RSS पर नजर, जमात पर खामोशी—आखिर क्यों? – दिवाकर शर्मा
भोपाल में हाल ही में समाप्त हुआ तब्लीगी जमात का विशाल इज्तिमा केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं था यह अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म देने वाला विषय भी है। दुनिया भर से लगभग 12 लाख लोगों का एक जगह एकत्र होना, 600 एकड़ में फैला चार दिनों का यह जमावड़ा, और इसके पीछे सक्रिय संगठन की अंतरराष्ट्रीय छवि इन सब बातों को अनदेखा कर देना किसी जागरूक राष्ट्र के लिए सम्भव नहीं होना चाहिए।
तब्लीगी जमात का इतिहास भी अपने-आप में प्रश्न खड़ा करता है। संगठन की स्थापना 1926 में दिल्ली में हुई यानी ठीक RSS की स्थापना (1925) के अगले वर्ष। किंतु दोनों संगठनों की विचारधारा, कार्यशैली और राष्ट्रदृष्टि में जमीन-आसमान का अंतर है। जहाँ RSS भारत को एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में संगठित करने, समाज में समरसता, सेवा और राष्ट्रनिर्माण की भावना जगाने का कार्य करता रहा है, वहीं तब्लीगी जमात का लक्ष्य धार्मिक विस्तारवाद माना जाता रहा है, जिसका दायरा वैश्विक और प्रभाव अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों तक फैला है।
सवाल यह है कि एक ऐसा संगठन, जिसे ईरान, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, रूस और सऊदी अरब जैसे देशों ने या तो प्रतिबंधित किया है या खतरनाक बताया है वह भारत में इतने बड़े पैमाने पर खुलेआम आयोजन करता है, और तथाकथित “तटस्थ” मीडिया इसे लगभग अनदेखा कर देती है।
जब RSS का एक छोटा सा कार्यक्रम भी कुछ मीडिया संस्थानों की सुर्खियों और विश्लेषणों का विषय बन जाता है, तब्लीगी जमात जैसे विवादित संगठन के विशाल इज्तिमे पर वही मीडिया चुप क्यों रहती है? क्या यह चयनात्मक सक्रियता नहीं है? क्या यह गहरी विचारधारात्मक पक्षधरताओं का संकेत नहीं देता?
रूस की सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में तब्लीगी जमात को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल बताया। सऊदी अरब ने 2021 में इसे “खतरनाक संगठन” करार दिया। मध्य एशिया के कई देशों ने इसे सामाजिक-सुरक्षा के लिए खतरा माना।
जब इतने देशों ने खतरा महसूस किया, तो भारत जैसे विशाल, विविध और संवेदनशील लोकतांत्रिक राष्ट्र को क्या सतर्क नहीं होना चाहिए? क्या भारत सरकार को यह नहीं पूछना चाहिए कि इन देशों ने इसे प्रतिबंधित क्यों किया? उनके अनुभव क्या रहे? उनके निर्णयों के पीछे कौन-से तथ्य और गतिविधियाँ थीं?
मध्य प्रदेश में हुआ यह आयोजन न केवल भीड़ के लिहाज से बड़ा था, बल्कि सुरक्षा, सामाजिक-सद्भाव और खुफिया जानकारी की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। क्या ऐसी गतिविधियों की सरकार द्वारा विस्तृत वीडियोग्राफी नहीं की जानी चाहिए? क्या लोकल इंटेलिजेंस को यह नहीं देखना चाहिए कि इतने बड़े दायरे में चल क्या रहा है, बाहर से कौन लोग आ रहे हैं, और किन उद्देश्यों से आ रहे हैं? क्या यह दायित्व केवल औपचारिकता भर रह जाना चाहिए या इसे एक गंभीर सुरक्षा-प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए?
विपरीत दिशा में, RSS का इतिहास पूरी तरह राष्ट्रसेवा और समाज निर्माण के कार्यों से भरा है। चाहे प्राकृतिक आपदा हो, चाहे सामाजिक समरसता का प्रश्न हो, चाहे राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा हर परिस्थिति में स्वयंसेवक सबसे आगे रहे हैं।
RSS देश को जोड़ने का काम करता है, जबकि तब्लीगी जमात जैसे संगठनों को कई देशों ने सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन और कट्टरपंथी गतिविधियों के आरोप में बैन किया है। एक ओर “राष्ट्रवाद की संस्कृति”, दूसरी ओर “संदिग्ध वैश्विक नेटवर्क” इन दोनों की तुलना अपने-आप में स्पष्ट है।
भारत एक उदार, लोकतांत्रिक राष्ट्र है लेकिन उदारता का अर्थ लापरवाही नहीं होता। सहिष्णुता का अर्थ आँखें बंद कर लेना नहीं होता। जब विश्व के अनेक राष्ट्र किसी संगठन को खतरा मान चुके हों, तब किसी भी जिम्मेदार सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह उसे गहराई से परखे, उसकी गतिविधियों को समझे और देश-हित को सर्वोपरि रखकर निर्णय ले। आज आवश्यकता है कि भारत प्रश्न पूछे सीधे, स्पष्ट और राष्ट्रहित में। सरकार भी, समाज भी, और मीडिया भी।
क्योंकि राष्ट्र सुरक्षा किसी “विचारधारा” का विषय नहीं यह अस्तित्व का प्रश्न है। और जब राष्ट्र की बात आती है, तब केवल एक संगठन है जिसका इतिहास, कार्यभार और निष्ठा पूरी तरह पारदर्शी और देशभक्त है RSS। राष्ट्रवाद की जड़ें वहीं हैं, और राष्ट्रहित की आशा भी वहीं टिकती है।
तब्लीगी जमात के भोपाल इज्तिमा के बाद यह प्रश्न और तीखे हो उठते हैं कि भारत कब जागेगा? और क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भारत छोड़ पाएँगे? यह उत्तर हमें ही देना है।

बेहतरीन राष्ट्रवादी प्रस्तुति हेतु आभार, आरएसएस पर पानी पी पी कर कोसने बाले तब्लीगी उर्फ थूकलीगी पर कब मूंह खोलेंगे या दही गजवा ए हिंद तक जमाये ही प्रयाण कर जायेगे!?
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