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शिवपुरी में बेखौफ अपराध, सवालों के घेरे में पुलिस

 

शिवपुरी में पुलिस व्यवस्था इन दिनों किसी गहरे आत्ममंथन की नहीं, बल्कि आत्मसंतोष की अवस्था में दिखाई देती है। अपराध अपनी पूरी निर्भीकता के साथ सड़कों, मोहल्लों और घरों के भीतर टहल रहा है और पुलिस फाइलों, नोटशीटों और औपचारिकताओं के बीच उलझी हुई है। हालात ऐसे हैं कि कानून का डर अपराधियों के चेहरे से उतर चुका है और आम नागरिक के चेहरे पर स्थायी भय चढ़ गया है।

NDPS जैसे गंभीर कानून के अंतर्गत दर्ज एक मामले में 48 लाख रुपये के डोडा चूरा की जब्ती कोई मामूली घटना नहीं थी। यह वह अपराध है, जो सिर्फ एक ड्राइवर के बूते का नहीं होता। इसके पीछे पूरा नेटवर्क, संरक्षक, खरीदार और सफेदपोश छाया होती है। लेकिन शिवपुरी पुलिस ने शायद यह मान लिया कि नशे का साम्राज्य सिर्फ स्टीयरिंग थामे बैठे एक व्यक्ति से चलता है। ड्राइवर को आरोपी बनाकर विवेचना को ऐसे विराम दे दिया गया, जैसे पुलिस ने अपराध नहीं, बल्कि कोई औपचारिक फाइल निपटा दी हो। अब जब जांच बैठी है, तो यह सवाल लाजिमी है कि तब तक पुलिस सो रही थी या सोने का नाटक कर रही थी।

इधर अपराधियों का आत्मविश्वास देखिए थाने से महज 500 मीटर की दूरी पर, कस्बे के बीचोबीच दो रिटायर्ड शिक्षकों के घरों में घुसकर एक करोड़ रुपये से अधिक की चोरी कर ली जाती है। यह चोरी नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था के मुंह पर डाला गया खुला तमाचा है। रिटायर्ड शिक्षक, जिन्होंने जीवन भर अनुशासन और नैतिकता पढ़ाई, अपने ही घर में सबसे असुरक्षित निकले। सवाल यह नहीं कि चोरी कैसे हुई, सवाल यह है कि इतनी बड़ी वारदात के लिए अपराधियों को यह भरोसा कहां से मिला कि उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है।

फिजिकल थाना क्षेत्र में हालात और भी विचित्र हैं। यहां चोरों ने यह तय कर लिया है कि पत्रकार हो या पुजारी, मंदिर हो या घर सब उनके लिए एक समान आसान लक्ष्य हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार के घर को निशाना बनाया जाता है और समाधान के तौर पर पुलिस सुरक्षा देने के बजाय निजी गार्ड रखने की सलाह देती है। यानी पुलिस खुद मान चुकी है कि अब सुरक्षा उसकी जिम्मेदारी नहीं रही। यह सलाह नहीं, बल्कि एक असफलता का लिखित स्वीकार है।

श्री नवग्रह हनुमान मंदिर में रात के अंधेरे में चोरी होना कोई नई बात नहीं रह गई है। यह पांचवीं बार है जब उसी मंदिर में चोरों ने हाथ साफ किया। मंदिर की घंटियां नहीं, बल्कि पुलिस की नींद बार-बार टूटनी चाहिए थी, लेकिन यहां उल्टा हो रहा है। चोर नियमित हैं, मंदिर असुरक्षित है और पुलिस की संवेदना हर बार की तरह अनुपस्थित।

शिवपुरी पुलिस का यह व्यवहार अब लापरवाही से आगे बढ़कर असंवेदनशीलता का रूप ले चुका है। जब अपराध को हल्के में लिया जाए, जब विवेचना को औपचारिकता समझा जाए और जब पीड़ित को ही अपनी सुरक्षा का इंतजाम करने की सलाह दी जाए, तब यह समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था का भरोसा डगमगा चुका है। पुलिस अगर यूं ही अपराधों को कागजों में समेटती रही, तो आने वाले दिनों में शिवपुरी में अपराध की नहीं, बल्कि भरोसे की लाशें गिरेंगी। और तब शायद कोई रिपोर्ट लिखने वाला भी सुरक्षित नहीं बचेगा।

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