10 जनवरी | विश्व हिंदी दिवस विशेष : हिंदी — राष्ट्र की आत्मा, विज्ञान की भाषा और विश्व की चेतना – दिवाकर शर्मा
10 जनवरी | विश्व हिंदी दिवस विशेष
विश्व हिंदी दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस आत्मगौरव का स्मरण है, जो भारत को उसकी भाषा से मिलता है। हिंदी शब्दों का संग्रह मात्र नहीं है, यह भारत की चेतना का प्रवाह है। जिस भूमि ने वेदों की ऋचाएँ सुनीं, उपनिषदों पर मनन किया और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, उस भूमि की आत्मा हिंदी में ही सबसे सहज रूप से व्यक्त होती है। हिंदी बोलते समय केवल ध्वनियाँ नहीं निकलतीं, बल्कि हजारों वर्षों की संस्कृति, विचार और राष्ट्रबोध जीवित हो उठता है।
हिंदी की यात्रा किसी राजदरबार से नहीं, बल्कि लोक की मिट्टी से होकर आई है। इसने गाँव की चौपाल से लेकर संतों की कुटिया तक, और फिर स्वतंत्रता आंदोलन के मंच तक, हर जगह जनभावनाओं को स्वर दिया। कबीर की वाणी ने समाज को झकझोरा, तुलसी की भाषा ने मर्यादा सिखाई, सूर और मीरा ने भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया और आधुनिक युग में हिंदी राष्ट्रनिर्माण की भाषा बनी। जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था, तब हिंदी ने ही आम भारतीय को यह एहसास कराया कि वह केवल प्रजा नहीं, राष्ट्र का नागरिक है।
हिंदी का सौंदर्य केवल भावनाओं तक सीमित नहीं है, उसमें गहरी वैज्ञानिकता भी है। हिंदी वर्णमाला की संरचना मानव शरीर के स्वाभाविक उच्चारण तंत्र पर आधारित है। कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत और होंठ से निकलने वाली ध्वनियाँ शरीर के भीतर प्राणवायु के प्रवाह को संतुलित करती हैं। स्पष्ट हिंदी उच्चारण से श्वसन प्रणाली सक्रिय होती है, फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है और वाणी में स्थिरता आती है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में भाषा को स्वास्थ्य और योग से जोड़ा गया है। यह केवल आस्था नहीं, बल्कि अनुभव और अभ्यास से उपजा विज्ञान है।
मानसिक दृष्टि से भी हिंदी का प्रभाव गहरा और सकारात्मक है। हिंदी की शब्द संरचना सरल, सीधी और स्पष्ट है, जिससे मस्तिष्क पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता। मनोविज्ञान और भाषाविज्ञान के अध्ययन बताते हैं कि जिन भाषाओं में जैसा लिखा जाता है वैसा ही बोला जाता है, वे सीखने और समझने में अधिक सहज होती हैं। हिंदी ऐसी ही भाषा है। इसी सहजता के कारण हिंदी बोलने और समझने वाला व्यक्ति अपने भावों को खुलकर व्यक्त कर पाता है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
आध्यात्मिक स्तर पर हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि साधना का मार्ग है। भजन, कीर्तन, मंत्र और नामस्मरण की परंपरा में हिंदी और उससे जुड़ी भाषाओं की ध्वनियाँ मन और मस्तिष्क को शांति देती हैं। आधुनिक न्यूरोसाइंस भी मानता है कि ध्वनि तरंगें मस्तिष्क की तरंगों को प्रभावित करती हैं। जब कोई व्यक्ति श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ शब्दों का जप करता है, तो उसका मानसिक संतुलन बेहतर होता है। इस प्रकार हिंदी आत्मा, मन और शरीर—तीनों को जोड़ने वाली भाषा बन जाती है।
हिंदी की इस गहराई ने केवल भारतवासियों को ही नहीं, बल्कि अनेक विदेशी चिंतकों और दार्शनिकों को भी आकर्षित किया है। रूसी साहित्यकार लियो टॉलस्टॉय भारतीय दर्शन और विचारधारा से अत्यंत प्रभावित थे और मानते थे कि भारत की भाषाओं में नैतिकता और आत्मिक शांति का विशेष स्वर है। जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने उपनिषदों को मानव चिंतन की सर्वोच्च उपलब्धि बताया और भारतीय विचारों को जीवन-दर्शन का आधार माना। स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और भाषा में छिपे प्रतीकों को मानव चेतना को समझने की कुंजी बताया। जर्मन लेखक हरमन हेस्से भारतीय दर्शन और भाषा से इतने प्रभावित थे कि उनके साहित्य में भारत की आत्मा की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। इन विद्वानों की रुचि यह प्रमाण है कि हिंदी और उससे जुड़ी भारतीय भाषाएँ केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक महत्व रखती हैं।
आज हिंदी केवल भारत तक सीमित नहीं है। प्रवासी भारतीयों के माध्यम से यह मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और अन्य देशों में संस्कृति की पहचान बन चुकी है। वहाँ हिंदी गीत, साहित्य और परंपराएँ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ रही हैं। जापान, रूस, जर्मनी, अमेरिका जैसे देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है, क्योंकि विश्व अब यह समझ रहा है कि हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दृष्टि को समझने का माध्यम है।
राष्ट्र के लिए भाषा आत्मसम्मान का प्रश्न होती है। हिंदी ने भारत को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया है। यह किसी एक क्षेत्र या वर्ग की भाषा नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की साझा विरासत है। हिंदी न किसी के विरुद्ध है और न किसी पर थोपी गई है, यह स्वाभाविक रूप से जोड़ने वाली भाषा है। जब कोई भारतीय गर्व से हिंदी बोलता है, तो वह केवल अपनी पहचान नहीं जताता, बल्कि राष्ट्र की अस्मिता को स्वर देता है।
10 जनवरी का यह दिन हमें याद दिलाता है कि हिंदी को केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित न रखें। हिंदी को अपने जीवन, विचार और व्यवहार का स्वाभाविक हिस्सा बनाना ही सच्चा सम्मान है। हिंदी में सोचना, हिंदी में बोलना और हिंदी में लिखना किसी पिछड़ेपन का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। हिंदी हमारा अतीत भी है, वर्तमान भी और भविष्य भी। हिंदी का गौरव बढ़ाना वास्तव में भारत के गौरव को बढ़ाना है।
दिवाकर शर्मा
शिवपुरी (मध्यप्रदेश)
7999769392
krantidooot@gmail.com

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