प्राचीन भारत की नदियाँ: लुप्त नदियाँ, जीवित सभ्यता | प्रतियोगी परीक्षा विशेष
भारत का इतिहास किसी राजसिंहासन की कथा भर नहीं है, यह उस राष्ट्र की आत्मा का इतिहास है जो नदियों के तट पर जन्मा, पला और युगों तक विश्व को दिशा देता रहा। भारत की सभ्यता तलवार से नहीं, जल से विकसित हुई। जिन नदियों के किनारे वैदिक ऋचाएँ रची गईं, यज्ञ हुए, गुरुकुल बसे और जनपद खड़े हुए, वही नदियाँ भारत की राष्ट्र-चेतना की पहली शिल्पकार हैं। इसलिए प्राचीन भारत की नदियों को समझना, वास्तव में भारत को समझना है।
वैदिक काल में जब संसार के अनेक भाग अज्ञान और अस्थिरता में थे, तब भारत में संगठित जीवन नदियों के सहारे विकसित हो चुका था। सिंधु नदी के तट पर विकसित सभ्यता ने नगर-नियोजन, स्वच्छता, व्यापार और सामाजिक अनुशासन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे आज भी विश्व आश्चर्य से देखता है। सिंधु केवल एक नदी नहीं थी, वह भारत की पहचान थी। विदेशी आक्रांताओं ने इसी के नाम पर इस भूमि को ‘हिंदु’, ‘हिंदुस्तान’ और आगे चलकर ‘इंडिया’ कहा। यह तथ्य अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि भारत की पहचान उसकी नदियों से जुड़ी रही है, न कि किसी विदेशी सत्ता से।
ऋग्वेद में सबसे अधिक गौरव यदि किसी नदी को प्राप्त है तो वह सरस्वती है। सरस्वती उस काल में भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक धुरी थी। उसे नदीतमा कहा गया, अर्थात नदियों में श्रेष्ठ। भूगर्भीय और वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि समय के साथ हिमालयी परिवर्तनों और जलवायु बदलावों के कारण सरस्वती का प्रवाह क्षीण होता गया। यमुना और सतलुज के मार्ग बदलने से उसका जीवन स्रोत समाप्त हुआ और वह धीरे-धीरे लुप्त हो गई। किंतु सरस्वती का लुप्त होना भारत की स्मृति से उसका मिट जाना नहीं था। वह आज भी हमारी संस्कृति, मंत्रों, परंपराओं और चेतना में जीवित है। यह भारत की विशेषता है कि यहाँ नदियाँ केवल भौतिक नहीं, सांस्कृतिक सत्ता भी होती हैं।
सरस्वती की सहायक दृषद्वती जैसी नदियाँ भी समय के साथ विलीन हो गईं। यह परिवर्तन हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ संतुलन बिगड़ने पर सभ्यताओं को भी मूल्य चुकाना पड़ता है। यही कारण है कि भारत ने सदैव प्रकृति को पूज्य माना, शोषण का विषय नहीं।
प्राचीन भारत की अनेक नदियाँ आज भी प्रवाहित हैं, पर उनके नाम बदल चुके हैं। यह नाम परिवर्तन किसी एक काल की घटना नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक यात्रा का परिणाम है। वैदिक काल में नदियों के नाम उनके गुणों पर आधारित थे। शतद्रु का अर्थ था सौ धाराओं वाली नदी, वितस्ता अपने तीव्र प्रवाह के कारण जानी गई, असिक्नी अपने गहरे रंग के जल के कारण। जैसे-जैसे भारत की भाषाएँ बदलीं, स्थानीय बोलियाँ विकसित हुईं और विदेशी संपर्क बढ़ा, वैसे-वैसे इन नामों के उच्चारण भी बदलते गए।
उत्तर-पश्चिम भारत में फारसी और यूनानी प्रभाव के समय वितस्ता का नाम परिवर्तित होकर झेलम हो गया, असिक्नी चिनाब कहलाने लगी और शतद्रु सतलुज बन गई। परुष्णी या इरावती को रावी कहा जाने लगा। यह परिवर्तन किसी सांस्कृतिक क्षरण का नहीं, बल्कि भारत की भाषाई बहुलता और आत्मसात करने की क्षमता का प्रमाण है। भारत ने आक्रमण झेले, शासन बदले, पर नदियाँ बहती रहीं और सभ्यता जीवित रही।
गंगा और यमुना के नाम लगभग अपरिवर्तित रहे, क्योंकि वे भारत की धार्मिक और राष्ट्रीय चेतना की केंद्र रेखा थीं। गंगा को जाह्नवी और भागीरथी जैसे नामों से पुकारा गया, यमुना को कालिंदी कहा गया, पर उनकी मूल पहचान अक्षुण्ण रही। सरयू, जो रामायण काल में अयोध्या की जीवनरेखा थी, आज घाघरा कहलाती है। नाम बदला, पर राम की मर्यादा और भारत की स्मृति नहीं बदली।
दक्षिण भारत में भी यही राष्ट्रात्मा दिखाई देती है। गोदावरी को गौतमी कहा गया, कृष्णा को कृष्णवेणी और नर्मदा को रेवा। समय के साथ प्रचलन बदला, पर सांस्कृतिक धारा नहीं टूटी। मध्यकाल और औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने नदियों के नाम अपने उच्चारण के अनुसार मानचित्रों में दर्ज किए, जो आगे चलकर आधिकारिक हो गए। इसके बावजूद प्राचीन नाम आज भी ग्रंथों, तीर्थों और लोकस्मृति में जीवित हैं।
भारत में नदियाँ केवल अतीत की धरोहर नहीं, वर्तमान की धड़कन हैं। प्रयाग की त्रिवेणी, वाराणसी की गंगा, नासिक की गोदावरी और कांची की कावेरी आज भी राष्ट्रीय चेतना को जोड़ती हैं। जल विवाद हों या पर्यावरण की चुनौती, भारत में नदियों से जुड़े प्रश्न केवल प्रशासनिक नहीं, राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़े होते हैं।
राष्ट्र-निर्माण से जुड़े विद्यार्थियों, विशेषकर पीएससी, आईपीएस और अन्य उच्च सेवाओं की तैयारी करने वालों के लिए नदियों का यह अध्ययन अनिवार्य है। क्योंकि एक सशक्त राष्ट्र वही होता है, जिसका प्रशासक अपनी भूमि के इतिहास, संस्कृति और चेतना को समझता हो। भारत की नदियाँ हमें यह सिखाती हैं कि परिस्थितियाँ बदलती हैं, नाम बदलते हैं, मार्ग बदलते हैं, पर जो राष्ट्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वह कभी समाप्त नहीं होता।
कुछ नदियाँ आज रेत के नीचे हैं, कुछ नए नामों से बह रही हैं, लेकिन सभी मिलकर भारत की अखंड राष्ट्रधारा का निर्माण करती हैं। यही भारत की शक्ति है, यही उसकी निरंतरता है और यही उसका सनातन राष्ट्रधर्म।

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