हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना और वैद्य गुरुदत्त - सुधांशु सिंह
लाहौर के एक सामान्य खत्री परिवार में जन्मे(8 दिसंबर 1894) माँ भारती के अनन्य साधक श्री बैद्य गुरुदत्त हिन्दी साहित्य परंपरा के एक ऐसे सिद्धहस्त पुरुष थे जिन्होंने न केवल साहित्य सृजन किया अपितु भारत के वैदिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषयों को अपने लेखन का विषय बनाया। अपने 92 वर्षों के जीवनकाल में उन्होंने लगभग दो सौ उपन्यास और दो दर्जन से अधिक कहानियां लिखीं। । यूनेस्को के एक अध्ययन के मुताबिक सन 1960 - 70 के दशक तक वैद्य गुरुदत्त हिन्दी साहित्य मे सबसे ज्यादा पढे जाने वाले लेखक थे। इतने विराट लेखन और रचना कर्म के बावजूद भी उन्हे साहित्य मे वो स्थान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक हकदार थे आज के समय मे उनका नाम शायद ही कोई जानता हो।
भारतीय राष्ट्रवाद का स्वरूप आरंभ से ही बहुस्तरीय रहा है। यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षा तक सीमित न रहकर सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, नैतिक मूल्यबोध और सभ्यतागत चेतना का गहन समावेश रहा। ‘हिंदू राष्ट्र’ की संकल्पना इसी व्यापक राष्ट्रवादी विमर्श की एक महत्वपूर्ण वैचारिक धारा है, जिसे समझने के लिए संकीर्ण धार्मिक दृष्टि के स्थान पर सांस्कृतिक और साहित्यिक परिप्रेक्ष्य की जानकारी आवश्यक है। वैद्य गुरुदत्त का साहित्य इसी सांस्कृतिक राष्ट्रबोध का प्रतिनिधि स्वर बनकर उभरता है। उनके लेखन में हिंदू राष्ट्र की कल्पना संसार भर के राष्ट्रों और संस्कृतियों से श्रेष्ठ दिखाई पड़ती है। हिंदू राष्ट्र की संकल्पना मूलतः ‘हिंदू’ शब्द की सांस्कृतिक व्याप्ति से संबद्ध है। यहाँ ‘हिंदू’ किसी विशिष्ट धार्मिक पंथ का संकीर्ण अर्थ भर न होकर भारत की जीवन-दृष्टि, दर्शन, आचार, लोकसंस्कृति और ऐतिहासिक निरंतरता का सूचक है। यह वह चेतना है जो वेदांत, लोकपरंपरा और जनजीवन के नैतिक संस्कारों से निर्मित होती है।
गुरुदत्त ने अपने उपन्यासों मे भ्रष्ट राजनीति, प्रजातन्त्र, साम्राज्यवादी शासन, शोषण स्वतंत्रतापूर्व और स्वतंत्रयोत्तर भारत की स्थिति का यथार्थ चित्रण किया है। मूलतः वे भारतीय सभ्यता एवं हिन्दू संस्कृति के उपासक रहे । जिससे उनमें राष्ट्रीयता एवं हिन्दुत्व की भावना कूट कूट कर भरी रही। उपन्यासकार गुरुदत्त 'हिन्दू' शब्द को भारतीय का तथा 'हिन्दुत्व' को भारतीयता का रूप मानते हैं। उनके अनुसार जो लोग भारत भूमि को अपनी जन्मभूमि के साथ - साथ पुण्यभूमि भी मानते हैं, वे सच्चे भारतीय है। धर्म किसी भी व्यक्ति को सच्चा भारतीय बनाने मे बाधक नहीं है। इसी कारण अधिकांश लोगों ने गुरुदत्त पर संकीर्णता का आरोप लगाकर उन्हें एक सांप्रदायिक लेखक घोषित करने की कोशिस की। लेकिन यह बात इस महान राष्ट्रभक्त, देशप्रेमी साहित्यकार के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है ।उनकी दृष्टि मे - "हिन्दुत्व तथा भारतीयता पर्यायवाची शब्द है। दोनों मे मजहब का झगड़ा नहीं है। दोनों मे श्रेष्ठ व्यवहार और आचरण का प्रथम स्थान है"। गुरुदत्त ने हर उस व्यक्ति को जो भारतवासी है और भारतभूमि पर रहता है वहाँ का नागरिक है उसे हिन्दू माना है । 'उन्मुक्त प्रेम' उपन्यास मे वे बिहारीलाल और रजिया का परस्पर बात करते हुए इसका सटीक वर्णन करते है। "मगर आप हिन्दू तब ही हो सकते हैं जब आप इस सर जमीन को अपनी पाक जमीन भी माने। रजिया - यह जज्बा तो बहुत अच्छा है। क्या मुसलमान भी हिन्दू हो सकता है?
गुरुदत्त ने बाकी धर्मों को मजहब की संज्ञा देते हुए वास्तविक धर्म तो हिन्दू धर्म को ही माना है । उन्होंने व्यक्ति को धर्म का रक्षक और धर्म को मानव जाति का रक्षक माना। हिन्दू और मुस्लिमों के बारे मे भी उनका यही पक्ष रहा। कि ये सब राजनेताओं की चाल है वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति भले ही वह हिन्दू हो या मुसलमान सभी एक दूसरे के प्रति प्रेम सौहार्द और मानवता का भाव रखते हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण उनके विभिन्न उपन्यासों में देखने को मिलते हैं। जमाना बदल गया, गंगा की धारा, पथिक, बहती रेत, इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। जिनमें हिंदू मुस्लिम एकता का भाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। लेकिन हिंदू धर्म के प्रति यह समर्पण ही उनके साहित्य जगत् में उपयुक्त स्थान प्राप्त करने में बाधक बन गया। गुरुदत्त ने अपने संपूर्ण साहित्य में हिंदू धर्म, संस्कृति व साहित्य को सर्वोच्च स्थान दिया है। हिंदी साहित्यकारों में केवल गुरुदत्त ही एक अकेले साहित्यकार है जिसने निःसंकोच व दृढ़ता से कहा है- "मैं हिंदू धर्म और संस्कृति को संसार भर की संस्कृतियों से श्रेष्ठ मानता हूँ और उसके मिटाने के प्रयासों को सुख से ग्रहण नहीं कर सकता।"
भारतीय संस्कृति और शास्त्रीय परंपरा की विवेचना तथा प्रस्तुति की जो विशिष्ट क्षमता गुरुदत्त में दिखाई देती है वह उन्हें अन्य विचारकों से अलग स्थान प्रदान करती है। दर्शनशास्त्र में तर्क और बुद्धि के आधार पर हिंदू सिद्धांतों की पुष्टि उन्होंने जिस कुशलता से की है वह उल्लेखनीय है। ‘मैं हिंदू हूँ’, ‘हिंदुत्व की यात्रा’, ‘वर्तमान व्यवस्था का समाधान’, ‘हिंदू राष्ट्र’, ‘भारत में राष्ट्र’, ‘धर्म तथा समाजवाद’ आदि उनकी ऐसी कृतियाँ हैं, जिनमें उन्होंने इस विषय पर गहन विचार प्रस्तुत किए हैं।
गुरुदत्त सच्चे अर्थों में हिंदू थे और उनके हिंदुत्व की जड़ें उनके समग्र साहित्य में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। अनेक विचारक और साहित्यकार इस तथ्य को निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हैं कि हिंदुत्व की यथार्थ और सार्थक व्याख्या करने में गुरुदत्त जैसा सामर्थ्य बहुत कम लेखकों में मिलता है। प्रसिद्ध चिंतक क्षितिज वेदालंकार ने अपने लेख ‘हिंदू धर्म के अद्भुत व्याख्याकार’ में लिखा है- "जिस कुशलता और विवेक के साथ गुरुदत्त जी ने हिंदू धर्म की व्याख्या की है, वैसी दक्षता अन्य किसी लेखक में दिखाई नहीं देती। उन्होंने हिंदुत्व को जटिल और कांटेदार विवादों से मुक्त कर एक ऐसे सरल और प्रशस्त मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया, जिस पर अब कोई भी बुद्धिजीवी निस्संकोच चल सकता है। हिंदू धर्म का ऐसा तर्कसंगत और संतुलित विवेचन अन्यत्र दुर्लभ है।
गुरुदत्त ने ‘हिंदू धर्म’ नामक अपनी पुस्तक में हिंदू धर्म की अत्यंत सटीक और स्पष्ट व्याख्या की है। उनके अनुसार हिंदू धर्म सबसे विलक्षण है, क्योंकि यह किसी प्रकार का मत नहीं है। इसका कोई मानवीय प्रवर्तक नहीं है और न ही इसमें कोई अपरिवर्तनीय, जड़ आचार-संहिता है। इसे सनातन धर्म भी इस अर्थ में नहीं कहा जाता कि इसे किसी एक व्यक्ति ने स्थापित किया हो, बल्कि इसलिए कि यह मानव-कल्याण के निरंतर विकास के साथ विकसित होता रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि गुरुदत्त हिंदू धर्म के गहरे समर्थक थे और उसे मानव-कल्याणकारी धर्म मानते थे।
पत्रकार नरेंद्र अवस्थी के शब्दों मे "यदि गुरुदत्त जी ने सौ से अधिक उपन्यास लिखने के बाद भी साहित्य-जगत में वह स्थान नहीं पाया, जिसके वे अधिकारी थे, तो इसका प्रमुख कारण उनका हिंदू संस्कृति के प्रति गहरा प्रेम था। उन्होंने आधुनिक साहित्यकारों की तरह तथाकथित प्रगतिशीलता की मदिरा में डूबकर हिंदू संस्कृति की उपेक्षा नहीं की, बल्कि हिंदू जीवन-पद्धति की ठोस आधारशिला और उसकी महानता की पूरी निष्ठा के साथ वकालत की। उनकी धार्मिक भावनाओं की निर्मलता और विचारों की स्पष्टता का उल्लेख अनायास ही पाठक के मन पर गहरा प्रभाव डालता है"
वैद्य गुरुदत्त का साहित्य औपनिवेशिक मानसिकता के विरुद्ध एक सांस्कृतिक प्रतिरोध भी है। उनके यहाँ हिंदू राष्ट्र की संकल्पना पश्चिमी राष्ट्र की अवधारणा के विकल्प के रूप में उभरती है, एक ऐसा विकल्प जो आत्मगौरव, स्वदेशी चेतना और सांस्कृतिक स्वायत्तता पर आधारित हो।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि वैद्य गुरुदत्त के साहित्य में हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना एक गहन सांस्कृतिक और सभ्यतागत राष्ट्रबोध के रूप में प्रकट होती है। यह संकल्पना इतिहास, नैतिकता, परंपरा और हिन्दुत्व से जुड़कर भारतीय राष्ट्रवाद को वैचारिक गहराई प्रदान करती है एवं हिन्दू राष्ट्र को व्यापकता से समझने मे हमारी मदद करती है।
सुधांशु सिंह
शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय
हिन्दी विभाग, नई दिल्ली
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ज्ञानवर्धक,अच्छा लिखा है।
जवाब देंहटाएंआभार महोदय
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