भारत की सांस्कृतिक आत्मा और वैश्विक मार्गदर्शन– डॉ.अमरीक सिंह ठाकुर
भारत की आत्मा में ‘सेवा’ केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक शाश्वत दृष्टिकोण है। यह दर्शन हमें बताता है कि समाज, संस्कृति और राजनीति की वास्तविक शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक पूंजी से नहीं, बल्कि सेवा-भाव और साझेदारी की परंपरा से आती है। इतिहास से लेकर आधुनिक युग तक, भारत ने सेवा को केवल दान या परोपकार की सीमाओं में नहीं रखा, बल्कि इसे सामाजिक संगठन, धार्मिक अनुशासन, राजनीतिक संघर्ष और वैश्विक नैतिकता की धुरी बनाया। यही वह दृष्टि है जिसने भारत को समय-समय पर आत्म-नवाचार, आत्म-बलिदान और आत्म-विकास की ओर अग्रसर किया। आज जब दुनिया शक्ति, शांति और स्थिरता की तलाश में है, तब भारत की सेवा-परंपरा वैश्विक विमर्श में एक नई ऊर्जा के रूप में सामने आ रही है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
सेवा का शाश्वत प्रवाह, भारत का इतिहास सेवा और सहयोग से भरा हुआ है। वैदिक ऋचाओं से लेकर उपनिषदों तक, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की आकांक्षा ने सेवा को ब्रह्मांडीय कर्तव्य घोषित किया। बौद्ध और जैन परंपराओं ने अहिंसा और करुणा को सेवा के रूप में स्थापित किया। अशोक जैसे सम्राट ने शक्ति को युद्ध से नहीं, बल्कि धर्म और लोकहित से परिभाषित किया। मध्यकाल में सूफ़ी परंपरा और संत परंपरा ने सेवा को आस्था और भाईचारे से जोड़ा। वहीं सिख गुरुओं ने इसे संगठित शक्ति का रूप दिया। लंगर और सेवा की प्रथा ने यह सिद्ध किया कि समाज का उत्थान केवल पूजा या कर्मकांड से नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम और साझी जिम्मेदारी से होता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक आयाम
विविधता में सेवा का सूत्र, भारत की विविध परंपराएँ सेवा को अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त करती हैं। हिन्दू दर्शन में निष्काम कर्मयोग सेवा का मूल है; बौद्ध धर्म में करुणा और मैत्रीभाव सेवा का मार्ग है; सिख पंथ ने सेवा को सामूहिक जीवन का अनिवार्य आधार बनाया; जबकि इस्लामी सूफ़ी परंपरा ने ‘ख़िदमत’ को ईश्वर की आराधना से जोड़ा। यह सांस्कृतिक बहुलता इस तथ्य को पुष्ट करती है कि सेवा भारतीय जीवन-दर्शन की साझा धारा है। यह केवल धर्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि राष्ट्र की नैतिक और सामाजिक आत्मा है। यही कारण है कि भारत की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता सेवा की इस साझा परंपरा से गढ़ी गई।
राजनीतिक और स्वतंत्रता संग्राम में सेवा का स्वरूप, भारत के स्वतंत्रता संग्राम को देखें तो उसमें सेवा की धारा स्पष्ट दिखती है। गांधीजी का सत्याग्रह और स्वदेशी आंदोलन केवल राजनीतिक रणनीति नहीं थे, बल्कि सेवा-भावना से प्रेरित जन-शक्ति के प्रयोग थे। गांधीजी ने सेवा को ‘राष्ट्रधर्म’ बताया। उनके लिए सेवा का अर्थ था – स्वावलंबन, सामुदायिक एकता और श्रम का सम्मान।
सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज, भगत सिंह का बलिदान, और अनगिनत क्रांतिकारियों का त्याग भी सेवा के ही रूप थे—समाज और देश के प्रति सर्वोच्च समर्पण। स्वतंत्रता आंदोलन ने यह स्थापित किया कि जब सेवा सामूहिक जनचेतना बन जाती है, तब वह राजनीतिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा आधार बन सकती है।
सामाजिक विमर्श
सेवा और समाज का पुनर्निर्माण, स्वतंत्रता के बाद भी भारत की सेवा-परंपरा सामाजिक संगठनों और आंदोलनों में प्रकट होती रही। सर्वोदय आंदोलन, भूदान आंदोलन, और स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से निकले युवा संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामोदय के क्षेत्र में सेवा को सामाजिक क्रांति का आधार बनाया। आज भी सेवा भारती, आर्ट ऑफ लिविंग, रामकृष्ण मिशन, और अनगिनत एनजीओ—बाढ़, भूकंप, महामारी और आपदा की घड़ी में सेवा की मिसालें पेश करते हैं। सेवा अब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आधुनिक सामाजिक कल्याण और न्याय की अनिवार्य प्रक्रिया है।
वैश्विक संदर्भ
सेवा से विश्वगुरु तक, 21वीं सदी में जब दुनिया जलवायु संकट, महामारियों और असमानताओं से जूझ रही थी, तब भारत ने सेवा को वैश्विक कूटनीति का हिस्सा बनाया। कोविड-19 महामारी के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल ने भारत की सेवा-दृष्टि को विश्व मंच पर स्थापित किया। भारत ने ग्लोबल साउथ के देशों के लिए आवाज़ उठाई, आपदा राहत अभियानों में नेतृत्व किया और शांति सैनिकों के माध्यम से सेवा-भावना को वैश्विक राजनीति में प्रत्यक्ष किया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल नारा नहीं रहा, बल्कि सेवा के आधुनिक वैश्विक रूप में पुनर्परिभाषित हुआ।
सेवा, पर्यावरण और सतत विकास, भारत की सेवा-दृष्टि का एक नया आयाम प्रकृति की ओर उन्मुख है। गंगा, यमुना और हिमालय के प्रति सम्मान हो या चिपको आंदोलन और बिश्नोई परंपरा—भारत ने हमेशा प्रकृति की सेवा को मानवता की सेवा के समान समझा। आज स्वच्छ भारत मिशन, नमामि गंगे, और नवीकरणीय ऊर्जा अभियानों के माध्यम से सेवा सतत विकास की रणनीति में परिवर्तित हो चुकी है। भारत यह संदेश दे रहा है कि सेवा का वास्तविक रूप केवल इंसानों तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त पर्यावरण और पारिस्थितिकी तक विस्तृत है। डिजिटल युग में सेवा: नई संभावनाएँ, आज सेवा केवल भौतिक श्रम नहीं, बल्कि डिजिटल सहयोग का रूप भी ले चुकी है। आधार, जनधन योजना, और UPI प्लेटफॉर्म जैसी पहलों ने सामाजिक सेवा को तकनीक के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुँचाया। डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस ने यह सिद्ध किया कि सेवा आधुनिक शासन और तकनीकी नवाचार का भी केंद्रीय तत्व हो सकती है।
भविष्य की दिशा
सेवा से शक्ति का मार्ग, भारत के लिए भविष्य की दिशा सेवा को शक्ति में रूपांतरित करने की है। सेवा-भावना को राजनीतिक नीतियों, आर्थिक योजनाओं और वैश्विक सहयोग की आधारशिला बनाना होगा। सिविक नेशनलिज़्म, सामाजिक न्याय, सतत विकास, और वैश्विक शांति—इन सभी का सूत्र केवल सेवा की संस्कृति से जुड़ा है। यदि भारत आने वाले दशकों में सेवा की इस परंपरा को और सशक्त करता है, तो वह न केवल विश्वगुरु बल्कि विश्वसेवक के रूप में भी स्थापित होगा। यही भारत का वैश्विक योगदान होगा—शक्ति और शांति का अद्वितीय संगम। सेवा भारत की आत्मा है, उसकी पहचान है और उसका भविष्य है। यह दर्शन भारत को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक वैश्विक मार्गदर्शक बनाता है। इतिहास से वर्तमान तक और स्थानीय से वैश्विक स्तर तक—सेवा ही वह धारा है जिसने भारत को जीवित रखा, संगठित किया और दिशा दी। आज जब मानवता संकटों और चुनौतियों से जूझ रही है, तब भारत की सेवा-परंपरा विश्व के लिए आशा का स्रोत है। यही वह अदृश्य शक्ति है जो भारत को महाशक्ति से भी आगे, एक नैतिक शक्ति के रूप में स्थापित करती है।
डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर
निदेशक - तिब्बती अध्ययन केंद्र
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय।

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