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योगी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते? सत्ता की राजनीति का अनकहा सच

 

यह सवाल कि योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते, दरअसल किसी व्यक्ति की योग्यता या लोकप्रियता का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की उस जटिल संरचना का है, जहाँ सत्ता केवल जनभावना से नहीं, बल्कि संतुलन, स्वीकृति और अनकहे समझौतों से तय होती है। योगी इस संरचना में एक असहज उपस्थिति है प्रभावशाली, निर्णायक, लेकिन असुविधाजनक।

योगी की राजनीति का मूल स्वभाव स्पष्टता है। वे न धुंधली भाषा में बात करते हैं, न ही संकेतों में। यही स्पष्टता उनके समर्थकों के लिए ताकत है और सत्ता के गलियारों के लिए सबसे बड़ा संकट। दिल्ली की राजनीति सर्वसम्मति, समन्वय और छाया-राजनीति पर चलती है, जबकि योगी की राजनीति नियंत्रण, अनुशासन और प्रत्यक्ष निर्णय पर आधारित है। प्रधानमंत्री पद आज भी उसी व्यक्ति को मिलता है, जो विरोध को प्रबंधित कर सके, सहयोगियों को साध सके और असहमतियों को टाल सके। योगी इन सबमें नहीं, बल्कि इनके उलट खड़े दिखाई देते हैं।

यही कारण है कि लखनऊ से लेकर दिल्ली तक, विरोध केवल विपक्ष में नहीं, बल्कि अपनी ही पंक्तियों में भी दिखता है। उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक घटती घटनाएँ कभी प्रशासनिक विवाद, कभी सामाजिक तनाव, कभी अचानक उछाले गए मुद्दे इन्हें केवल संयोग कह देना राजनीतिक भोलेपन के अलावा कुछ नहीं। यह वही पैटर्न है, जो पहले भी सत्ता के भीतर से किसी प्रभावशाली चेहरे को सीमित करने के लिए अपनाया जाता रहा है। महाराष्ट्र इसका ताज़ा उदाहरण है, जहाँ बहुमत की राजनीति भी अंततः गठबंधनों और समझौतों के आगे झुक गई।

योगी का सबसे बड़ा अपराध यही है कि वे समायोजन की राजनीति में विश्वास नहीं रखते। वे उस राजनीति के प्रतिनिधि हैं, जो “मैनेजमेंट” से नहीं, “कमांड” से चलती है। यही शैली उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कारगर हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय सत्ता के लिए इसे जोखिम माना जाता है। प्रधानमंत्री पद आज केवल निर्णय का नहीं, बल्कि निरंतर संतुलन साधने का पद है राज्यों के बीच, जातियों के बीच, सहयोगी दलों के बीच और वैश्विक समीकरणों के बीच। योगी इन संतुलनों को साधने से अधिक उन्हें बदलने की इच्छा रखते हैं।

इसीलिए यह भी बार-बार सामने आता है कि योगी को प्रधानमंत्री पद की बजाय गृह मंत्रालय के लिए उपयुक्त माना जाता है। वहाँ उनका स्वभाव, उनकी कठोरता और उनका स्पष्ट दृष्टिकोण ताकत बन सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री पद, जो स्वभावतः लचीला और बहुस्तरीय होता है, वहाँ यही गुण बाधा बन जाते हैं। यह योग्यता की कमी नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रकृति का अंतर है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि योगी को प्रधानमंत्री देखना चाहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि पहले उन्हें मुख्यमंत्री बने रहना होगा। इतिहास गवाह है कि जब किसी नेता की लोकप्रियता उसके दल के भीतर असहजता पैदा करने लगती है, तो उसे ऊपर ले जाने से पहले नीचे सीमित करने की कोशिश होती है। यही आशंका आज योगी के संदर्भ में भी दिखाई देती है। उनके समर्थक भावनाओं में प्रधानमंत्री पद की बात करते हैं, जबकि साजिशें मुख्यमंत्री पद के इर्द-गिर्द बुनी जा रही हैं।

यह कहना योगी का विरोध नहीं है, बल्कि राजनीतिक यथार्थ की स्वीकारोक्ति है। राजनीति में चाहत से नहीं, समीकरण से पद तय होते हैं। योगी आदित्यनाथ में नेतृत्व की कमी नहीं है, लेकिन वे उस ढाँचे में फिट नहीं बैठते, जो प्रधानमंत्री पद के लिए अनिवार्य माना जाता है। यदि भविष्य में यह आशंका गलत साबित हो जाए, तो यह केवल योगी की नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन होगा। और यदि ऐसा न हो, तो यह याद रखा जाएगा कि समस्या योग्यता की नहीं थी, व्यवस्था की थी।

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