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नेताजी सुभाष चंद्र बोस: एक अमर क्रांतिकारी की अजर-अमर गाथा – डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर

 

जिसकी याद आज भी युवाओं में देशभक्ति का जोश भर देती है, जब भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जाएगा, एक नाम ऐसा होगा जो हर युवा के दिल में अलख जगा देगा - नेताजी सुभाष चंद्र बोस 23 January 1897 – 18 August 1945 । यह वह नाम है जिसे सुनकर आज भी रगों में खून तेज़ी से दौड़ने लगता है, सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है और मन में एक अजीब सी ऊर्जा का संचार हो जाता है। नेताजी केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे - वे एक दूरदर्शी विचारक, महान रणनीतिकार, अद्भुत संगठनकर्ता और सर्वोपरि, एक ऐसे नेता थे जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

आज जब हम उनके जीवन और योगदान को याद करते हैं, तो केवल इतिहास के पन्नों को नहीं पलटते, बल्कि उस महान आत्मा के समक्ष नतमस्तक होते हैं जिसने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने सुख, अपने परिवार, और अंततः अपने अस्तित्व तक को दांव पर लगा दिया। उनकी गाथा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है - यह भारतीय स्वाभिमान, साहस और अदम्य इच्छाशक्ति का जीवंत प्रतीक है।

विद्वान विचारक और वैश्विक दृष्टिकोण का धनी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक साधारण स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे - वे एक असाधारण बुद्धिजीवी और दूरदर्शी रणनीतिकार थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा में चौथी रैंक हासिल करने वाले इस युवक ने अपने उज्ज्वल भविष्य को ठुकरा कर मातृभूमि की सेवा का मार्ग चुना। उनकी बुद्धिमत्ता केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं थी। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति, द्वितीय विश्वयुद्ध की जटिलताओं और वैश्विक शक्ति संतुलन को गहराई से समझते थे। जहां अन्य नेता केवल भारत की सीमाओं के भीतर सोचते थे, नेताजी ने यह समझ लिया था कि भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष वैश्विक परिदृश्य से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने यह दूरदर्शिता दिखाई कि ब्रिटिश साम्राज्य को केवल अहिंसक आंदोलनों से नहीं हिलाया जा सकता। उन्हें एक सशस्त्र संघर्ष की आवश्यकता थी, एक ऐसी सेना की जो भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतिम सांस तक लड़ने को तैयार हो। यह विचार उस समय के परंपरागत कांग्रेसी सोच से बिल्कुल अलग था, और शायद इसीलिए नेताजी को कांग्रेस नेतृत्व के साथ वैचारिक मतभेद झेलने पड़े।

आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन - एक सपने का साकार होना, नेताजी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी आज़ाद हिंद फ़ौज (Indian National Army - INA) का गठन। 1943 में सिंगापुर में, जब नेताजी ने भारतीय युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों को एकत्रित कर एक सेना खड़ी की, तो यह केवल एक सैन्य संगठन नहीं था - यह भारतीय स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक था। आज़ाद हिंद फ़ौज में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की भी एक विशेष टुकड़ी थी - रानी झांसी रेजिमेंट। यह रेजिमेंट भारतीय महिला शक्ति का प्रतीक बन गई। नेताजी ने महिलाओं को केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि मुख्य लड़ाकू के रूप में शामिल किया - यह उनकी प्रगतिशील सोच और समानता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

INA में जाति, धर्म और क्षेत्र का कोई भेदभाव नहीं था। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई - सभी एक ही ध्वज तले, एक ही उद्देश्य के लिए लड़ते थे। नेताजी ने वह एकता स्थापित की जो आज भी भारत के लिए एक आदर्श है। फ़ौज का नारा था - "चलो दिल्ली!" यह केवल एक नारा नहीं था, यह हर सैनिक के दिल में बसा हुआ सपना था। दिल्ली में तिरंगा फहराने का सपना, भारत माता की बेड़ियां तोड़ने का सपना।

अंतरराष्ट्रीय गठबंधन - एक साहसिक रणनीति, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सबसे विवादास्पद लेकिन साहसिक रणनीति थी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी और जापान के साथ गठबंधन। आज जब हम इतिहास के आईने में देखते हैं, तो कुछ लोग इसे प्रश्नांकित करते हैं। लेकिन क्या यह समझने की कोशिश की गई कि नेताजी की स्थिति क्या थी? ब्रिटिश साम्राज्य उस समय विश्व की सबसे बड़ी शक्ति था। उससे लोहा लेने के लिए नेताजी को ब्रिटेन के शत्रुओं से सहायता लेनी पड़ी। यह कोई वैचारिक समर्थन नहीं था - यह एक रणनीतिक आवश्यकता थी। "मेरे शत्रु का शत्रु मेरा मित्र है" - इस प्राचीन कूटनीतिक सिद्धांत को नेताजी ने समझा और लागू किया।

1941 में वे जर्मनी पहुंचे, जहां उन्होंने युद्धबंदी भारतीय सैनिकों को संगठित करना शुरू किया। लेकिन जब उन्हें लगा कि जर्मनी से अपेक्षित सहायता नहीं मिल रही, तो उन्होंने साहसिक निर्णय लिया - सबमरीन से जर्मनी से जापान तक की यात्रा। यह यात्रा खुद में इतिहास का एक अविश्वसनीय अध्याय है। जापान में उन्हें बेहतर समर्थन मिला। जापानी सरकार ने INA को हथियार, प्रशिक्षण और रसद सहायता प्रदान की। 1944 में INA ने भारत-बर्मा सीमा पर ब्रिटिश सेना पर हमला किया। इम्फाल और कोहिमा के युद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे वीरतापूर्ण सैन्य प्रयासों में से थे।

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" - एक अमर नारा, - यह केवल एक नारा नहीं था, यह नेताजी की आत्मा की आवाज़ थी। जब उन्होंने यह शब्द बोले, तो सिंगापुर की धरती पर खड़े हजारों भारतीयों के दिलों में आग लग गई। यह वह क्षण था जब शब्दों ने इतिहास रच दिया। इस नारे में कितनी सच्चाई थी! नेताजी कोई खोखला वादा नहीं कर रहे थे। वे स्वयं खून बहाने को तैयार थे, और अपने साथियों से भी यही अपेक्षा रखते थे। यह नारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सबसे प्रेरक और शक्तिशाली नारों में से एक बन गया।

जब INA की सेनाएं "दिल्ली चलो" के नारे के साथ आगे बढ़ीं, तो यह केवल एक सैन्य अभियान नहीं था - यह एक राष्ट्रीय जागरण था। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह को आज़ाद हिंद फ़ौज ने मुक्त कराया और वहां पहली बार तिरंगा फहराया। यह पहली बार था जब भारतीय भूमि पर भारतीय सैनिकों ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। हालांकि INA को अंततः सैन्य पराजय का सामना करना पड़ा, लेकिन उनके साहस और बलिदान ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। INA के सैनिकों के मुकदमे ने पूरे भारत में क्रांति की लहर पैदा कर दी। भारतीय सेना के जवानों में विद्रोह की भावना जाग उठी। इसने ब्रिटिश सरकार को यह एहसास करा दिया कि अब भारत को गुलाम बनाए रखना असंभव है।

आज़ाद हिंद सरकार - एक ऐतिहासिक क्षण, 21 अक्टूबर 1943 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में "आज़ाद हिंद सरकार" (Provisional Government of Free India) की स्थापना की घोषणा की। यह भारत की पहली स्वतंत्र सरकार थी, भले ही यह निर्वासन में थी। नेताजी इस सरकार के राष्ट्रप्रमुख, प्रधानमंत्री और युद्ध मंत्री बने। यह सरकार केवल नाम की नहीं थी - इसका अपना संविधान, अपनी मुद्रा, अपने डाक टिकट और अपना राष्ट्रीय बैंक था। जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मांचूरिया और आयरलैंड सहित नौ देशों ने इस सरकार को मान्यता दी।

जब नेताजी ने आज़ाद हिंद की सरकार के प्रमुख के रूप में तिरंगा फहराया, तो वह भारत के इतिहास का सबसे गर्वोन्मादक क्षण था। वह तिरंगा केवल एक झंडा नहीं था - वह भारत की आत्मा का प्रतीक था, जो विदेशी धरती पर भी स्वतंत्र और गौरवान्वित था। आज़ाद हिंद सरकार ने महिलाओं को समान अधिकार दिए, सभी धर्मों को समान सम्मान दिया, और एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी भारत का सपना देखा। यह सरकार भविष्य के स्वतंत्र भारत का खाका थी।

गहरे षड्यंत्र और आंतरिक विरोध की कहानी, नेताजी के जीवन की सबसे दुखद सच्चाई यह है कि उन्हें केवल ब्रिटिश साम्राज्य से नहीं, बल्कि अपने ही देश के कुछ नेताओं से भी संघर्ष करना पड़ा। स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर वैचारिक मतभेद इतने गहरे थे कि नेताजी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। महात्मा गांधी और नेताजी के बीच आज़ादी की रणनीति को लेकर गहरे मतभेद थे। जहां गांधीजी अहिंसा में विश्वास रखते थे, नेताजी मानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य को केवल सशस्त्र संघर्ष से ही उखाड़ा जा सकता है। यह वैचारिक टकराव स्वाभाविक था, लेकिन दुर्भाग्य से इसने व्यक्तिगत दुश्मनी का रूप ले लिया।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने नेताजी के प्रति जानबूझकर शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया। उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को जानबूझकर कम आंका गया। आज़ादी के बाद भी, INA के सैनिकों को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। यह षड्यंत्र कितना गहरा था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नेताजी के लापता होने के बाद भी कई दशकों तक उनकी मृत्यु के बारे में जानकारी छुपाई गई। फाइलें गुप्त रखी गईं, जांच आयोगों की सिफारिशों को दबाया गया। क्यों? क्योंकि शायद सच्चाई से कुछ लोगों के राजनीतिक हित प्रभावित होते।

विमान दुर्घटना की अप्रमाणित कहानी, 18 अगस्त 1945 को ताइवान के तैहोकू हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की आधिकारिक कहानी को लेकर शुरू से ही संदेह रहे हैं। यह कहानी इतनी छेद से भरी है कि इसे सच मानना असंभव है। पहली बात, उस दिन उस हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं - यह ताइवान सरकार के अभिलेखों से प्रमाणित है। दूसरे, जिस विमान में नेताजी कथित रूप से यात्रा कर रहे थे, उसके मलबे के कोई प्रामाणिक सबूत नहीं मिले। तीसरे, उनके शव की कभी पहचान नहीं हुई।

भारत सरकार ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए तीन आयोग बनाए - शाहनवाज़ आयोग (1956), खोसला आयोग (1970), और मुखर्जी आयोग (1999-2005)। जहां पहले दो आयोगों ने विमान दुर्घटना की कहानी को स्वीकार किया, मुखर्जी आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह कहानी सच नहीं है। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया! यह कैसा न्याय है? यह कैसी पारदर्शिता है? एक राष्ट्र अपने सबसे महान नायक की मृत्यु की सच्चाई जानने का हकदार है, लेकिन उसे जानबूझकर अंधेरे में रखा जा रहा है। कुछ दस्तावेजों के अनुसार, नेताजी रूस में नजरबंद थे। कुछ का मानना है कि वे भारत लौट आए और संन्यासी बनकर रहने लगे। सच चाहे जो भी हो, यह स्पष्ट है कि विमान दुर्घटना की कहानी एक झूठ है।

गुमनामी बाबा का रहस्य - क्या वे नेताजी थे? उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में एक संन्यासी रहते थे, जिन्हें "गुमनामी बाबा" या "भगवान जी" के नाम से जाना जाता था। 1985 में उनकी मृत्यु के बाद उनके कमरे से ऐसी चीजें मिलीं जो नेताजी से संबंधित थीं - उनकी तस्वीरें, INA से जुड़े दस्तावेज़, नेताजी की आवाज की रिकॉर्डिंग, और विदेशी मुद्राएं। कई लोगों का मानना है कि गुमनामी बाबा और नेताजी एक ही व्यक्ति थे। उनकी शारीरिक बनावट, हस्तलिपि, और व्यवहार में अद्भुत समानताएं थीं। जो लोग उनसे मिले, उनमें से कई ने बताया कि बाबा ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने नेताजी होने के संकेत दिए।

लेकिन सवाल उठता है - अगर वे सच में नेताजी थे, तो गुमनामी में क्यों रहे? इतना महान नायक, जिसने अपने जीवन का हर पल भारत की आज़ादी के लिए समर्पित किया, वह गुमनाम संन्यासी क्यों बन गया? शायद राजनीतिक दबाव था। शायद उन्हें धमकियां मिली थीं। या शायद उन्होंने देखा कि आज़ाद भारत में जो राजनीति हो रही है, वह उनके सपनों का भारत नहीं है। शायद यह दर्द इतना गहरा था कि उन्होंने गुमनामी को चुना। यह सोचकर ही दिल दहल जाता है कि नेताजी जैसा महापुरुष गुमनामी में अपने अंतिम दिन गुजारने को मजबूर हुआ। यह हमारे राष्ट्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत, आज जब युवा नेताजी के बारे में पढ़ते हैं, उनकी तस्वीरें देखते हैं, उनके भाषणों को सुनते हैं, तो उनकी रगों में अजीब सी ऊर्जा दौड़ने लगती है। नेताजी आज के युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं। क्यों? क्योंकि नेताजी ने अपने जीवन में साबित कर दिया कि अगर दृढ़ संकल्प हो, तो कुछ भी असंभव नहीं है। एक व्यक्ति ने, अपने दम पर, विश्व की सबसे बड़ी औपनिवेशिक शक्ति को चुनौती दी। उन्होंने एक पूरी सेना खड़ी की, एक सरकार बनाई, और दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय किसी से कम नहीं हैं।

आज का युवा जब असफलताओं से निराश होता है, तो नेताजी का जीवन उसे सिखाता है कि हार मानना कोई विकल्प नहीं है। जब युवा सुविधाजीवी राजनीति से ऊब जाता है, तो नेताजी का साहस उसे प्रेरित करता है कि सच्चा नेतृत्व कैसा होता है। नेताजी ने दिखाया कि देशभक्ति केवल नारे लगाने में नहीं, बल्कि कर्म में है। उन्होंने सिखाया कि राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान देने की हिम्मत हर युवा में होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि भारत को मजबूत, आत्मनिर्भर और गौरवान्वित राष्ट्र बनाने के लिए कड़ी मेहनत, अनुशासन और दृढ़ता चाहिए। आज जब भारत विश्व में अपनी जगह बना रहा है, तो यह नेताजी के उसी सपने का साकार होना है। वे चाहते थे कि भारत विश्व की महाशक्ति बने, और आज हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

एक अमर विरासत, नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल इतिहास के पन्नों में सीमित नहीं हैं - वे हर भारतीय के दिल में जीवित हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता आसानी से नहीं मिली। इसके लिए लाखों लोगों ने अपना खून बहाया, अपने जीवन न्यौछावर किए। नेताजी का जीवन एक अधूरी कहानी है - उनका अंत रहस्य में डूबा है। लेकिन उनका संदेश बिल्कुल स्पष्ट है: भारत को महान बनाने के लिए हर भारतीय को अपना योगदान देना होगा। चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र में हो, विज्ञान में हो, खेल में हो, या किसी भी अन्य क्षेत्र में - हमें उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना होगा।

आज जब हम नेताजी को याद करते हैं, तो केवल श्रद्धांजलि नहीं दे रहे, बल्कि यह संकल्प ले रहे हैं कि उनके सपनों का भारत बनाने में हम अपना योगदान देंगे। उनका नारा "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" आज भी गूंजता है - लेकिन अब आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए। नेताजी, आप भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपकी आत्मा इस राष्ट्र में सदैव जीवित रहेगी। हर 23 जनवरी को जब हम आपका जन्मदिन मनाते हैं, तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है। हम वादा करते हैं कि आपके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देंगे।

जय हिंद! जय भारत! नेताजी अमर रहें !


डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर

निदेशक – तिब्बती अध्ययन केंद्र


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