देवरी नपा अध्यक्ष पर अविश्वास, जनता का फैसला भारी: राइट-टू-रिकॉल ने दिखाया समूचे मप्र का सच
मध्यप्रदेश की नगर पालिकाओं में इन दिनों अध्यक्षों को हटाने की मांगें, अविश्वास प्रस्ताव और राइट-टू-रिकॉल जैसे शब्द आम होते जा रहे हैं। कागजों में यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कहीं ज़्यादा जटिल और चिंताजनक है। सवाल यह नहीं कि अध्यक्ष हटाए जाएं या बचें, असली सवाल यह है कि यह लड़ाई जनता के हित में है या कुछ पार्षदों की अधूरी महत्वाकांक्षाओं की देन।
सागर जिले की देवरी नगर पालिका इसका ताज़ा और सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यहां भाजपा बहुमत में है, अध्यक्ष भी भाजपा की हैं, फिर भी भाजपा के ही 12 में से 9 पार्षद अध्यक्ष नेहा अल्केश जैन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। आरोप, असंतोष और राजनीतिक खींचतान इतनी बढ़ी कि मामला सीधे जनता के दरबार में पहुंचा। राइट-टू-रिकॉल के तहत मतदान हुआ और जनता ने वह फैसला सुना दिया, जिसे सत्ता के गलियारों में शायद किसी ने ठीक से सुना नहीं था। अध्यक्ष को हटाने के पक्ष में 6085 वोट पड़े, लेकिन 7282 मतदाताओं ने उन्हें बनाए रखने के पक्ष में मतदान किया। यानी जनता ने साफ कह दिया कि उसे पार्षदों की राजनीति नहीं, स्थिरता और काम चाहिए।
यह पहला मौका था जब मध्यप्रदेश में नए प्रावधान के तहत जनता ने सीधे यह तय किया कि वह अपने अध्यक्ष के साथ है या नहीं। पार्षद अविश्वास लाए, लेकिन जनता ने उसी अध्यक्ष को फिर से स्वीकार कर लिया। यह सिर्फ देवरी की कहानी नहीं है, यह पूरे प्रदेश की नगर पालिकाओं के लिए एक आईना है।
शिवपुरी, विदिशा, हरदा, गुना, टीकमगढ़, मुरैना जैसे कई शहरों में अध्यक्षों को हटाने की मांगें उठीं। कहीं भ्रष्टाचार के आरोप, कहीं कमीशनखोरी की बातें, तो कहीं “कार्यशैली से असंतोष” का तर्क। लेकिन हर मामले में एक समान पैटर्न दिखता है कि जब तक पार्षदों की व्यक्तिगत या गुटीय अपेक्षाएं पूरी होती रहती हैं, तब तक सब ठीक और जैसे ही इच्छाएं अटकती हैं, अचानक अध्यक्ष निकम्मे, भ्रष्ट और अयोग्य घोषित कर दिए जाते हैं। सवाल यह है कि अगर हालात इतने ही खराब थे, तो पार्षद पहले कहां थे?
देवरी में जनता ने यह भी बता दिया कि हर अविश्वास प्रस्ताव, हर आरोप जनता की सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करता। जनता जानती है कि शहर का विकास लगातार राजनीतिक अस्थिरता से नहीं, बल्कि जवाबदेही और निरंतरता से होता है। राइट-टू-रिकॉल का मतलब यह नहीं कि हर राजनीतिक लड़ाई को जनता के कंधे पर रख दिया जाए। इसका मतलब यह है कि जब सच में जनता नाराज़ हो, तब वह अपना फैसला सुना सके।
मध्यप्रदेश में वर्ष 2000 से 2018 तक 41 मामलों में अध्यक्षों को हटाने के लिए वोटिंग हुई, जिनमें 20 अध्यक्ष हटाए गए। इसके बाद नियम बदले गए और 2025 में सरकार ने फिर राइट-टू-रिकॉल लागू किया। देवरी का परिणाम बताता है कि यह कानून अब पार्षदों की राजनीति पर भी अंकुश बन सकता है। क्योंकि अब सिर्फ पार्षद तय नहीं करेंगे कि अध्यक्ष रहेगा या जाएगा, बल्कि जनता भी सवाल पूछेगी कि आप क्यों हटाना चाहते हैं और विकल्प क्या है?
आज की सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या नगर पालिकाओं में भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी बढ़ रही है, या फिर “भ्रष्टाचार” का शब्द सिर्फ एक हथियार बनता जा रहा है। ऐसे पार्षदों की संख्या बढ़ती दिख रही है, जिनके लिए पार्टी निष्ठा, विचारधारा और जनता का हित बाद की बातें हैं पहले अपना हित, अपना दबाव और अपना सौदा। जब यह सौदा नहीं होता, तब अपने ही दल, अपने ही अध्यक्ष और अपने ही शहर की छवि को दांव पर लगाने में भी वे संकोच नहीं करते।
देवरी की जनता ने यह साफ कर दिया कि वह इस खेल को समझती है। जनता की इच्छा कुछ और है काम, पारदर्शिता और स्थिर प्रशासन। अगर यह संदेश मध्यप्रदेश की बाकी नगर पालिकाओं तक नहीं पहुंचा, तो राइट-टू-रिकॉल सिर्फ कानून की किताब में रहेगा और सड़कों पर वही पुरानी राजनीति चलती रहेगी। देवरी ने रास्ता दिखा दिया है, अब सवाल यह है कि बाकी नगर पालिकाएं जनता की आवाज़ सुनेंगी या फिर पार्षदों की सियासत में ही उलझी रहेंगी।

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