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महाराज जी के सपने और शिवपुरी की सच्चाई

 

शिवपुरी का नाम आते ही लोग इसे भगवान शिव की नगरी कहकर गर्व महसूस करते हैं। कहते हैं कि यहाँ हर दिशा में शिव की महिमा बसती है, हर कदम पर आस्था का अहसास होता है। हाल ही में जब बागेश्वर धाम के महाराज धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री शिवपुरी आए और 108 फीट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा बनाने का विचार रखा, तो कई लोगों को लगा कि शहर की पहचान अब और भी बड़ी हो जाएगी। इससे पर्यटन बढ़ेगा, लोग दूर-दूर से यहाँ आएँगे और शिवपुरी का नाम नई ऊँचाई पर जाएगा।

लेकिन यह वही शिवपुरी है जिसके दो चेहरे हैं। एक जो बाहर वालों को दिखाया जाता है और दूसरा जो अंदर से हर रोज सामने आता है। चमकते मंचों पर जो शिवपुरी दिखती है, वह अलग लगती है, और जमीन पर जो असली हालात हैं, वे अक्सर इसके बिल्कुल उलट निकलते हैं। कागज़ पर यह शिव की धरती है, पर कई बातें ऐसी हैं जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

इसी शहर में वार्ड क्रमांक 37 का महादेव मंदिर है, जहाँ एक साधारण-सी टीन शेड तक टिक नहीं पाई। वजह बताई गई कि अगर शेड रहेगी तो वहाँ शराबी बैठ जाएँगे। मज़ेदार और दुखद बात यह है कि यह आरोप किसी दूसरे धर्म के लोगों ने नहीं लगाए, बल्कि यही हमारे अपने लोग, जो खुद को शिवभक्त कहते हैं, वही इसका विरोध कर रहे थे। मंदिर की छाया से डरने वाले ये लोग मंदिर की गरिमा पर सवाल नहीं उठाते, बल्कि छाया से ही परेशानी मान लेते हैं। टीन शेड हटवाने वाले कौन थे, यह शहर जानता है, पर कोई कुछ बोलता नहीं।

ऐसे हालात देखकर लगता है कि शिवपुरी में आस्था जितनी मजबूत है, व्यवहार में उतने ही विरोधाभास भी मौजूद हैं। एक तरफ 108 फीट ऊँची प्रतिमा का सपना है, और दूसरी तरफ मंदिर के बाहर दस फीट की छाया भी बर्दाश्त नहीं होती। धर्म और पर्यटन बढ़ाने की बातें खूब होती हैं, लेकिन मंदिर में बैठने तक की साधारण सुविधा पर भी विवाद हो जाता है। भक्ति की बातें बड़ी-बड़ी की जाती हैं, पर असली भक्ति के समय वही लोग पीछे हट जाते हैं।

महाराज जी को शायद उस शिवपुरी की झलक नहीं मिली, जो कैमरों और भक्तों की भीड़ के पीछे छिपी होती है। यह वह शिवपुरी है जहाँ दिखावा ज़्यादा और सच्ची भक्ति कम है। जहाँ मंदिरों में आशीर्वाद से ज्यादा बहसें होती हैं और जहाँ आस्था से पहले राजनीति सामने आ जाती है। यहाँ रंगीन झाँकियाँ बड़ी शान से सजती हैं, पर जब असली धार्मिक काम का समय आता है, तब सबसे पहले रोड़े यही लोग अटकाते हैं।

108 फीट की प्रतिमा से किसी को कोई समस्या नहीं है। शिवपुरी के लोगों के दिल में भगवान शिव के लिए सम्मान और भक्ति हमेशा से रही है। लेकिन बड़े धार्मिक कामों में सबसे बड़ी रुकावट शहर की सोच और आपसी राजनीति बन जाती है। प्रतिमा का सपना जितना बड़ा है, उतना ही जरूरी यह भी है कि लोग पहले छोटी-छोटी बातों में भक्ति और सहयोग दिखाना सीखें।

प्रतिमा खड़ी कर देना आसान है, पर लोगों के दिलों में भक्ति खड़ी करना मुश्किल। शिवपुरी को पहले अपने भीतर की भक्ति को मजबूत करने की ज़रूरत है। बाहरी सजावट से ज़्यादा दिलों की सफाई ज़रूरी है। और मंदिर की छाया से डरने वालों को समझना होगा कि भगवान शिव की छाया डराने नहीं, बल्कि राह दिखाने आती है।

शिवपुरी को अब खुद को बदलने की ज़रूरत है। प्रतिमा जरूर बनेगी, समय भी बदलेगा, लोग भी आएँगे। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शहर के लोगों के अंदर की भक्ति भी उस ऊँचाई तक पहुँच पाएगी?

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