जगदीश जादौन और दिनेश जोराठी – ज़ुबान की आग, समाज निशाने पर
यूजीसी प्रकरण को लेकर देशभर में चल रही बहस ने जहाँ नीतिगत सवाल खड़े किए हैं, वहीं दुर्भाग्यपूर्ण रूप से कुछ स्थानों पर यह विमर्श सामाजिक विष-वमन और आपसी वैमनस्य का रूप लेता जा रहा है। शिवपुरी जिले में हाल ही में सामने आए दो बयान इसी चिंताजनक प्रवृत्ति के उदाहरण हैं, जो न केवल असंयमित हैं बल्कि राष्ट्र और समाज दोनों के हितों के प्रतिकूल भी हैं।
एक ओर स्वयं को सत्ताधारी दल से जोड़ने वाले भाजपा नेता जगदीश जादौन का मंच से दिया गया बयान है, जिसमें उन्होंने असहमति जताने वालों के लिए अमर्यादित, हिंसक और आपराधिक भाषा का प्रयोग किया। “नंगा करके पेट्रोल डालकर आग लगा देंगे” जैसे शब्द किसी भी सभ्य, लोकतांत्रिक और राष्ट्रवादी सोच के अनुरूप नहीं हो सकते। सत्ता या संगठन से जुड़ा व्यक्ति यदि इस प्रकार की धमकी देता है तो वह न केवल कानून को चुनौती देता है बल्कि अपनी ही विचारधारा की नैतिक जमीन को भी कमजोर करता है।
दूसरी ओर, इस बयान की प्रतिक्रिया में भीम आर्मी के प्रदेश उपाध्यक्ष दिनेश जोराठी द्वारा फेसबुक लाइव में दिया गया वक्तव्य भी उतना ही निंदनीय है। सांसद चंद्रशेखर आज़ाद को बड़ा भाई बताते हुए नीला सलाम और जय भीम के उद्घोष के बीच मनुवादी जैसे शब्दों का प्रयोग कर घर में घुसकर मारने तक की धमकी देना किसी सामाजिक न्याय की लड़ाई को नहीं बल्कि खुलेआम अराजकता को बढ़ावा देता है। विचारधारा के नाम पर पूरे समाज को गाली देना और हिंसा की चेतावनी देना न संविधानसम्मत है और न ही सामाजिक सौहार्द के पक्ष में।
राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से देखा जाए तो दोनों ही बयान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों में संयम का अभाव है, दोनों में कानून के प्रति अवहेलना है और दोनों ही समाज को बांटने वाले हैं। राष्ट्रवाद का अर्थ न तो मंच से आग लगाने की धमकी देना है और न ही लाइव वीडियो में घर में घुसकर मारने की चेतावनी देना। राष्ट्रवाद का अर्थ है संविधान, कानून और सामाजिक मर्यादा के भीतर रहकर अपनी बात कहना, असहमति जताना और समाधान खोजना।
यह भी समझना आवश्यक है कि यूजीसी जैसे संवेदनशील विषय पर बहस का रास्ता संवाद से होकर जाता है, दहशत और धमकी से नहीं। यदि हर असहमति का उत्तर हिंसा की भाषा में दिया जाएगा तो न नीति बचेगी, न समाज और न ही राष्ट्र की एकता। राजनीतिक या सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी आम नागरिकों से कहीं अधिक होती है, क्योंकि उनके शब्द समाज की दिशा तय करते हैं।
शिवपुरी में दिए गए ये दोनों बयान चेतावनी हैं कि यदि समय रहते संयम, विवेक और कानून का पालन नहीं किया गया तो विचारधाराओं की लड़ाई सामाजिक शांति को लील सकती है। राष्ट्रहित इसी में है कि ऐसे बयानों की स्पष्ट निंदा हो, कानून अपना काम करे और समाज को यह संदेश जाए कि न धमकी स्वीकार्य है और न हिंसा, चाहे वह किसी भी रंग, नाम या विचारधारा के झंडे तले क्यों न दी जाए।

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