दयानंद सरस्वती और कुरान : वह सच जो छुपा दिया गया
इतिहास कभी-कभी ऐसे मोड़ों पर खड़ा मिलता है, जहाँ एक व्यक्ति का निर्णय सदियों की दिशा बदल देता है। ऐसा ही एक निर्णय था भाषा का निर्णय। यह निर्णय न तलवार से लिया गया, न सत्ता से, बल्कि ज्ञान, साहस और राष्ट्रबोध से लिया गया। उस कालखंड में, जब भारत पराधीन था, समाज खंड-खंड में बंटा था और धर्म कुछ गिने-चुने लोगों की बपौती बन चुका था तब एक संन्यासी ने भाषा को हथियार बनाया।
यह संन्यासी कोई साधारण विद्वान नहीं था। संस्कृत का ऐसा अप्रतिम ज्ञाता, जिसकी वाणी से शास्त्र स्वयं बोलते थे। जिसकी पहचान वैदिक मनीषी के रूप में थी, जिसने वेदों को केवल पढ़ा नहीं, जिया था। किंतु उसी व्यक्ति ने एक दिन यह निश्चय किया कि यदि ज्ञान जन-जन तक नहीं पहुँचा, तो वह ज्ञान नहीं, कैद है। और यहीं से इतिहास में एक मौन क्रांति का आरंभ हुआ।
उस समय वेद, शास्त्र, दर्शन सब संस्कृत की दुर्गम दीवारों के भीतर बंद थे। ब्राह्मणों की एक संकीर्ण परिधि ने इन्हें अपने स्वार्थ या भयवश जनसामान्य से दूर रखा था। परिणाम यह हुआ कि जिस समाज को वेदों का अधिकारी होना चाहिए था, वही उनसे अनभिज्ञ बना दिया गया। ऐसे में इस संन्यासी ने जो किया, वह केवल साहित्यिक कार्य नहीं था वह सामाजिक विस्फोट था।
वेदों का भाष्य जनभाषा में। शास्त्रों के उद्धरण सामान्य मनुष्य की समझ में। धर्म का लोकतंत्रीकरण। यह सब एक साथ घटित हुआ। और वह भाषा बनी "हिन्दी"। न मातृभाषा होने के कारण, न किसी क्षेत्रीय आग्रह से, बल्कि इसलिए कि वह भारत की आत्मा तक पहुँचने का माध्यम थी। यह निर्णय किसी हिन्दीभाषी ने नहीं कराया, बल्कि एक बंगाली विचारक के सुझाव पर एक गुजराती संत ने लिया और यही इसे और भी रहस्यमय बनाता है।
कल्पना कीजिए 47 वर्ष का एक संस्कृत का विश्वविख्यात विद्वान, जिसने जीवन भर उसी भाषा में सोचा, बोला, लिखा वह एक दिन सब कुछ छोड़कर हिन्दी अपना लेता है। न संकोच, न विलंब। इतिहास में ऐसा उदाहरण दुर्लभ नहीं, लगभग अनुपलब्ध है। उसी दिन हिन्दी केवल भाषा नहीं रही, वह राष्ट्र की धड़कन बननी शुरू हो गई।
पर यह यात्रा यहीं नहीं रुकी। जिस व्यक्ति ने वेदों को हिन्दी में उतारा, उसी ने इस्लाम की पवित्र पुस्तक कुरआन को भी हिन्दी में अनुदित करवाया। यह तथ्य आज भी बहुतों को असहज करता है। क्योंकि यह उस कथा को तोड़ता है, जिसमें उन्हें केवल एक धर्म का पक्षधर बताने की सुविधा मिलती है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी और असुविधाजनक है।
कुरआन का हिन्दी अनुवाद यह कोई प्रशंसा या विरोध का कार्य नहीं था। यह सत्य को सामने लाने का प्रयास था। ताकि भ्रम न रहे, ताकि अंधविश्वास न पनपे, ताकि तुलना और विवेक संभव हो। यह कार्य न तो किसी इस्लामी विद्वान ने किया, न किसी औपनिवेशिक सत्ता ने बल्कि उसी वैदिक ऋषि ने, जिसे आज कुछ लोग गाली देने में भी संकोच नहीं करते।
विडंबना देखिए कि जो व्यक्ति कुरआन की वास्तविक शिक्षाओं को सबसे पहले हिन्दी समाज के सामने लाया, उसी पर कुरआन का अपमान करने का आरोप लगाया गया। जिनकी शैली से बाद के सभी खंडनात्मक ग्रंथ प्रेरित हुए, उन्हें ही अज्ञानी कहा गया। यह इतिहास की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है।
और भाषा के मोर्चे पर यह वही व्यक्ति था, जिसने पराधीन भारत में हिन्दी को राष्ट्रीय एकता का सूत्र माना। जब सरकारी कामकाज उर्दू-फारसी और अंग्रेज़ी में चलता था, तब उसने हिन्दी को राजभाषा बनाने का स्वप्न देखा। केवल देखा नहीं उसके लिए राष्ट्रव्यापी चेतना खड़ी की। हज़ारों नहीं, लाखों हस्ताक्षर। जन-जन की आवाज़। यह कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं था, यह राष्ट्रीय चेतना का उदय था।
आज जब हिन्दी राजभाषा है, जब संविधान में उसका स्थान सुरक्षित है, तब बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी नींव किसने रखी। यह कोई सत्ता-संचालित प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक सन्यासी का राष्ट्र के नाम किया गया यज्ञ था मन, वचन और कर्म से।
यह सब किसी संयोग का परिणाम नहीं था। यह उस दृष्टि का परिणाम था, जो भारत को केवल भूगोल नहीं, चेतना मानती थी। जो भाषा को संवाद नहीं, संस्कृति का वाहक समझती थी। और जो धर्म को भय नहीं, विवेक का मार्ग मानती थी।
इतिहास के इन पन्नों में बहुत कुछ ऐसा है, जिसे जानबूझकर धुंध में रखा गया है। लेकिन सत्य का स्वभाव है वह देर से सही, सामने आता जरूर है। और जब आता है, तो कई स्थापित कथाओं को असहज कर देता है। महर्षि दयानन्द कोई व्यक्ति नहीं थे। वे एक विचार थे जो आज भी जीवित है, चुनौती देता है, और प्रश्न पूछता है। प्रश्न यह नहीं है कि उन्होंने क्या किया। प्रश्न यह है कि हम उसे समझने का साहस रखते हैं या नहीं।
.jpeg)
एक टिप्पणी भेजें