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भारत बंद नहीं, भारत का भविष्य चाहिए – दिवाकर शर्मा

 

भारत कोई निर्जीव भूखंड नहीं है जिसे जब इच्छा हो बंद कर दिया जाए। यह केवल सड़कों, इमारतों और कार्यालयों का समूह नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आशा, परिश्रम, आस्था और संस्कारों का जीवंत प्रवाह है। भारत हमारे लिए एक राष्ट्र से कहीं अधिक है। यह हमारी पहचान है, हमारी चेतना है और हमारी माता है। इसलिए जब भी भारत बंद जैसे आह्वान सामने आते हैं, तो केवल एक राजनीतिक या सामाजिक विरोध नहीं दिखता, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को आहत करने वाला विचार दिखाई देता है।

UGC से जुड़े जिन कानूनों को अन्यायी कहा जा रहा है, उन पर असहमति व्यक्त करना पूरी तरह लोकतांत्रिक अधिकार है। सवर्ण समाज के विद्यार्थियों और शिक्षकों के भविष्य को लेकर चिंता होना भी स्वाभाविक है। किसी भी ऐसे कानून पर सवाल उठना चाहिए जो असंतुलन पैदा करे, समाज में अविश्वास बढ़ाए या शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र को वर्ग संघर्ष की ओर धकेले। इन चिंताओं को नकारा नहीं जा सकता और न ही नज़रअंदाज़ किया जाना चाहिए। लेकिन विरोध का स्वरूप क्या हो, यह उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है जितना स्वयं विरोध का कारण।

भारत बंद का विचार सुनते ही सबसे पहले जिन लोगों पर इसका असर पड़ता है, वे न तो नीति निर्माता होते हैं और न ही सत्ता के गलियारों में बैठे लोग। इसका सीधा प्रहार उस आम नागरिक पर होता है जो रोज़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता है। वह दिहाड़ी मजदूर जो एक दिन काम न करे तो उसके घर चूल्हा नहीं जलता, वह छात्र जो परीक्षा देने निकलता है, वह मरीज जिसे समय पर अस्पताल पहुँचना होता है, वह छोटा दुकानदार जिसकी रोज़ की कमाई ही उसकी पूंजी होती है। भारत बंद सरकार को नहीं रोकता, वह देश की सामान्य जीवन-धारा को रोक देता है।

यह कहना कि भारत बंद अपने बच्चों के भविष्य के लिए किया जा रहा है, सुनने में भावुक लग सकता है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। बच्चों का भविष्य शिक्षा, शांति, स्थिरता और अवसरों से बनता है, अवरोधों और अराजकता से नहीं। जब स्कूल, कॉलेज, परिवहन और बाज़ार बंद होते हैं, तब सबसे अधिक नुकसान उसी युवा वर्ग को होता है जिसके नाम पर यह बंद बुलाया जाता है। विरोध का यह तरीका अपने उद्देश्य को ही कमजोर कर देता है।

भारत एक ऐसा देश है जिसने हमें बोलने, लिखने और असहमति जताने का संवैधानिक अधिकार दिया है। इसी भारत में खड़े होकर भारत को ही बंद करने का आह्वान करना एक गंभीर विरोधाभास है। राष्ट्र के भीतर न्याय की मांग राष्ट्र के विरुद्ध खड़े होकर नहीं की जा सकती। जो आंदोलन अपनी ही भूमि को पीड़ा देता है, वह नैतिक रूप से दुर्बल हो जाता है, चाहे उसके तर्क कितने ही मजबूत क्यों न हों।

इतिहास भी यही सिखाता है कि जिन आंदोलनों ने संवाद, तर्क, बौद्धिक संघर्ष और संवैधानिक मार्ग अपनाया, वे स्थायी परिवर्तन ला सके। वहीं जिन आंदोलनों ने जबरन बंद, अवरोध और दबाव की राह चुनी, वे कुछ समय की सुर्खियाँ तो बने, पर अंततः समाज को बाँटने और अपने ही उद्देश्य को नुकसान पहुँचाने का कारण बने। भारत बंद की राजनीति समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या को और जटिल करने का माध्यम बनती है।

विरोध होना चाहिए, लेकिन वह राष्ट्र की मर्यादा के भीतर होना चाहिए। ज्ञापन दिए जाएँ, अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया जाए, संसद और सरकार से सीधा संवाद किया जाए, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों के माध्यम से जनमत तैयार किया जाए। यही वह रास्ते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करते हैं और आंदोलन को सम्मान दिलाते हैं। सड़कें जाम करना, जीवन ठप करना और भय का वातावरण बनाना किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकता।

भारत माँ है और माँ के प्रति विरोध का अर्थ आत्ममंथन और सुधार की मांग होता है, न कि उसे पीड़ा पहुँचाना। माँ को कष्ट देकर उसकी संतान कभी मजबूत नहीं हो सकती। इसलिए UGC जैसे विषयों पर असहमति रखते हुए भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत बंद समाधान नहीं है। भारत को चलने दीजिए, उसकी सांसों को थामिए मत। क्योंकि जब भारत चलता है, तभी विचार आगे बढ़ते हैं और जब विचार आगे बढ़ते हैं, तभी भविष्य सुरक्षित होता है।

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1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत बढ़िया लेख लिखा है आपने । शब्दों का चयन इसे अधिक प्रभावशाली बनाता है। भारत मे जातिगत भेदभाव नहीं होना चाहिए । इससे जातिगत मनमुटाव की स्तिथि निर्मित होती है । हम सब हिन्दू एक !!

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