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शिवपुरी की बाघिन: आतंक नहीं, चेतावनी

 


शिवपुरी में हाल ही में घटित घटना ने पूरे इलाके को बेचैन कर दिया है। बांधवगढ़ से रेस्क्यू कर लाई गई एक बाघिन ने टाइगर रिजर्व कॉरिडोर से सटे डोंगर गांव में 75 वर्षीय बुजुर्ग पर हमला किया। स्वाभाविक है कि आसपास के गांवों में भय का माहौल बन गया। लेकिन इस घटना को केवल एक सनसनीखेज “बाघ हमला” मान लेना न तो सच के साथ न्याय करता है और न ही समाधान की दिशा दिखाता है। यह घटना हमें बाघ, जंगल और इंसान के रिश्ते को गहराई से समझने की जरूरत बताती है।

बाघ केवल एक शक्तिशाली जानवर नहीं है, वह जंगल के संतुलन की रीढ़ है। जिस वन क्षेत्र में बाघ सुरक्षित होता है, वहां हिरण, नीलगाय जैसे शाकाहारी जीव नियंत्रित संख्या में रहते हैं, जंगल की हरियाली बची रहती है और जलस्रोत सूखते नहीं। बाघ की मौजूदगी यह संकेत होती है कि वह जंगल आज भी जीवित है। यही कारण है कि टाइगर रिजर्व को केवल बाघ बचाने की योजना नहीं, बल्कि प्रकृति, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का संकल्प माना जाता है।

अब सवाल यह है कि फिर शिवपुरी में हमला क्यों हुआ? इसका जवाब भावनाओं में नहीं, विज्ञान में छिपा है। बांधवगढ़ जैसे स्थापित क्षेत्र से रेस्क्यू कर किसी बाघिन को नए इलाके में छोड़ना उसके लिए आसान नहीं होता। वह अपने परिचित जंगल, रास्तों और गंधों से अचानक अलग हो जाती है। नई जगह, नया दबाव और असुरक्षा की भावना उसे हर हलचल को संभावित खतरे की तरह देखने पर मजबूर कर देती है। मादा बाघ स्वभाव से अधिक सजग और रक्षात्मक होती है, खासकर तब जब वह अस्थिर मानसिक स्थिति में हो।

डोंगर गांव का टाइगर रिजर्व कॉरिडोर से सटा होना भी इस घटना का एक अहम पक्ष है। कॉरिडोर बाघों के सुरक्षित आवागमन के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन जब इन क्षेत्रों के आसपास मानवीय गतिविधियां बढ़ जाती हैं, तो टकराव की आशंका अपने आप बढ़ जाती है। यह संघर्ष बाघ की आक्रामकता का प्रमाण नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कहीं न कहीं गड़बड़ा रहा है।

बताया जा रहा है कि हमला अचानक आमने-सामने आने की स्थिति में हुआ। 75 वर्षीय बुजुर्ग की उम्र और सीमित शारीरिक क्षमता को देखते हुए यह संभावना प्रबल है कि बाघिन ने खतरा महसूस किया और रक्षात्मक प्रतिक्रिया दी। ऐसे हमले आमतौर पर शिकार के लिए नहीं, बल्कि आत्मरक्षा में होते हैं। बाघ स्वभाव से इंसान से बचने वाला जीव है और मनुष्य पर हमला उसकी प्राकृतिक प्रवृत्ति नहीं है।

इस एक घटना के आधार पर बाघों को खतरा घोषित करना या संरक्षण प्रयासों पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन यह दीर्घकालिक दृष्टि से खतरनाक होगा। असली जरूरत गांवों में जागरूकता बढ़ाने, कॉरिडोर क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करने, वन विभाग की सतत निगरानी और त्वरित सहायता तंत्र को मजबूत करने की है। साथ ही, प्रभावित परिवारों को संवेदनशीलता के साथ मुआवजा और सुरक्षा का भरोसा देना भी उतना ही जरूरी है।

बाघ का जंगल में होना इंसान के लिए खतरा नहीं है, बल्कि जंगल का खत्म हो जाना इंसान के भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। शिवपुरी की यह घटना हमें डरने का नहीं, बल्कि सोचने का अवसर देती है कि हम संरक्षण और विकास के बीच ऐसा संतुलन बनाएं, जहां जंगल भी सुरक्षित रहे और इंसान भी। यही संतुलन वास्तव में प्रकृति, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों की सच्ची सुरक्षा है।

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1 टिप्पणियाँ

  1. 👍सटीक संतुलित गंभीर सलाह/समझाइश आमजन एवं प्रशासन दोनों के लिए👍

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