपुर जेल के एकांत कक्ष में 5 मई 1909 तक रखे गए, उस की गाथा तो देश में लगभग सर्व ज्ञात है ही। फिर भी एक बार उसे पुनः याद कर लेते हैं। लार्ड कर्जन ने तो धार्मिक आधार पर बंगाल को दो हिस्सों में बांटा, लेकिन जन आक्रोश के कारण अंग्रेज सरकार ने उसे हटाकर उसके स्थान पर लार्ड मिंटो को भेजा, उसने तो आंदोलन को कुचलने का इतना निर्मम प्रयास किया कि स्वयं राज्य सचिव मार्ले को चेतावनी देना पडी। कुछ उदाहरण देखिये -

संध्या के सम्पादक ब्रह्म वांधव उपाध्याय को देशद्रोह अपराध में बंदी बनाया गया और उसे बाद कैम्पवेल अस्पताल में उनकी जान ही ले ली। छोटे से बालक सुशील सेन को वन्दे मातरम कहने के अपराध में अदालत में कोड़ों से निर्ममता से पीटने का आदेश दिया गया। क्रांतिकारियों को यह कहाँ सहन हो सकता था, अतः उन्होंने मुजफ्फरपुर के अत्याचारी जिला जज किंग्स फोर्ड को मारने का निश्चय किया। 10 अप्रैल 1908 को उसकी बग्घी पर बम फेंका गया, किन्तु दुर्भाग्य से उसमें किंग्स फोर्ड नहीं था, उसके स्थान पर दो अंग्रेज महिलायें मारी गईं। जहाँ नरमपंथी कांग्रेसियों ने इस घटना की कटु भर्त्सना की, वहीं राष्ट्रवादियों ने इसकी निंदा तो की, किन्तु साथ ही इसे सरकारी नीतियों के कारण उपजा जनाक्रोश बताया। तिलक जी ने केसरी में "बम का रहस्य" शीर्षक से एक लेख लिखा और फलस्वरूप राजद्रोह के आरोप में बंदी बना लिए गए। श्री अरविंद भी गिरफ्तार कर काल कोठरी में पहुंचा दिए गए। जब वन्देमातरम में प्रकाशित सामग्री के आधार पर उन्हें बमकांड में आरोपी बनाकर अलीपुर जेल भेजा गया, तो उन्होंने कॉलेज के अपने पद से भी त्यागपत्र दे दिया।

महर्षि अरविंद की आध्यात्मिक यात्रा भाग 4 - जेल की काल कोठरी बनी साधना स्थली, हुआ ईश्वर साक्षात्कार 

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध योगी नगाई जप्ता का अंतकाल नजदीक आया तो उनके शिष्य के बी आर आयंगर ने उनसे पूछा - आपके बाद मेरी साधना का मार्गदर्शक कौन होगा।
जप्ता का जबाब था - कुछ वर्षों बाद एक उत्तर योगी इधर दक्षिण भारत में शरण लेने आएंगे, तुम अपनी साधना में उनसे मदद लेना।
तो इस प्रकार जब श्री अरविंद ने जेल से छूटने के बाद राजनीति के स्थान पर अध्यात्म का मार्ग चुना, और पुंडुचेरी पहुंचे तो अपने गुरू के परामर्श अनुसार श्री आयंगर ने उन्हें सम्बोधन दिया - उत्तर योगी।
महर्षि अगस्त्य के बाद संभवतः श्री अरविन्द ही दूसरे योगी थे, जिन्होंने उत्तर भारत से दक्षिण में जाकर आध्यात्मिकता की लौ जलाई। श्री अरविंद ने राजनेता के रूप में पूर्ण स्वराज्य की मांग की, गांधी जी के भी बहुत पहले असहयोग आंदोलन का सूत्रपात किया, कोलकता में नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में एक नई शिक्षा नीति की बात की, तो वन्देमातरम और कर्मयोगी के सम्पादक के रूप में भारतीय आत्मा को स्वर देने वाली पत्रकारिता का सूत्रपात किया। इसलिए उनके आध्यात्मिक रूपांतरण को सार्वजनिक जीवन से पलायन समझना भूल होगी। सचाई तो यह है कि अंग्रेजों ने उन्हें मानसिक कष्ट देने के लिए सबसे अलग एक एकांतिक कक्ष में रखा था। किन्तु उन्होंने जेल की उस कष्टप्रद काल कोठरी को अपनी साधना स्थली के रूप में बदल दिया। राजनीति से विरत होकर आध्यात्म के मार्ग का अवलम्बन करने का कारण श्री अरविन्द ने अपने प्रसिद्ध उत्तरापाड़ा भाषण में किया है। उनके जेल जीवन के वे अनुभव पढ़ने सुनने से अधिक समझने योग्य हैं। आईये उनके उस प्रसिद्ध उत्तरापाड़ा भाषण के कुछ अंशों पर नजर डालें -
जब विपिनचन्द्र पाल जेल से छूटकर आये थे, उस समय इसी स्थान पर अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि इस आंदोलन में जो शक्ति काम कर रही है, वह सामान्य शक्ति से महत्तर है। ाउनहोने अपने अंदर और राष्ट्र के अंदर विद्यमान ईश्वर की बात की थी। आज मैं भी जेल से छूटकर बाहर आया हूँ और आप लोग मेरा भी स्वागत कर रहे हो। जिस सन्देश को विपिनचन्द्र पाल ने बक्सर जेल में प्राप्त किया था, उसे ईश्वर ने मुझे अलीपुर जेल में दिया है और आदेश दिया है कि जेल से बाहर आकर आप लोगों को सुना दूँ।
मुझे गिरफ्तार कर पहले लाल बाजार थाने और तीन दिन बाद अलीपुर जेल भेजा गया, जहाँ मुझे मनुष्यों से दूर एक निर्जन काल कोठरी में रखा गया। इस एकांतवास में मुझे पहली बार भगवतसाक्षात्कार हुआ। मुझे अनुभूति हुई कि गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यही तो माँगा था कि फल की इच्छा न रखकर भगवान के लिए कर्म करना। सच्चा यंत्र बनकर भगवान के हाथों में रहना। उंच नीच, मित्र और शत्रु, सफलता और विफलता, सबके प्रति समदृष्टि रखना। मुझे यह भी समझ में आया कि अन्यान्य धर्म मुख्यतः विश्वास पर अवलम्बित हैं, उन्हें स्वीकार कर लेना ही पर्याप्त होता है, किन्तु हिन्दू धर्म अर्थात सनातन धर्म तो स्वयं जीवन है, जिसके अनुसार तो जीवन को गढ़ना होता है। भारत का उद्देश्य स्वयं के लिए महान बनना नहीं है, बल्कि उसका उद्देश्य सदा से मानव जाति के लिए रहा है। सनातन सत्य का साक्षात्कार होते ही मैने पाया कि मुझे कालकोठरी की दीवारों ने नहीं, स्वयं वासुदेव ने घेरा हुआ है, कोठरी के सामने दिखने वाला पेड़ नहीं, वहां तो श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे हैं। नारायण ही संतरी बनकर पहरा दे रहे हैं, कम्बल पर लेटते ही लगता मानों मेरे सखा, मेरे प्रेमास्पद, श्री कृष्ण मुझे बाहुओं में लिए हुए हैं। अदालत में मुक़दमा शुरू हुआ, तो पाया मजिस्ट्रेट कहाँ, वहां तो यशोदा नंदन बैठे हुए हैं, सरकारी बकील भी बही और विपक्षी गवाह भी बही, सारी चिंता मिट गई। जब मुक़दमा सेशन में पहुंचा, तब मैं अपने बकील के लिए हिदायतें लिखने लगा, कौन सा आरोप मिथ्या है, किन बातों पर जिरह की जा सकती है, आदि आदि। लेकिन मेरी हैरानी की सीमा नहीं रही, जब मैंने पाया कि मेरा बकील बदल गया है। मुझे पता ही नहीं और मेरा बकील बदल गया। मुझे कल्पना ही नहीं थी कि वे मेरी पैरवी के लिए आएंगे। आप सबने उनका नाम सुना होगा, वे थे श्री चितरंजन दास। उन्होंने मेरा मुक़दमा लड़ने के लिए अपनी पूरी बकालत छोड़ दी, मन से दूसरे सभी विचारों को बाहर निकालकर, मेरे मुकदमे की तैयारी के लिए रात रात भर जागकर अपने स्वास्थ्य को बिगाड़ डाला। मेरे सखा श्री कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, क्यों इन्हें भी हिदायतें दोगे ? मैंने सब कुछ उनके हाथों में छोड़ दिया, उसके बाद मुकदमे के सम्बन्ध में एक शब्द नहीं बोला, कोई हिदायत नहीं दी। वे कह रहे थे, कैसे भी घने बादल घिर आएं, कैसे भी खतरे और कष्ट हों, पर कुछ भी असंभव नहीं है, इस देश और इसके उत्थान के भीतर मैं हूँ। मैं जो करना चाहूँ, उसे कोई नहीं रोक सकता। मैं जिस अवस्था को लाना चाहता हूँ, उसे कोई भी मानव शक्ति नहीं अटका सकती।
आज जब मैं जेल से बाहर आया हूँ, तब आप लोग मेरी प्रशंसा पर प्रशंसा किये जा रहे हो, जिसे सुनकर मुझे लज्जा आती है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मनुष्य के नाते मैं दुर्बलताओं का पुंज हूँ, मुझमें तभी ताकत आती है, जब कोई उच्चतर शक्ति मेरे अंदर प्रवेश करती है। जब मैं इन नवयुवकों के बीच आया हूँ, तो देखता हूँ कि इनमें से बहुतों में प्रचंड साहस, ध्येय के लिए स्वयं को मिटा देने का सामर्थ्य है, जिसके सामने मैं कुछ भी नहीं था। भगवान ने मुझसे फिर कहा, यही वह बलवान जाति है, जो मेरे आदेश से ऊपर उठ रही है, यह युवा समुदाय तुम्हारे काम को तुमसे अच्छी तरह कर पायेगा, तुम तो अब वह करो, जो मैं चाहता हूँ, जिसके लिए मैंने तुम्हें शक्ति दी है, दुनिया को सनातन धर्म के सत्य की वाणी सुनाओ।
जब यह कहा जाता है कि भारत वर्ष ऊपर उठेगा, तो इसका अर्थ होता है, सनातन धर्म ऊपर उठेगा। जब यह कहा जाता है कि भारत वर्ष महान होगा, तो इसका अर्थ होता है, सनातन धर्म महान होगा। यही वह धर्म है, जो दूसरे सभी धर्मों का आलिंगन करता है। कोई संकीर्ण धर्म, कोई अनुदार धर्म केवल एक सीमित समय तक ही, किसी मर्यादित लक्ष्य के लिए ही जीवित रह सकता है। सनातन धर्म ही ऐसा धर्म है, जो साईंस के सभी अविष्कारों और दर्शन शास्त्र की सभी चिंतन धाराओं को अपने अंदर समाविष्ट किये हुए है। यही धर्म संसार को उसका असली रूप दिखाते हुए कहता है, यह संसार वासुदेव की लीला है, जो बताता है कि इस लीला में हम अपनी भूमिका कैसे अच्छी तरह खेल सकते हैं। यही वह वाणी है, जो मुझे आपको सुनाने के लिए आज मेरे मुंह में रखी गई है।

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