हम बीमार हैं क्योंकि हमने अपनी परंपराओं को 'पिछड़ापन' मान लिया – डॉ.अमरीक सिंह ठाकुर
दातून से दूर भागे, तो रोग पास आए वापसी का वक्त आ गया है! "बासी पानी जे पिये, ते नित हर्रा खाय। मोटी दतुअन जे करे, ते घर बैद्य न जाय।" यह पुरानी कहावत सिर्फ एक लोकोक्ति नहीं, बल्कि हमारे पुरखों का वह अनुभवजन्य ज्ञान है जिसे हमने आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो दिया। आज जब हर दूसरे घर में डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन का मरीज मिल जाता है, तो मन में सवाल उठता है आखिर 1990 से पहले ऐसा क्यों नहीं था? क्या बदला? खानपान? जीवनशैली? या फिर वह छोटी सी चीज़, जिसे हमने 'पिछड़ेपन' का प्रतीक मानकर अपनी ज़िंदगी से बाहर कर दिया दातून। जी हां, वही दातून, जो आज गांवों में भले ही दिख जाए, लेकिन शहरों में इसे इस्तेमाल करना लगभग शर्मिंदगी का कारण बन चुका है।
नब्बे के दशक से पहले डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन के मरीज़ बहुत कम थे। लेकिन जैसे-जैसे हमारी जीवनशैली बदली, वैसे-वैसे ये बीमारियां हर घर में दस्तक देने लगीं। क्या महज़ संयोग है कि गांवों में डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन के मरीज़ शहरों की तुलना में आज भी कम हैं? दरअसल, गांवों में आज भी ज्यादातर लोग दातून का इस्तेमाल करते हैं। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सच है जिसे हमने नज़रअंदाज़ कर दिया। आइए, इस सच की परतें खोलते हैं और समझते हैं कि किस तरह टूथपेस्ट और माउथवॉश ने हमारी सेहत के साथ सबसे बड़ा धोखा किया है।
आज बाज़ार में जो टूथपेस्ट और माउथवॉश धड़ल्ले से बिक रहे हैं, उनका दावा है "99.9% जर्म्स को मार गिराएं।" सुनने में बड़ा आकर्षक लगता है ना? लेकिन असल में यही दावा हमारी सेहत के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ साबित हो रहा है। ये टूथपेस्ट और माउथवॉश इतने ताकतवर एंटीमाइक्रोबियल होते हैं कि ये हमारे मुंह के लगभग सभी सूक्ष्मजीवों का सफाया कर देते हैं। और यहीं से शुरू होती है असली समस्या। इनकी मारक क्षमता इतनी जबर्दस्त होती है कि ये उन लाभकारी बैक्टीरिया का भी खात्मा कर देते हैं, जो हमारी लार में होते हैं और हमारे शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
दरअसल, हमारे मुंह की लार में कुछ खास बैक्टीरिया होते हैं जैसे एक्टिनोमायसिटीज़, निसेरिया, शालिया, वीलोनेला आदि। ये बैक्टीरिया हमारे शरीर में मौजूद नाइट्रेट को नाइट्राइट में और फिर नाइट्रिक ऑक्साइड में बदलने का काम करते हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड हमारे शरीर में रक्तवाहिनियों को लचीला और स्वस्थ रखता है, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है और इंसुलिन की संवेदनशीलता को बनाए रखता है। जब हमारे शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड की मात्रा घट जाती है, तो ब्लड प्रेशर बढ़ता है और इंसुलिन रेसिस्टेंस पैदा होता है जो सीधे-सीधे डायबिटीज़ की ओर ले जाता है। जब माउथवॉश और टूथपेस्ट इन लाभकारी बैक्टीरिया को मार देते हैं, तो नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन रुक जाता है। नतीजा हाइपरटेंशन और डायबिटीज़।
यह कोई कपोल-कल्पित बात नहीं है। जर्नल ऑफ क्लिनिकल हाइपरटेंशन (2004) में प्रकाशित 'नाइट्रिक ऑक्साइड इन हाइपरटेंशन' शीर्षक वाले रिव्यू आर्टिकल में विस्तार से बताया गया है कि नाइट्रिक ऑक्साइड की कमी हाइपरटेंशन के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। इसी तरह ब्रिटिश डेंटल जर्नल (2018) में 'माउथवॉश यूज़ एंड रिस्क ऑफ डायबिटीज़' शीर्षक से एक अध्ययन प्रकाशित हुआ, जिसमें तीन साल तक उन लोगों पर शोध किया गया जो दिन में कम से कम दो बार माउथवॉश का इस्तेमाल करते थे। नतीजा चौंकाने वाला था — 50% से अधिक लोगों में प्री-डायबिटिक या डायबिटीज़ की स्थिति पाई गई। अब समझ में आया कि किस तरह हमारी मुंह की 'सफाई' का जुनून हमें अंदर से खोखला कर रहा है?
दांतों की फिक्र करने के चक्कर में हमारे पूरे शरीर की बैंड बज रही है। जिन बैक्टीरिया को मारने के लिए हम दिन में दो-तीन बार माउथवॉश और टूथपेस्ट का इस्तेमाल करते हैं, वही बैक्टीरिया दरअसल हमारी सेहत के रक्षक हैं। और हम उन्हें मार-मारकर अपनी ही कब्र खोद रहे हैं। यह कितनी विडंबना है कि जिस चीज़ को हम अपनी सेहत के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, वही हमारी बीमारियों की जड़ बन रही है। बाज़ार की चमक-दमक में हमने अपने पुरखों के ज्ञान को भुला दिया और आज उसकी कीमत चुका रहे हैं।
अब बात करते हैं दातून की। नीम, बबूल, खैर, जामुन, आम, करंज जैसे पेड़ों की टहनियों से बनी दातून सदियों से भारतीय परंपरा का हिस्सा रही है। आयुर्वेद में तो साफ लिखा है — "रोगा मुखादारभ्यं" — यानी शरीर के 90% रोगों की जड़ मुंह की गंदगी में है। और इसका समाधान भी प्रकृति में ही छिपा है। चरक और सुश्रुत संहिता में उल्लेख है कि "कटु, तिक्त, कषाय रसयुक्त द्रव्यों से दंतधावन किया जाए।" यानी जो पदार्थ तीखे, कड़वे और कसैले हों, वे मुंह की सफाई के लिए सर्वोत्तम हैं। यह सिर्फ सफाई नहीं, बल्कि औषधीय प्रक्रिया है। हमारे पुरखे जानते थे कि दातून केवल दांतों की सफाई का साधन नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार है।
जर्नल ऑफ क्लिनिकल डायग्नोसिस एंड रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन में नीम और बबूल की दातून पर शोध किया गया। पाया गया कि ये दोनों स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटेंस नामक बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकने में अत्यंत प्रभावी हैं। यह वही बैक्टीरिया है जो दांतों को सड़ाता है और कैविटी का कारण बनता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दातून उन लाभकारी बैक्टीरिया का नाश नहीं करती, जो नाइट्रिक ऑक्साइड बनाने में मदद करते हैं। क्योंकि दातून में वे हार्ड केमिकल कंपाउंड नहीं होते, जो टूथपेस्ट और माउथवॉश में डाले जाते हैं। यही वह बुनियादी अंतर है जो दातून को टूथपेस्ट से अलग और बेहतर बनाता है।
नीम की दातून कड़वा स्वाद और गर्म तासीर वाली होती है। यह मुंह की बदबू दूर करती है, मसूड़ों को मजबूत बनाती है, कीड़े और पायरिया से बचाती है, सूजन और खून आने की समस्या को ठीक करती है और इम्युनिटी बढ़ाती है। गर्मी और बरसात में यह सर्वोत्तम मानी जाती है। वहीं बबूल की दातून कसैले स्वाद और ठंडी प्रकृति वाली होती है। यह दांतों में चमक लाती है, हिलते दांतों को संभालती है, मसूड़ों से खून बहना रोकती है और छालों में आराम देती है। हर मौसम में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन ठंड में यह विशेष रूप से लाभकारी है।
खैर की दातून तीव्र कसैला और शीतल गुण वाली होती है। यह मसूड़ों को चट्टान की तरह मजबूत बनाती है, खून तुरंत रोकती है और प्राकृतिक रूप से दांतों की सुरक्षा करती है। जामुन की दातून मीठा-कसैला स्वाद और ठंडी तासीर वाली होती है, जो डायबिटीज़ के मरीजों के लिए वरदान है। यह लार का संतुलन बनाए रखती है और ताजगी देती है। आम की दातून दांतों में चमक लाती है, मसूड़ों से खून रोकती है और मुंह को सुगंधित रखती है। करंज की दातून कड़वा-तीखा स्वाद और गर्म तासीर वाली होती है, जो बैक्टीरिया साफ करती है, पुरानी बीमारियों को खत्म करती है और मसूड़ों के घावों में आराम देती है।
देश के गांवों व वनवासी क्षेत्र में भले ही आज भी टूथपेस्ट और टूथब्रश से अनजान हैं। वे दातून करते हैं और एक खास तरीका अपनाते हैं — दातून घुमाने के बाद एक-दो बार थूकते हैं, फिर दांतों पर दातून की घिसाई करते हुए लार को निगलते जाते हैं। यही है असली विज्ञान! लार में ही नाइट्रिक ऑक्साइड बनाने वाले बैक्टीरिया मौजूद होते हैं। जब हम लार को निगलते हैं, तो ये बैक्टीरिया हमारे शरीर में पहुंचकर अपना काम करते हैं। यह भारत का ठेठ देसी ज्ञान है, जो विज्ञान से परे नहीं, बल्कि विज्ञान के साथ है। यह समझना जरूरी है कि हमारे पुरखों ने यह तरीका बिना किसी प्रयोगशाला के, सिर्फ अनुभव और प्रकृति के निरीक्षण से विकसित किया था।
आयुर्वेद के अनुसार दातून करने का सही तरीका भी बताया गया है। ताज़ी, पतली टहनी लें जो अंगुली जितनी मोटी और नौ इंच लंबी हो। एक सिरे को चबाकर ब्रश जैसा बनाएं। हल्के हाथों से दांत और मसूड़ों पर घिसें। जीभ पर हल्का मसाज करें। फिर गुनगुने पानी से कुल्ला करें। ध्यान रहे कि सूखी या मोटी टहनी का इस्तेमाल न करें, ज़्यादा रगड़ना नुकसानदेह है और हर दिन नई दातून का इस्तेमाल करें। यह प्रक्रिया न सिर्फ दांतों की सफाई करती है, बल्कि मुंह के पूरे वातावरण को स्वस्थ बनाए रखती है।
आज जब हम डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन की महामारी से जूझ रहे हैं, तो यह समय है अपनी जड़ों की ओर लौटने का। यह समय है उस ज्ञान को फिर से अपनाने का, जिसे हमारे पुरखों ने सदियों के अनुभव से अर्जित किया था। टूथपेस्ट और माउथवॉश ने हमें सिर्फ चमकते दांत नहीं दिए, बल्कि बीमारियों का एक पूरा पिटारा भी थमा दिया है। दातून सिर्फ दांतों की सफाई का साधन नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार है। यह जीवनशैली का आयुर्वेदिक कवच है, जो न सिर्फ दांतों को, बल्कि पूरे शरीर को रोगमुक्त रखता है। रोज़ाना दातून का मतलब है केमिकल-मुक्त, रोग-मुक्त जीवन।
गांवों में आज भी लोग स्वस्थ हैं क्योंकि वे अपनी परंपराओं से जुड़े हैं। शहरों में हम बीमार हैं क्योंकि हमने अपनी परंपराओं को 'पिछड़ापन' मान लिया। लेकिन अब समय आ गया है इस सोच को बदलने का। हमें समझना होगा कि आधुनिकता का मतलब अपनी जड़ों से कटना नहीं है। असली प्रगति तो तब है जब हम अपनी परंपरा के ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ें। दातून उसी का प्रतीक है एक ऐसी परंपरा जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है और आज भी प्रासंगिक है।
तो आइए, वापसी करें। थोड़ा भटकें, लेकिन सही दिशा में दातून की तरफ। यह कोई पीछे जाना नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य की ओर आगे बढ़ना है। और हां, इस जानकारी को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाएं। क्योंकि स्वास्थ्य सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी है। जब एक व्यक्ति स्वस्थ रहता है, तो पूरा समाज स्वस्थ होता है। दातून की ओर लौटना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन होना चाहिए। प्राकृतिक रहो, आयुर्वेद अपनाओ, स्वस्थ जीवन पाओ!
डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर
पारिस्थितिक, साहसिक, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक पर्यटन
संवर्धन केंद्र

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