अरशद अली की आवाज़ और पत्रकारिता की ठेकेदारी के ख़िलाफ़ खड़ा सवाल
शिवपुरी में सामने आया पूरा घटनाक्रम पत्रकारिता के क्षेत्र में फैलती उस ठेकेदारी मानसिकता की ओर इशारा करता है, जो आज लगभग हर समाज में दिखाई देने लगी है। यह मामला पत्रकार अरशद अली से जुड़ा है, जिनके साथ न केवल अभद्रता हुई, बल्कि बाद में इस पूरे प्रकरण को दबाने की कोशिशें भी की गईं।
अरशद अली ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से समाज के भीतर मौजूद कुछ ऐसे पत्रकारों पर सवाल उठाए थे, जो खुद को वरिष्ठ बताकर वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रभाव जमाए बैठे हैं। पोस्ट में किसी का नाम नहीं था, लेकिन उसमें कही गई बातों ने कुछ लोगों को असहज कर दिया। इसी असहजता का नतीजा यह रहा कि अरशद अली के साथ अभद्र व्यवहार किया गया और उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा।
इस अभद्रता के बाद अरशद अली ने मामले को हल्के में न लेते हुए कोतवाली थाने में लिखित आवेदन देकर पूरी घटना की जानकारी पुलिस को दी। यह कदम एक जिम्मेदार नागरिक और पत्रकार के तौर पर उन्होंने इसलिए उठाया, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। हालांकि, इसके बाद मामला एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया गया।
बताया जा रहा है कि कुछ लोगों ने इस गंभीर घटना को व्यक्तिगत या समाज का अंदरूनी मुद्दा बताकर प्रस्तुत किया। इसी तर्क के सहारे अरशद अली पर सामाजिक दबाव बनाया गया और अंततः उनसे राजीनामा भी कराया गया। सवाल यह है कि जब मामला अभद्रता, धमकी और एक पत्रकार की सुरक्षा से जुड़ा हो, तो उसे केवल समाज का निजी मामला बताकर कैसे दबाया जा सकता है।
यह पूरा प्रकरण दिखाता है कि किस तरह समाज के कुछ तथाकथित ठेकेदार पत्रकारिता में भी अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं। उन्हें अपने ही समाज के नए, सक्रिय और सवाल पूछने वाले पत्रकारों का उभरना पच नहीं रहा है। ऐसे में दबाव, समझौता और चुप्पी को ही समाधान बताया जा रहा है, जो पत्रकारिता की आत्मा के बिल्कुल खिलाफ है।
यदि इस तरह के मामलों को हर बार “समाज का मामला” कहकर सुलझा दिया जाएगा, तो न केवल नए पत्रकारों का हौसला टूटेगा, बल्कि सच बोलने की आज़ादी भी धीरे-धीरे सिमटती चली जाएगी। अरशद अली का मामला एक चेतावनी है कि पत्रकारिता को ठेकेदारी और दबाव की संस्कृति से बचाने के लिए अब खुलकर बात करना जरूरी हो गया है।

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