शिवपुरी में पत्रकारिता या दलाली? सच का आईना
शिवपुरी में पत्रकारिता अब कई बार खबरों की नहीं, बल्कि नकाबों की दुनिया लगने लगी है। सवाल यह नहीं कि पत्रकार कौन है, सवाल यह है कि पत्रकारिता आखिर बची कहाँ है? जिस पेशे का मूल स्वभाव सवाल करना, सच के साथ खड़ा होना और समाज के कमजोर हिस्से की आवाज़ बनना था, वही पेशा आज कुछ लोगों के हाथों सौदेबाज़ी, धमकाने और दलाली का औज़ार बनता दिख रहा है। यह स्थिति केवल शर्मनाक नहीं, बल्कि भयावह है।
आज शहर की गलियों, दफ्तरों, स्कूलों और अस्पतालों में माइक और आईडी टांगकर घूमते कुछ चेहरे खुद को पत्रकार घोषित करते फिरते हैं। न कोई वैचारिक समझ, न भाषा पर पकड़, न सामाजिक जिम्मेदारी का बोध, बस पहचान पत्र, कैमरा और “खबर छाप देंगे” का डर। सौ–दो सौ रुपये में खबरें बिकती हैं, ज्ञापन लिखे जाते हैं, भीड़ जुटाई जाती है और फिर उसी भीड़ के कंधे पर बंदूक रखकर अपने निजी स्वार्थ साधे जाते हैं। यह पत्रकारिता नहीं, यह खुली ठेकेदारी है।
इन तथाकथितों की एक अलग ही कला है "चाटुकारिता"। यह कला इतनी परिष्कृत है कि किसी भी शासकीय कर्मचारी, अधिकारी या नेता को पल भर में रिश्तेदार बना लिया जाता है। जीजा, मौसा, फूफा, दीदी, बुआ रिश्तों की ऐसी फौज खड़ी कर दी जाती है कि सच्चा रिश्ता भी शरमा जाए। फोटो सेशन होते हैं, सोशल मीडिया पर इतराया जाता है और संदेश दिया जाता है कि “देखो, हमारी पहुंच कहाँ तक है।” सवाल यह है कि यह पहुंच समाज के लिए है या सिर्फ अपने पेट और अहंकार के लिए?
विडंबना यह भी है कि यही लोग जातिवाद की आग को हवा देने से भी नहीं चूकते। खबर नहीं, पहचान बेची जाती है। मुद्दे नहीं, वर्ग और जातियाँ परोसी जाती हैं। समाज को जोड़ने का दावा करने वाले, भीतर ही भीतर समाज को तोड़ने का काम करते हैं। और जब जनसंपर्क विभाग जैसे संस्थान ऐसे चेहरों से प्रमाण और संस्थान की जानकारी मांगते हैं, तो सच्चाई सामने आ जाती है। जिनके पास बताने को कुछ नहीं होता, वही सबसे ज्यादा शोर मचाते हैं। सूची से बाहर होना इन्हें आईना दिखाता है, और आईना इन्हें सबसे ज्यादा चुभता है।
फिर शुरू होता है नाटक, सम्मान समारोह, दाल–बाटी, मंच, माला, अतिशयोक्ति से भरे भाषण। किसी जनप्रतिनिधि की छाया में खड़े होकर खुद को सबसे बड़ा पत्रकार साबित करने की कोशिश। जनता भी भ्रम में आ जाती है। वह समझ नहीं पाती कि जिन्हें आज सिर पर बैठाया जा रहा है, वही कल गले का फंदा बन सकते हैं। असली पत्रकार, जो चुपचाप, ईमानदारी से अपना काम करता है, वही इस तमाशे में सबसे ज्यादा कुचला जाता है।
क्या पत्रकारिता की पहचान अब योग्यता से नहीं, बल्कि जुगाड़ से होगी? क्या सच की कीमत सौ रुपये तय हो चुकी है? क्या समाज को आईना दिखाने वाला पेशा अब समाज को ही भ्रम में रखने का साधन बन गया है? और सबसे बड़ा सवाल अगर आज इस गिरावट पर सवाल नहीं उठे, तो कल सच बोलने वाला बचेगा भी या नहीं?
शायद अब समय आ गया है कि पत्रकारिता की आड़ में पल रही इस गुंडागर्दी, अभिमान और मनमानी पर सांकेतिक नहीं, नैतिक दुनाली चलाई जाए। ऐसी दुनाली, जो शब्दों की हो, सवालों की हो और सच की हो। क्योंकि जब कलम बिकने लगे, तो समाज का भविष्य भी गिरवी पड़ जाता है।

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