बिहार चुनाव: जनता की सोच जीत गई या राजनीति हार गई?
बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम भले ही सत्ता परिवर्तन न लाया हो क्योंकि मुख्यमंत्री पहले भी नीतीश कुमार थे और अब भी वही रहेंगे पर इस चुनाव ने बिहार की नहीं, बल्कि पूरे भारत की राजनीतिक मानसिकता का असली चेहरा एक बार फिर उजागर कर दिया है। भारतीय लोकतंत्र में नेताओं की पराजय-जय से अधिक दिलचस्प होता है मतदाताओं की सोच की दिशा; और इस बार बिहार ने वही दिशा दिखा दी है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक-समाजिक संकेत लालू प्रसाद यादव की पार्टी का लगभग पूरी तरह बिखर जाना है। कांग्रेस पहले ही देश के अधिकांश प्रदेशों में इतिहास की किताबों में समाने की कगार पर खड़ी है, इसलिए उसका बुरा प्रदर्शन किसी को चौंकाता नहीं; लेकिन आरजेडी जैसी लंबे समय से प्रभावी पार्टी का अचानक कमजोर पड़ जाना बिहार की जातीय गणित वाली राजनीति के ढलान पर पहुँचने की घोषणा है। यह उस दौर का अंत है जिसमें राजनीति केवल जाति, परंपरा और भावनाओं की बंदूक पर टिकी रहती थी।
लेकिन इस चुनाव की सबसे कड़वी सचाई वह है, जिसका नाम राजनैतिक बहसों में अक्सर नहीं लिया जाता प्रशांत किशोर और उनके समर्थकों का शून्य पर सिमटना। यह उसी समाज का स्वभाव है जो दिन-रात शिकायत करता है कि राजनीति में गुंडे, बदमाश, जाति-ठेकेदार और परिवारवाद के पुजारी भरे पड़े हैं। लेकिन जब शिक्षित, तर्कशील और सौम्य व्यक्ति चुनाव लड़ने आता है तो वही समाज उसे जीतने लायक भी नहीं समझता। मतदाता बदलाव चाहते हैं, लेकिन बदलने को तैयार नहीं। जैसे कोई व्यक्ति बीमारी से तो छुटकारा चाहता हो, पर दवा खाने से डरता हो।
भारतीय समाज की यह राजनीतिक मनोदशा कोई नई नहीं है। यह वही मानसिकता है जो विदेश से लौटे युवाओं से कहती है “देश के लिए कुछ करो” लेकिन जैसे ही कोई शिक्षित व्यक्ति कुछ करने निकलता है, वही समाज उसे संदेह, ईर्ष्या और असुरक्षा से घेर लेता है। यही कारण है कि राजनीति में आने वाले सभ्य लोग अक्सर या तो हार जाते हैं या फिर हारकर राजनीति से दूर हो जाते हैं, और संसद तथा विधानसभाओं में वही लोग टिके रहते हैं जिनका भाषण तर्क से नहीं, भीड़ की तालियों से चलता है।
लोकतंत्र में तर्क, विवेक और असहमति का होना उतना ही आवश्यक है जितना संसद भवन का होना। ऐसे लोग जरूरी हैं जो कठिन प्रश्न पूछें, सरकारों को जवाबदेह बनाएं, और भीड़ के शोर में भी अपने स्वतंत्र विचारों से व्यवस्था पर दबाव बनाए रखें। उनसे क्रांति की उम्मीद नहीं होती, परंतु उनकी मौजूदगी ही व्यवस्था को संतुलित करती है। लेकिन जब विपक्ष में ऐसे चेहरे हों जिनके पास न नीति हो, न दिशा, न भविष्य का कोई दृष्टिकोण सिर्फ वंशवाद और खोखली बयानबाजी तो सरकारें भी निडर हो जाती हैं। ऐसे विरोध का असर वैसा ही होता है जैसे किसी बीमार व्यक्ति को बिना नमक वाला सलाइन चढ़ा दिया जाए, कानूनन इलाज कर दिया, पर असर शून्य।
इस चुनाव ने एक और दिलचस्प दृश्य दिखाया बीजेपी ने पिछले कुछ समय में आलोचनाओं को सुना, गलतियों से सीखा और रणनीतिक दृष्टि को थोड़ा और सुदृढ़ किया। यही कारण है कि उसका प्रदर्शन लगातार स्थिर और प्रभावी होता जा रहा है। राजनीति में टिकाऊ भविष्य चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए भाजपा ही आज वह मंच है जहाँ विचार रखने वाले, रणनीतिक सोच रखने वाले और मेहनत करने वाले लोगों को जगह मिल सकती है। इसलिए यदि प्रशांत किशोर को राजनीति में सचमुच योगदान देना है, तो उन्हें इस चुनावी पराजय के बाद चुपचाप अपने पत्ते सही तरीके से खेलने होंगे।
उधर कांग्रेस के लिए यह चुनाव एक चेतावनी भी है और अवसर भी। नीतीश कुमार और जेडीयू का समय अब समाप्ति की ओर है यह सभी राजनीतिक पर्यवेक्षक जानते हैं। आरजेडी पहले ही कमजोर स्थिति में है। यदि कांग्रेस में थोड़ी भी दूरदर्शिता होती, तो यह समय उसके लिए बिहार में दोबारा मजबूत होने का स्वर्ण अवसर बन सकता था। उसे किसी ऐसे नेता को बिहार भेजना चाहिए जो जमीन पर काम करने वाला हो, संगठन खड़ा कर सके और चुनाव आने का इंतजार न करे बल्कि प्रतिदिन सक्रिय रहे। लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से ऐसी अपेक्षा करना वैसा ही है जैसे किसी सूखे कुएँ से पानी की उम्मीद करना सिद्धांततः संभव, व्यवहार में असंभव।
भारत की राजनीति अब एक रोचक संक्रमणकाल में है। पुरानी राजनीति दम तोड़ रही है, नई राजनीति पैदा होना चाहती है, पर मतदाता उसे जन्म नहीं लेने देते। लोग परिवर्तन का आह्वान करते हैं, पर परिवर्तन को वोट नहीं देते। नतीजा यह होता है कि देश उन्हीं नेताओं की पालकी ढोने पर मजबूर है जिनके पास न विचार हैं, न दृष्टि, न क्षमता केवल वंश का गर्व और तुष्टिकरण की राजनीति।
बिहार के इस परिणाम में समाज, राजनीति और लोकतंत्र का वह आईना दिखता है जो असहज तो है, पर सच है। और यह भी उतना ही सच है कि राजनीति में सुधार केवल नेताओं को बदलने से नहीं होगा; बदलाव तब आएगा जब समाज अपनी सोच बदलेगा। जब मतदाता तर्क को जगह देंगे, जब वे भीड़ की जगह विचारों को चुनेंगे, और जब वे जाति की जगह योग्यता को महत्व देंगे तभी लोकतंत्र में वास्तविक सुधार होगा। तब तक, चुनाव आते रहेंगे, परिणाम बदलते रहेंगे, पर राजनीति वही रहेगी मतदाताओं की सोच के अनुसार।

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