स्वदेशी के नाम पर फैशन: सोच देसी या दिखावा विदेशी?
आज यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस खिताब को पाने की पूरी प्रक्रिया विदेशी फैशन, ग्लैमर और पश्चिमी मानकों पर आधारित रही हो, उसे जीतने वाला चेहरा अचानक साड़ी पहनकर स्वदेशी का प्रतीक कैसे बन जाता है? यदि खिताब साड़ी पहनकर नहीं जीता गया, तो फिर स्वदेशी मेले में “नारी इन साड़ी” जैसे नाम की आड़ में उसी चेहरे को आगे करना आखिर किस स्वदेशी भावना को दर्शाता है?
स्वदेशी की बात करने वाले वैचारिक संगठनों की परंपरा कभी रैंप, ताली और कैमरे की नहीं रही। उनकी पहचान सादगी, सेवा और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने से रही है। ऐसे संगठनों से मिलते-जुलते नामों के तहत जब वही चमक-दमक परोसी जाए, जो विदेशी मानसिकता से उपजी हो, तो यह स्वदेशी नहीं कहा जा सकता। यह स्वदेशी की आड़ में लोगों को भ्रमित करने जैसा है।
स्वदेशी का असली अर्थ है स्थानीय नारी को सम्मान देना। वह नारी जो घर-परिवार संभालती है, अपने आसपास के समाज को जोड़ती है और रोज़मर्रा के संघर्ष में भी अपनी गरिमा बनाए रखती है। लेकिन जब ऐसे आयोजनों में स्थानीय नारी के बजाय वही चेहरे केंद्र में हों, जो स्वयं स्वदेशी यात्रा का हिस्सा नहीं रहे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह आयोजन विचार के लिए नहीं, बल्कि कुछ लोगों के निजी प्रचार और लाभ का माध्यम तो नहीं बन गया?
अगर सच में साड़ी और भारतीय नारी की गरिमा को सम्मान देना उद्देश्य है, तो आयोजकों को सबसे पहले अपने घर-परिवार की महिलाओं और समाज की स्थानीय नारियों को उसी आत्मसम्मान और सादगी के साथ मंच पर लाना चाहिए। अन्यथा यह कहना गलत नहीं होगा कि साड़ी के नाम पर एक और फैशन शो खड़ा कर दिया गया है, जिसमें स्वदेशी केवल शब्दों, पोस्टरों और भाषणों तक सीमित रह गया है।
देशी नामों, वैचारिक संगठनों जैसी पहचान और राष्ट्रवादी शब्दावली का प्रयोग कर यदि विदेशी सोच को सजाकर प्रस्तुत किया जाए, तो यह उस विचारधारा के साथ अन्याय है, जिसने हमें दिखावे से दूर रहना सिखाया। ऐसी मानसिकता स्वदेशी को मजबूत नहीं करती, बल्कि उसे कमजोर और हास्यास्पद बनाती है।
स्वदेशी को ताज, रैंप या कैमरे की आवश्यकता नहीं है। स्वदेशी को ईमानदार सोच, सच्ची नीयत और स्थानीय समाज के प्रति जिम्मेदारी चाहिए। जब यह भावना ही गायब हो जाए, तो स्वदेशी का नाम लेना भी केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है।

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