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नोटिस आया… अब जाएगी कुर्सी या बच जाएगी सत्ता?


भोपाल के वल्लभ भवन से आया यह नोटिस कोई साधारण कागज नहीं है। यह नोटिस सीधे-सीधे शिवपुरी की राजनीति को हिला देने वाला है। नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा को सरकार ने साफ शब्दों में बता दिया है कि उनके कामकाज को लेकर गंभीर सवाल हैं। आरोप यह हैं कि उन्होंने बेवजह अधिकारियों के काम में दखल दिया, पक्षपात किया, पैसों के मामलों में गड़बड़ी हुई और वे अपने पद की जिम्मेदारियां ठीक से नहीं निभा पाईं।

यह पूरा मामला अचानक नहीं बना। कांग्रेस और निर्दलीय पार्षदों ने मिलकर मोर्चा खोला, सामूहिक इस्तीफे दिए, प्रशासन ने जांच की और अब सरकार ने उसी आधार पर नोटिस जारी किया है। नोटिस में यह तक लिखा है कि अध्यक्ष के तौर पर उनका बने रहना लोकहित में ठीक नहीं है। यानी बात सीधे-सीधे कुर्सी तक पहुंच गई है।

अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा। क्या गायत्री शर्मा की कुर्सी चली जाएगी या वह इसे बचा पाएंगी? आम आदमी की भाषा में कहें तो फिलहाल गेंद उनके पाले में है। सरकार ने उन्हें 15 दिन का समय दिया है कि वे अपना पक्ष रखें। अगर जवाब मजबूत नहीं हुआ, तो सरकार एकतरफा कार्रवाई कर सकती है।

कुर्सी बचाने के लिए उनके पास कुछ ही रास्ते हैं। पहला, वे यह साबित करने की कोशिश करें कि जिन बातों को गड़बड़ी कहा जा रहा है, वे नियमों के तहत लिए गए फैसले थे। दूसरा, यह दिखाएं कि नगर पालिका में जो काम हुए, वे शहर के हित में थे, न कि किसी के पक्ष या विपक्ष में। तीसरा और सबसे अहम, राजनीतिक स्तर पर यह समझाना कि उन्हें हटाने से शिवपुरी में हालात और बिगड़ सकते हैं।

राजनीति में कई बार नोटिस कार्रवाई से ज्यादा चेतावनी होता है। सरकार यह भी देखती है कि सामने वाला कितना संभलता है, कितना सहयोग करता है और कितना टकराव लेता है। अगर सही तरीके से बात रखी गई, तो कुर्सी बच भी सकती है। लेकिन अगर जवाब कमजोर रहा, तो फिर हटाने की कार्रवाई तय मानी जा रही है।

इस पूरे मामले में शिवपुरी दो हिस्सों में बंटा नजर आ रहा है। कुछ लोग खुश हैं कि अब कार्रवाई होगी, तो कुछ लोग चिंतित हैं कि शहर की राजनीति और उलझेगी। असली फैसला अब शिवपुरी में नहीं, भोपाल में होगा।

आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह नोटिस सिर्फ डराने के लिए था या फिर नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी जाने की शुरुआत। जनता बस यही देख रही है कि सच्चाई क्या है और फैसला किसके हक में जाता है।

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