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7 जनवरी महायान नववर्ष विशेष : विदेशी नहीं, भारतीय है महायान की आत्मा – दिवाकर शर्मा

 

महायान नववर्ष केवल एक धार्मिक परंपरा या पंचांग की तिथि नहीं है, बल्कि यह भारत की उस प्राचीन बौद्धिक चेतना का प्रतीक है, जिसने समय, सीमाएँ और सभ्यताएँ लांघकर एशिया के विशाल भूभाग को संस्कारित किया। आज जब महायान बौद्ध परंपरा को चीन, जापान, कोरिया या वियतनाम से जोड़कर देखा जाता है, तब इतिहास के पन्नों में छिपा एक मौन सत्य बार-बार ध्यान खींचता है कि महायान का उद्गम, उसका दर्शन और उसकी आत्मा भारत की इसी पावन भूमि में विकसित हुई थी।

भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया मगध की धरती पर, उपदेश दिए सारनाथ में और महापरिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ। यही भारत आगे चलकर बौद्ध विचारधारा का वैश्विक केंद्र बना। ईसा पूर्व और ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में जब महायान विचारधारा का विकास हुआ, तब भारत केवल आध्यात्मिक साधना का ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के बौद्धिक विमर्श का केंद्र था। नागार्जुन जैसे महान आचार्य ने शून्यवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जो आज भी महायान दर्शन की रीढ़ माना जाता है। यह कोई साधारण दर्शन नहीं था, बल्कि अस्तित्व, करुणा और बोध के गहन चिंतन का परिणाम था।

नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी और तक्षशिला जैसे महाविहार केवल शिक्षण संस्थान नहीं थे, बल्कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति के स्तंभ थे। यहाँ से प्रशिक्षित भिक्षु ज्ञान लेकर मध्य एशिया, तिब्बत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचे। चीनी यात्री फाह्यान, ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा वृत्तांत इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि वे जिस महायान परंपरा को अपने देशों में ले गए, उसका मूल स्रोत भारत ही था। ये प्रमाण बताते हैं कि महायान किसी विदेशी भूमि की उपज नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की वैश्विक अभिव्यक्ति है।

महायान नववर्ष की अवधारणा भी इसी सांस्कृतिक प्रवाह में विकसित हुई। भारतीय परंपरा में नववर्ष का अर्थ केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, धर्माचरण और सामाजिक उत्तरदायित्व का नवा संकल्प रहा है। महायान में नववर्ष बोधिसत्व मार्ग को पुनः स्मरण करने का अवसर है, वह मार्ग जहाँ व्यक्ति स्वयं के मोक्ष से पहले समाज और समस्त प्राणियों के कल्याण को प्राथमिकता देता है। यह भाव सीधे-सीधे भारतीय सनातन दृष्टि से जुड़ता है, जहाँ त्याग, सेवा और करुणा को सर्वोच्च मूल्य माना गया है।

यह समझना भी आवश्यक है कि बौद्ध परंपरा सनातन परंपरा से अलग होकर भी उसी भारतीय-सनातन सांस्कृतिक भूमि से उत्पन्न है। अर्थात वह सनातन से जन्मी है, पर उसकी हूबहू शाखा नहीं है। बुद्ध किसी विदेशी भूमि या बाहरी संस्कृति से नहीं आए। उनका जन्म, साधना, ज्ञान और उपदेश सनातन भारत की सामाजिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में ही हुए। उस काल में वेद, उपनिषद, श्रमण परंपरा, योग, तप, कर्म और पुनर्जन्म जैसे विचार पहले से प्रचलित थे। बुद्ध ने इन्हीं विचारों से संवाद किया, कुछ को स्वीकार किया, कुछ की आलोचना की और कुछ को नए रूप में प्रस्तुत किया।

बौद्ध परंपरा में कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत स्पष्ट रूप से मौजूद है। अहिंसा, करुणा, तप और वैराग्य सनातन चिंतन के मूल तत्व हैं। संन्यास और साधना का मार्ग श्रमण परंपरा का ही विस्तार है। बुद्ध ने ईश्वर-निरपेक्षता पर ज़ोर दिया, पर धर्म अर्थात धम्म को एक नैतिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया। भिन्नताओं की बात करें तो बुद्ध ने वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं किया, आत्मा की सनातन अवधारणा के स्थान पर अनात्म का सिद्धांत दिया और यज्ञ, कर्मकांड तथा जाति आधारित श्रेष्ठता का विरोध किया। इसलिए बौद्ध परंपरा को सनातन से पूरी तरह अलग या विरोधी कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है और इसे सनातन की सीधी शाखा कहना भी दार्शनिक रूप से पूर्ण सत्य नहीं। सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि बौद्ध परंपरा सनातन भारत की ही एक श्रमण-आधारित दार्शनिक धारा है, जो उसी सांस्कृतिक चेतना से निकली, उसी भूमि पर विकसित हुई और उसी सभ्यता का वैश्विक विस्तार बनी।

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि गुप्त काल में महायान बौद्ध धर्म को राजाश्रय प्राप्त हुआ। कला, स्थापत्य और मूर्तिकला में बुद्ध और बोधिसत्वों की जो प्रतिमाएँ बनीं, वे भारतीय सौंदर्यबोध और आध्यात्मिक गहराई का उदाहरण हैं। अजन्ता और एलोरा की गुफाएँ हों या सारनाथ की मूर्तिकला, महायान दर्शन का भारतीय स्वरूप आज भी पत्थरों में अंकित है। यही स्वरूप आगे चलकर एशिया के अन्य देशों में स्थानीय रंगों के साथ विकसित हुआ, किंतु उसकी आत्मा भारतीय ही रही।

रहस्य यह है कि जिस महायान नववर्ष को आज कई लोग विदेशी परंपरा मान लेते हैं, वह वास्तव में भारत की सांस्कृतिक विजय का प्रमाण है। यह विजय न तो किसी युद्ध से प्राप्त हुई, न ही किसी साम्राज्य विस्तार से, बल्कि विचार, आचरण और करुणा के माध्यम से हुई। राष्ट्रवादी दृष्टि से यह भारत की उस शक्ति का स्मरण है, जिसने बिना किसी आक्रामकता के विश्व को दिशा दी।

आज के समय में यह भी विचारणीय है कि कुछ लोग स्वयं को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताकर हिंदुत्व और सनातन परंपरा का उपहास या अपमान करते हैं। ऐसा करते समय वे यह भूल जाते हैं कि बुद्ध और बौद्ध परंपरा उसी सांस्कृतिक धरातल से निकली है, जिसे वे नकारने का प्रयास करते हैं। वास्तविक बौद्ध धर्म न तो घृणा सिखाता है, न विभाजन। वह करुणा, संवाद और विवेक का मार्ग दिखाता है। सनातन भारत का विरोध करते-करते यदि कोई बुद्ध के मूल संदेश मध्यम मार्ग से ही दूर चला जाए, तो यह बौद्ध धर्म की आत्मा के साथ अन्याय है।

महायान नववर्ष हमें यह याद दिलाता है कि भारत की सभ्यता किसी एक मत या पंथ तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने विभिन्न दर्शनों को जन्म दिया, पोषित किया और विश्व के साथ साझा किया। आज महायान नववर्ष को भारतीय दृष्टि से समझना केवल अतीत का गौरवगान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध का विषय है। यह स्मरण कराता है कि भारत केवल परंपराओं का उपभोक्ता नहीं, बल्कि सदियों तक मानवता का पथप्रदर्शक रहा है। महायान नववर्ष उसी मौन लेकिन दृढ़ सत्य की घोषणा है कि भारत की आत्मा करुणा, ज्ञान और लोकमंगल में निहित है और यही उसकी वास्तविक राष्ट्रवादी पहचान है।

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