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8 जनवरी | अर्थ रोटेशन डे : भारत से विश्व तक गति का ज्ञान

 



पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना और उसका ब्रह्मांडीय क्रम केवल आधुनिक विज्ञान की खोज नहीं है। यह वह गहन सत्य है जिसे सनातन भारत ने हजारों वर्ष पहले समझ लिया था। आज जिसे हम “अर्थ रोटेशन” कहते हैं, वह प्राचीन भारतीय खगोल और वेदों में स्पष्ट रूप से वर्णित है। ऋषियों ने पृथ्वी के घूर्णन, सूर्य की गति और तारा मंडल की क्रियाओं का अध्ययन करके इसे समय, दिन-रात और जीवन पद्धति से जोड़ा।

ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में सूर्य, चंद्र और ग्रहों की गतियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋषियों ने कहा कि पृथ्वी स्थिर प्रतीत होती है, किंतु वह निरंतर गति में है। अथर्ववेद में पृथ्वी को गतिशील माता कहा गया है, जो स्वयं घूमती है और सभी जीवों का पालन करती है। यही विचार आज वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी के रोटेशन के बराबर है।

महान खगोलविद आर्यभट्ट ने पाँचवीं शताब्दी में स्पष्ट रूप से लिखा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, और इसी कारण सूर्य, चंद्रमा और तारे हमें गतिशील प्रतीत होते हैं। उनके अनुसार दिन और रात पृथ्वी के घूर्णन का परिणाम हैं। इस दृष्टिकोण से आर्यभट्ट ने पृथ्वी के घूर्णन को एक वैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया, जो उस समय के वैश्विक खगोल ज्ञान से कई शताब्दियों आगे था। इसके बाद वराहमिहिर ने सूर्य, चंद्र और ग्रहों की गति की गणना पृथ्वी के रोटेशन के आधार पर की। भास्कराचार्य ने ग्रहों की गति और खगोलीय घटनाओं का वर्णन करते समय पृथ्वी के घूर्णन को मानक माना।

सूर्य, चंद्र और नक्षत्रों की गति का ध्यान रखना केवल खगोलशास्त्र नहीं था, बल्कि इसका आध्यात्मिक और सामाजिक उपयोग भी प्राचीन भारत में किया गया। ब्रह्ममुहूर्त, संध्या, अमावस्या, पूर्णिमा और यज्ञ की तिथियों का निर्धारण सीधे पृथ्वी के घूर्णन और सूर्य की स्थिति पर आधारित था। हमारे पर्व, व्रत और त्यौहार जैसे मकर संक्रांति, छठ, दशहरा और दीपावली भी पृथ्वी के घूर्णन, सूर्य की स्थिति और ऋतुओं के परिवर्तन के ज्ञान पर आधारित हैं। यही कारण है कि भारत में खगोल, धर्म और जीवन पद्धति एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए थे।

आज जिस दिन को “अर्थ रोटेशन डे” कहा जाता है, वह आधुनिक विज्ञान के आधार पर मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दिन बीसवीं शताब्दी में खगोल विज्ञान के प्रचार और शिक्षा हेतु स्थापित हुआ। हालांकि इसका वास्तविक आधिकारिक इतिहास आधुनिक है, परन्तु सांस्कृतिक और दार्शनिक आधार हजारों वर्षों से भारत में रहा है। यह दिन पृथ्वी के घूर्णन को याद करने के लिए बनाया गया है, पर भारत के लिए यह कोई नया ज्ञान नहीं है। यह हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा की आधुनिक मान्यता मात्र है।

सनातन परंपरा में पृथ्वी का घूर्णन केवल भौतिक घटना नहीं था। इसे जीवन, कर्म, धर्म और समय के साथ जोड़कर देखा गया। ऋषियों ने स्पष्ट किया कि जैसे पृथ्वी घूमती है, वैसे ही जीवन में भी परिवर्तन और गति निरंतर रहती है। यही वह दृष्टि है जिससे मानव ने संतुलन, विवेक और ज्ञान की ओर कदम बढ़ाया।

भारतीय खगोल और वेदों की यह समझ विश्व को दिशा देने वाली थी। प्राचीन भारत ने न केवल पृथ्वी के घूर्णन को समझा, बल्कि उसके परिणामों जैसे दिन-रात, ऋतु, जलवायु और ग्रह-नक्षत्र की क्रियाओं को जीवन पद्धति में शामिल किया। यही कारण है कि भारत की संस्कृति विज्ञान और आध्यात्म का अद्भुत सम्मिलन प्रस्तुत करती है।

जब हम आज अर्थ रोटेशन डे मनाते हैं, तो यह केवल वैज्ञानिक सत्य का उत्सव नहीं है। यह उस सनातनी चेतना का स्मरण है जिसने मानव को ब्रह्मांडीय नियमों से जोड़कर जीने का मार्ग दिखाया। यही चेतना भारत को विश्वगुरु बनाने वाली थी। इसके माध्यम से समझ आता है कि भारत केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि सदियों से उसने विज्ञान, खगोलशास्त्र और दर्शन के क्षेत्र में विश्व को दिशा दी।

अर्थ रोटेशन डे हमें यह याद दिलाता है कि भारत की प्राचीन विज्ञान चेतना, खगोल ज्ञान और दार्शनिक दृष्टि न केवल ऐतिहासिक गौरव है, बल्कि आज भी विश्व को दिशा देने का प्रेरक स्रोत है। यह दिन यह स्मरण कराता है कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति, विज्ञान और ज्ञान परंपरा में निहित है, और यही उसकी वास्तविक राष्ट्रवादी पहचान है।

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