शिवपुरी में बागेश्वर कथा की दूसरी कहानी
एक बार फिर धार्मिक आयोजन की आड़ में कई तरह की गतिविधियों के चर्चे तेज़ हैं। जहां एक ओर लोग आस्था और आध्यात्मिक अनुभव की तलाश में जुट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मंचों के किनारों पर कुछ और ही हलचलें साफ दिखाई दे रही हैं। हलचलें, जिनमें श्रद्धा से अधिक रणनीति और संदेश से अधिक महत्वाकांक्षा की गूंज सुनाई देती है।
बागेश्वर धाम की कथा की घोषणा होते ही भीड़ उमड़ने लगी। लोग भक्ति, चमत्कार और समाधान की उम्मीद लेकर एक जगह इकट्ठा हुए। पर इसी भीड़ के बीच एक और मंच खड़ा होता दिखा ऐसा मंच जिसकी रोशनी पूजा-पाठ से ज्यादा व्यक्तिगत छवि और भविष्य की संभावनाओं पर टिकती है। धर्म के बड़े आयोजनों में राजनीति का प्रवेश नया नहीं है। यहां भी कुछ चेहरे अचानक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगे कोई खुद को समाजसेवी बताता रहा, कोई संत की तरह प्रस्तुत हुआ और कुछ तो ऐसे भी दिखे जो मानो इस पूरे आयोजन के सूत्रधार हों। जिन जगहों पर अध्यात्म की सादगी होनी चाहिए थी, वहां कैमरों की चमक और खास होने का दावा अधिक दिखाई दिया।
मंच पर मौजूद कुछ लोग हर क्षण यह एहसास दिलाने की कोशिश करते दिखे कि कथा के केंद्र में भगवान नहीं, बल्कि वही हैं। वहीं मीडिया के कुछ चेहरे भी ऐसे घूमे मानो उनके पास किसी अदृश्य अधिकार का प्रमाणपत्र हो, जिसके बल पर वे सत्य से ज्यादा अपने अहंकार को आगे रखते हों। इसी माहौल में सवालों की फुसफुसाहट शुरू हुई "क्या यह आयोजन केवल धार्मिक उद्देश्य से हो रहा है, या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक तैयारी भी छिपी है?" क्या आस्था और भीड़ का उपयोग भविष्य की राजनीति की जमीन मजबूत करने के लिए किया जा रहा है? क्या कथा का मंच चुनावी संदेश देने का माध्यम बनता जा रहा है?
जवाब कोई खुलकर नहीं देता, लेकिन संकेत बहुत कुछ कह जाते हैं। बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़, प्रसिद्धि और प्रचार इन तीनों का मिश्रण अक्सर राजनीति के लिए सबसे आसान रास्ता बन जाता है। जिस पहचान को बनाने में लोगों को वर्षों और करोड़ों का खर्च लगता है, वह कभी-कभी कुछ ही दिनों में हासिल हो जाती है, यदि मंच पर सही चेहरों का साथ मिल जाए। मंच पर दिखते राजनीतिक नेताओं की मुस्कान, भाषणों में कुछ खास नामों का उल्लेख, और भीड़ में कुछ विशेष समुदायों की बढ़ती सक्रियता ये सभी बातें लोगों की जिज्ञासा को और बढ़ाने का काम करती हैं। आम आदमी के मन में यह प्रश्न फिर खड़ा हो जाता है कि क्या वह श्रद्धा से आया है या उससे कुछ और उम्मीदें की जा रही हैं।
लेकिन इस सबके बीच एक तथ्य अपने आप में अटल है बागेश्वर महाराज के आगमन ने लोगों में आस्था की नई लहर जरूर पैदा की है। हजारों लोग समाधान और आशा की भावना के साथ कथा में शामिल हुए। कई लोगों ने इसे अपने लिए आध्यात्मिक अवसर माना, एक ऐसा क्षण जो जीवन की उलझनों में भरोसा देता है। यही इस पूरी घटना का सबसे दिलचस्प पहलू है जहां एक ओर धर्म और राजनीति आपस में घुलते-मिलते दिखाई देते हैं, वहीं भक्त का मन अभी भी सिर्फ भगवान की तलाश करता है। अंत में भीड़ छंट जाती है, मंच की रोशनी बुझ जाती है, चेहरे बदल जाते हैं लेकिन आस्था की लौ वही रहती है, शांत और स्थिर।
आज इस आयोजन को देखकर लगता है कि दो कथाएँ एक साथ लिखी जा रही हैं एक वह, जो कथा स्थल में सुनाई देती है, और दूसरी वह, जो मंच के पीछे तैयार होती है। कौन-सी कथा असल में लोगों के जीवन पर असर छोड़ेगी यह आने वाला समय ही बताएगा।

बेहतरीन निष्पक्ष विश्लेषण हेतु साधुवाद आभार, आपके दोनों नजरिये सटीक रहे, यदि अतिश्योक्ति न कहा जाय तो ये ग्लैमर का जमाबड़ा जिसका उद्देश्य महज लाइट में आना रहता है, को बाबा भी समझते होंगे। फिलहाल बिघटित सनातन(अपार जनसमूह)को एकत्रिकरण करना ही समय की मांग और राष्ट्रहित में है!! पुनः आपको एक हकीकत से रूबरू कराने बाले लेख हेतु धन्यवाद!!👍🙏👍
जवाब देंहटाएंआज के यथार्थ का सटीक विश्लेषण किया है।
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