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‘घूसखोर पंडत’ विवाद: वेब सीरीज पर देशभर में आक्रोश

 

देश एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सांस्कृतिक असंवेदनशीलता को वैध ठहराने का प्रयास किया जा रहा है। बीते कुछ वर्षों में यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन चुकी है कि भारतीय समाज की जड़ों से जुड़े शब्दों, प्रतीकों और समुदायों को बार-बार विवाद के केंद्र में लाया जा रहा है। ताज़ा मामला ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर प्रस्तावित एक वेब सीरीज़ के शीर्षक से जुड़ा है, जिसने पूरे ब्राह्मण समाज को आहत कर दिया है। सवाल सिर्फ एक वेब सीरीज़ या एक किरदार का नहीं है, सवाल उस मानसिकता का है जो बार-बार “पंडित” जैसे सम्मानसूचक शब्द को नकारात्मक अर्थों के साथ जोड़ने का दुस्साहस करती है।

‘पंडित’ शब्द भारतीय सभ्यता में केवल एक जातिसूचक संज्ञा नहीं है। यह ज्ञान, विवेक, नैतिकता, शास्त्र और संस्कृति का प्रतीक रहा है। जिस समाज ने सदियों तक राष्ट्र को बौद्धिक दिशा दी, स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर संविधान निर्माण तक जिसकी भूमिका ऐतिहासिक रही, उसी समाज के प्रतीक शब्द को ‘घूसखोर’ जैसे आपराधिक विशेषण के साथ जोड़ना केवल एक रचनात्मक प्रयोग नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अपमान है। भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति का दोष हो सकता है, किसी पेशे की कमजोरी हो सकती है, लेकिन उसे किसी समुदाय की पहचान से जोड़ देना एक सोची-समझी वैचारिक चूक है।

यह और भी अधिक पीड़ादायक तब हो जाता है जब देश में तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार सत्ता में हो, जो वर्षों से ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को अपनी वैचारिक पूंजी बताती रही है। विपक्ष में रहते हुए जिन नारों से देश का वातावरण गूंजता था, सत्ता में आने के बाद वही नारे बेमानी क्यों प्रतीत होने लगे हैं, यह प्रश्न आज आम नागरिक के मन में है। अगर सरकार सचमुच संस्कृति और परंपरा की रक्षक है, तो फिर सेंसर बोर्ड और सूचना-प्रसारण तंत्र की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर ऐसे शीर्षक सेंसर बोर्ड की नाक के नीचे से कैसे गुजर जाते हैं? क्या बोर्ड सचमुच सो रहा है या उसे सुला दिया गया है?

यह कोई पहला अवसर नहीं है। हर वर्ष कोई न कोई फिल्म, सीरीज़ या कंटेंट सामने आता है, जो कभी सनातन परंपराओं को चोट पहुंचाता है, कभी किसी क्षत्रिय प्रतीक को विकृत करता है, तो कभी ब्राह्मण समाज को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करता है। अजीब संयोग है कि ‘क्रिएटिव फ्रीडम’ का प्रयोग प्रायः उन्हीं प्रतीकों पर होता है, जो भारतीय संस्कृति की रीढ़ रहे हैं। क्या यही साहस किसी अन्य मजहबी या वैचारिक समूह के साथ दिखाया जा सकता है? यदि नहीं, तो यह चयनात्मक निर्भीकता नहीं, बल्कि वैचारिक पक्षपात है।

निर्माता और अभिनेता की सफाइयाँ अपनी जगह हैं। यह कहना कि किरदार काल्पनिक है या उपनाम संयोगवश है, समाज की पीड़ा को समाप्त नहीं करता। जब भावनाएँ आहत होती हैं, तब कानूनी परिभाषाएँ कमजोर पड़ जाती हैं। यदि वास्तव में संवेदनशीलता होती, तो शीर्षक चयन से पहले ही यह सोचा जाता कि शब्दों की सामाजिक और ऐतिहासिक स्मृति क्या है। यह तर्क भी असहज करता है कि निर्माता और अभिनेता स्वयं ब्राह्मण हैं, इसलिए आरोप निराधार हैं। आत्म-आलोचना और आत्म-अपमान के बीच का फर्क समझना भी आवश्यक है।

यह विवाद केवल एक समुदाय की भावना का प्रश्न नहीं है, यह उस दिशा का संकेत है, जिसमें हमारी सांस्कृतिक चेतना को मोड़ा जा रहा है। यदि आज ‘पंडित’ को घूसखोरी का पर्याय बना दिया गया, तो कल कौन सा शब्द निशाने पर होगा? राष्ट्र केवल भूगोल से नहीं बनता, वह स्मृतियों, प्रतीकों और सम्मान से बनता है। जब इन पर चोट होती है, तो राष्ट्र की आत्मा आहत होती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, सेंसर बोर्ड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स अपनी जिम्मेदारी समझें। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक विद्रूप फैलाने की छूट नहीं हो सकता। रचनात्मकता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन ही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। यदि यह संतुलन नहीं बना, तो समाज सड़क से लेकर न्यायालय तक अपनी आवाज़ उठाने को विवश होगा। इतिहास गवाह है भारतीय समाज चुप रहता है, कमजोर नहीं होता।

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