भाजपा दीर्घकालिक राजनीतिक नेतृत्व गढ़ रही है : नितिन नबीन और संगठन – डॉ. अमरीक सिंह
राजनीति में, सबसे ज़रूरी फ़ैसले शायद ही कभी वे होते हैं जो तुरंत शीर्षक बनाते हैं। ये वे फ़ैसले होते हैं जो चुपचाप अगली पीढ़ी को बनाते हैं। भारतीय जनता पार्टी का 45 साल के बिहार के मंत्री नितिन नबीन 2006 से 2025 निरंतरता में 5वीं बार बिहार विधानसभा में चुने गए सदस्य को अपना राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फ़ैसला पूरी तरह से बाद वाली वर्ग में आता है। यह सिर्फ़ एक संगठनात्मक फेरबदल नहीं है; यह एक रणनीतिक ऐलान है कि भारतीय जनता पार्टी अब पाँच साल के चुनावी चक्र में नहीं, बल्कि अगले पच्चीस - तीस साल के संस्थागत दायरे में सोच रही है। इस फ़ैसले के केंद्र में एक आसान लेकिन गहरा विचार है—एक कार्यकर्ता कैसे आगे बढ़ता है, और नेतृत्व ज़मीनी स्तर से कैसे बनता है? यह भारतीय जनता पार्टी के लिए कोई अमूर्त सवाल नहीं है। यह उसकी संगठनात्मक सोच का असली सार है। नितिन नबीन का आगे बढ़ना दिखाता है कि पार्टी एक कार्यकर्ता के संगठन जीवन यात्रा को कैसे देखती है: अनुशासन से ज़िम्मेदारी तक, ज़िम्मेदारी से अधिकार तक, और अधिकार से नेतृत्व तक।
भारतीय जनता पार्टी आज जिस मुकाम पर खड़ी है, वहाँ किसी एक चुनावी जीत या सत्ता में बने रहने से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है—भविष्य का नेतृत्व तैयार करना। भाजपा का राजनीतिक चरित्र हमेशा से “आज” से अधिक “कल” पर केंद्रित रहा है। यही कारण है कि जब पार्टी बिहार सरकार में मंत्री रहे 45 वर्षीय नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाती है, तो यह केवल एक नियुक्ति नहीं होती, बल्कि यह 25-30 वर्षों की संगठनात्मक योजना का सार्वजनिक संकेत बन जाती है। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन का यह विचार—कि कार्यकर्ता कैसे बड़ा बनता है और कैसे आगे बढ़ता है—दरअसल भाजपा की आत्मा को अभिव्यक्त करता है। यह वही पार्टी है जहाँ शीर्ष पद किसी परिवार, जाति या संयोग से नहीं, बल्कि संघर्ष, प्रशिक्षण और संगठनात्मक अनुशासन से प्राप्त होते हैं। नितिन नबीन का उदय इसी प्रक्रिया का परिणाम है, न कि अपवाद।
जब 1980 में भारतीय जनता पार्टी की औपचारिक स्थापना हुई, तो उसे न सिर्फ़ जनसंघ की विरासत मिली, बल्कि इमरजेंसी के बाद के दौर की बदलाव वाली राजनीति भी विरासत में मिली। बहुत कम लोगों को याद होगा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीरों के साथ, जयप्रकाश नारायण की तस्वीर भी कभी भारतीय जनता पार्टी के मंचों पर सजी होती थी—भले ही उनकी साख हिंदुत्व से अलग थी। मेंबरशिप से आगे हिंदुत्व का विस्तार, ज्योतिरादित्य सिंधिया और हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं का बदलाव एक गहरी सच्चाई को सामने लाता है। सिंधिया, जो कभी कांग्रेस के विरोधी राजनीतिक रवैये के चुपचाप सपोर्टर थे, अब सार्वजनिक रूप से महादजी और दत्ताजी सिंधिया का ज़िक्र करते हुए अपनी सभ्यता की विरासत को अपनाते हैं। हिमंत सरमा की राजनीतिक यात्रा इस विस्तार का एक और पहलू दिखाती है। ये कोई अजीब बातें नहीं हैं; ये विचारधारा के फैलाव का सबूत हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को आज तेज़ी से भर्ती करने की ज़रूरत नहीं है—यह अपने नज़रिए को मुख्यधारा की राजनीतिक चेतना में शामिल करने में सफल रहा है। इसलिए नितिन नवीन का आगे बढ़ना कोई भटकाव नहीं बल्कि इस सफलता का सबूत है।
भाजपा अध्यक्ष एक गैर-संवैधानिक लेकिन अत्यंत प्रभावशाली पद है, यह बात अब किसी से छिपी नहीं कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद, लिखित रूप से भले ही संवैधानिक न हो, लेकिन व्यवहारिक राजनीति में यह भारत का सबसे शक्तिशाली गैर-संवैधानिक पद माना जाता है। और मौखिक रूप से देखें तो यह पद संघ प्रमुख के बाद दूसरा सबसे प्रभावशाली स्थान रखता है। यही कारण है कि इस पद पर कौन बैठता है, यह केवल पार्टी के भीतर नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक विमर्श में हलचल पैदा करता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ संगठन से अधिक एक विचार, यह समझना आवश्यक है कि संघ केवल शाखाओं तक सीमित संगठन नहीं है; वह एक विचारधारा है। 1940–50 के दशक में जन्मी पीढ़ी के लिए संघ और जनसंघ ही एकमात्र वैचारिक मंच थे। लेकिन बाद की पीढ़ियों को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय शिक्षण मंडल, किसान संघ, मजदूर संघ और सरस्वती शिशु मंदिर जैसे अनेक वैचारिक प्रवेश द्वार मिले। जो व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा में नहीं गया, लेकिन जिसकी शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर में हुई—क्या वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ विचार से अछूता है? नहीं। आज संघी होने की परिभाषा बदल चुकी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब पार्कों से निकलकर समाज की चेतना में बस चुका है। यही कारण है कि जब नितिन नबीन जैसे नेता भाजपा अध्यक्ष बनते हैं, तो यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सबसे बड़ी वैचारिक जीत होती है।
इतिहास, आख्यान, विमर्श और सत्ता का प्रश्न, राजनीति में सबसे बड़ा युद्ध विमर्श का होता है। कांग्रेस ने दशकों तक मुस्लिम आक्रांताओं का महिमामंडन किया, नाम बदले, इतिहास लिखा। यदि भाजपा आज उस विमर्श को पलट रही है, तो इसमें असहज होने जैसा क्या है? रेस कोर्स रोड का लोक कल्याण मार्ग बनना, प्रधान मंत्री कार्यालय का नाम सेवा तीर्थ होना—ये केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि सभ्यतागत स्मृति की पुनर्स्थापना हैं। यदि कांग्रेस पाँच साल और सत्ता में रहती, तो संभव है आने वाली पीढ़ी यह पढ़ती कि भारत की स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक ने की थी। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह भली भांति समझते हैं कि इतिहास वही लिखता है जिसके पास सत्ता और विमर्श दोनों हों।
नितिन नबीन प्रतीकात्मक दृश्य और संगठनात्मक संदेश, कल्पना कीजिए—भाजपा कार्यालय के बाहर अमित शाह, जे.पी. नड्डा, धर्मेंद्र प्रधान जैसे दिग्गज हाथ बांधे खड़े हैं और जिनके स्वागत के लिए वे प्रतीक्षा कर रहे हैं, वह हैं नितिन नबीन। कल तक वही नितिन नबीन इन नेताओं के बिहार आगमन पर पुष्प लेकर पंक्ति में खड़े होते थे। यह दृश्य सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि संगठनात्मक परंपरा के निर्वाह का है। भाजपा और संघ में निर्णय लेने से पहले तीखी बहस होती है, लेकिन एक बार निर्णय हो जाए, तो उस पर सौ प्रतिशत अमल होता है। यही कारण है कि आज तक इन संगठनों में कभी विभाजन नहीं हुआ। कल्याण सिंह हों या उमा भारती—धड़े बने, लेकिन कैडर नहीं गया। संघ का कार्यकर्ता समुद्र के जहाज़ के पंछी की तरह है—घूमता है, भटकता है, लेकिन अंततः लौट आता है।
तीसरी पंक्ति का नेतृत्व, भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति, भविष्य में नितिन नबीन को पूर्ण कालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर यह स्पष्ट संदेश होगा कि भाजपा अब तीसरी पंक्ति का नेतृत्व तैयार कर रही है। पहली पंक्ति और दूसरी पंक्ति नेतृत्व पार्टी में पहले से मौजूद है। अब 45 वर्षीय नेतृत्व अपने नीचे नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करेगा। अटल–आडवाणी युग में बंगारू लक्ष्मण, जना कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू जैसे अध्यक्ष बने—क्या उन्होंने समानांतर सत्ता केंद्र खड़े किए? नहीं। और यही संगठन की शक्ति है। नितिन गडकरी का उदाहरण भी सामने है। इसी तरह, 2009 में वे भी एक राज्य स्तर के नेता थे। अवसर मिला, कद बनाया। मौके ने उन्हें कद बढ़ाने का मौका दिया। भारतीय जनता पार्टी एक कैडर आधारित पार्टी है; यह प्रदर्शन को इनाम देती है, वंशावली को नहीं।
केंद्र और राज्य सत्ता की भिन्न प्रकृति, राज्य की राजनीति स्थानीय होती है—जाति, प्रशासन, पुलिस, क्षेत्रीय मुद्दे। केंद्र की राजनीति सैद्धांतिक होती है—रक्षा, विदेश नीति, हिंदुत्व और वामपंथ से संघर्ष। संगठन, विचार और भविष्य, नितिन नबीन का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनना भाजपा के लिए कोई तात्कालिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत और संगठनात्मक यात्रा का अगला चरण है। भाजपा आज केवल चुनाव नहीं जीत रही, बल्कि वह भविष्य की पीढ़ियों के लिए वैचारिक भूमि तैयार कर रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का विस्तार अब शाखाओं से नहीं, समाज से मापा जाएगा। और नितिन नबीन जैसे नेतृत्व उसी विस्तार का प्रमाण हैं। भाजपा आज तीसरी पंक्ति का नेतृत्व, गढ़ रही है—और यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है।
डॉ. अमरीक सिंह
निदेशक, तिब्बती अध्ययन केंद्र
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय
धर्मशाला - 176215

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