भारत भवन पर उठे सवाल: विजय मनोहर तिवारी की चिट्ठी से हिला संस्कृति विभाग
भारत भवन, विवाद और एक न्यासी की पीड़ा
मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक माने जाने वाले भारत भवन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार यह सवाल किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि स्वयं भारत भवन के न्यासी और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी की कलम से उठे हैं। माननीय संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र लोधी को लिखे गए उनके पत्र ने भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल (बीएलएफ) और भारत भवन के संबंधों पर तीखी बहस को जन्म दे दिया है।
विजय मनोहर तिवारी का पत्र केवल एक असहमति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चिंता का दस्तावेज़ है। वे स्पष्ट करते हैं कि उनका सरोकार किसी वैचारिक टकराव से नहीं, बल्कि भारत भवन की गरिमा, उसकी नीति और उसकी छवि से है। एक न्यासी के रूप में और पिछले तीन दशकों से एक दर्शक-श्रोता के रूप में भारत भवन से जुड़े रहने के कारण उनका यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर क्यों भारत भवन बार-बार विवादों का अखाड़ा बनता जा रहा है।
पत्र में यह तथ्य सामने आता है कि भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल को पिछले आठ वर्षों से भारत भवन में आयोजन की अनुमति दी जा रही है, जबकि राज्य की अन्य साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं को यह अवसर नहीं मिलता। यही नहीं, बीएलएफ को शासन से आर्थिक सहायता भी दी जाती है। यह असमानता स्वयं न्यास मंडल की बैठकों में भी प्रश्न बनकर उभरी, लेकिन न्यासियों की आपत्तियों को दरकिनार कर आयोजन लगातार जारी रहा। यह स्थिति भारत भवन की “एक समान नीति” के सिद्धांत पर सीधा आघात मानी जा रही है।
विजय मनोहर तिवारी का आरोप केवल प्रशासनिक पक्षपात तक सीमित नहीं है। वे यह भी संकेत देते हैं कि बीएलएफ में जानबूझकर ऐसे विषय चुने जाते हैं, जिनसे विवाद खड़े हों और मीडिया का ध्यान आकर्षित किया जा सके। उनका मानना है कि जब किसी आयोजन का जनता से वास्तविक जुड़ाव नहीं बन पाता, तो भीड़ और चर्चा जुटाने के लिए विवाद को ही हथियार बनाया जाता है। दुर्भाग्य यह है कि इस प्रक्रिया में भारत भवन की छवि बार-बार धूमिल होती है, जबकि लाभ केवल आयोजकों को मिलता है।
तिवारी ने अपने पत्र में इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल का उदाहरण देकर यह प्रश्न और तीखा कर दिया है। इंदौर का आयोजन वर्षों से लोकप्रिय, शालीन और विवाद-मुक्त रहा है, जहाँ देश-विदेश के चर्चित लेखक आए, लेकिन कभी भी किसी सत्र ने अनावश्यक वैचारिक टकराव को जन्म नहीं दिया। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि भोपाल में ही भारत भवन बार-बार विवादों का केंद्र क्यों बनता है।
पत्र का सबसे संवेदनशील हिस्सा तब सामने आता है, जब तिवारी बाबर जैसे आक्रांता को विमर्श के केंद्र में लाने पर आपत्ति जताते हैं। उनका कहना है कि ऐसे समय में, जब देश अपनी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की चेतना से गुजर रहा है, शासन की सहायता से आयोजित कार्यक्रमों में ऐसे विषय न केवल अनुपयुक्त हैं, बल्कि भारत की आत्मा के वर्तमान प्रवाह के विपरीत भी हैं। मध्यप्रदेश की अपनी समृद्ध विरासत—राजा भोज, विक्रमादित्य, रानी कमलापति, भीमबैठका, उदयपुर जैसे विषय—विमर्श के लिए पर्याप्त हैं, फिर विवादास्पद इतिहास को केंद्र में लाने की ज़िद क्यों?
विजय मनोहर तिवारी का यह पत्र एक स्पष्ट सुझाव के साथ समाप्त होता है—भारत भवन को भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल जैसे विवादास्पद आयोजनों से अलग कर दिया जाए। शासन यदि बीएलएफ को सहायता देना चाहता है तो वह अन्य स्थानों पर आयोजन कर सकता है, लेकिन भारत भवन जैसी सांस्कृतिक धरोहर को बार-बार बदनामी के घेरे में लाना उचित नहीं है।
यह पत्र केवल एक व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जो भारत भवन को एक जीवंत, समावेशी और सम्मानित कला केंद्र के रूप में देखना चाहती है। अब यह शासन और संस्कृति विभाग पर निर्भर करता है कि वह इस चेतावनी को गंभीरता से लेता है या एक और विवाद को भारत भवन के खाते में जुड़ने देता है।

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