दिव्यांग की पीड़ा और सिस्टम की मजबूरी
शिवपुरी की जनसुनवाई में सामने आया एक मामला भावनात्मक भी है और जटिल भी। एक ओर सौ प्रतिशत दिव्यांग असफाक अंसूरी हैं, जो दो वर्षों से बैटरी चालित ट्राईसाइकिल के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। आर्थिक तंगी, काम करने की असमर्थता और डॉक्टर की लिखित अनुशंसा के बावजूद राहत न मिलना उसकी पीड़ा को और गहरा करता है। ऐसे में उसका प्रशासन के सामने फूट पड़ना स्वाभाविक है और आमजन की सहानुभूति भी उसी के साथ खड़ी दिखती है।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही जरूरी है। प्रशासन के अनुसार असफाक को अक्टूबर 2023 में भारत सरकार की एडिप योजना के तहत एक सहायक उपकरण पहले ही दिया जा चुका है। योजना के नियम स्पष्ट हैं कि तीन वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले नया उपकरण नहीं दिया जा सकता। यह नियम किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि सभी पात्र दिव्यांगों के लिए समान रूप से लागू है।
जनसुनवाई में कलेक्टर ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए तत्काल एक सामान्य ट्राईसाइकिल देने की पहल की, लेकिन असफाक ने बैटरी चालित वाहन की आवश्यकता बताते हुए उसे लेने से इंकार कर दिया।
यहीं पर विवाद की स्थिति बनती है एक तरफ नियमों से बंधा प्रशासन और दूसरी तरफ जरूरत से जूझता दिव्यांग युवक। इस मामले को सिर्फ प्रशासन की संवेदनहीनता बताकर सनसनीखेज बनाना भी उतना ही गलत है, जितना नियमों की आड़ में मानवीय पीड़ा को नजरअंदाज करना। सच्चाई यह है कि असफाक का दर्द वास्तविक है और प्रशासन की मजबूरी भी।
इस प्रकरण से यही सबक निकलता है कि ऐसे मामलों में भावनाओं और नियमों के बीच संतुलन जरूरी है। समाधान सनसनी में नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने में है, जहां दिव्यांग को वर्षों तक भटकना न पड़े और नियमों के भीतर ही मानवीय रास्ता निकाला जा सके।

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