आख़िर कौन है सामान्य वर्ग?
आख़िर कौन है सामान्य वर्ग? यह प्रश्न आज किसी किताब का नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का है जो हर चुनाव में सबसे पहले लाइन में खड़ा होता है, हर संकट में सरकार के साथ खड़ा होता है और हर फैसले के बाद खुद को अकेला पाता है। सामान्य वर्ग कोई जाति नहीं, बल्कि एक स्थिति बन चुका है ऐसी स्थिति, जिसमें अधिकार कम और दायित्व अधिक हैं, जिसमें कर्तव्य अनिवार्य हैं और संरक्षण शून्य।
सामान्य वर्ग वही है, जिस पर बिना प्रारंभिक जांच के कठोर कानून लागू हो सकते हैं, पर उसकी सुनवाई के लिए कोई विशेष आयोग नहीं। वही है, जिसे जातिसूचक शब्दों से अपमानित करना सामाजिक अपराध नहीं माना जाता, पर यदि वह प्रतिक्रिया दे दे तो कानून तुरंत जाग जाता है। वह लोकतंत्र में वोट डाल सकता है, सरकार बना सकता है, पर सैकड़ों लोकसभा और हजारों विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार उससे छीना हुआ है। उसकी भूमिका मतदाता तक सीमित है, प्रतिनिधि बनने तक नहीं।
जिस देश में हर वर्ग के लिए आयोग हैं, योजनाएँ हैं, आरक्षण है, संरक्षण है वहीं सामान्य वर्ग के नाम पर केवल “समायोजन” है। न कोई आयोग, न कोई विशेष योजना, न कोई संवैधानिक सुरक्षा। उसके लिए समानता का अर्थ है असमान बोझ। स्कूल में उसके बच्चे चार गुनी फीस दें, प्रतियोगी परीक्षा में अधिक अंक लाएँ, नौकरी में कम अवसर पाएँ और पदोन्नति में वर्षों पीछे धकेल दिए जाएँ यह सब कानूनन वैध है।
अजीब विडंबना है कि जिस वर्ग को सबसे अधिक दंडित करने के लिए संस्थाएँ बनाई गईं, वही वर्ग सबसे अधिक करदाता है, सबसे बड़ा मतदाता है और सबसे अधिक “राष्ट्रभक्त” भी। सभाओं में ज़मीन पर बैठकर भी वह अच्छे शासन का सपना देखता है, सत्ता को सौंपता है, उम्मीद करता है और बदले में मौन पाता है। सरकारें बदलती हैं, नारे बदलते हैं, पर सामान्य वर्ग की स्थिति जस की तस रहती है।
इसके बावजूद, यही वर्ग है जो आज भी कहता है धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो। अपमान, उपेक्षा और भेदभाव के बाद भी वह समाज तोड़ने की नहीं, जोड़ने की बात करता है। शायद इसी सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझ लिया गया है।
“सबका साथ, सबका विकास” के नारे में सामान्य वर्ग का स्थान कहाँ है यह प्रश्न अब टालने योग्य नहीं रहा। क्योंकि जब सबसे अधिक देने वाला ही खुद को लुटा-पिटा, ठगा और असहाय महसूस करने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या किसी एक वर्ग की नहीं, व्यवस्था की है। सामान्य वर्ग आज विशेषाधिकार नहीं, केवल न्याय और समानता की माँग कर रहा है और लोकतंत्र में इससे बड़ा, इससे वैध कोई आग्रह हो भी नहीं सकता।

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