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एकात्म मानव दर्शन से वैश्विक संवाद एक नई सभ्यतागत भूमिका – डॉ.अमरीक सिंह ठाकुर

 

भाजपा–चीन संवाद और वामपंथ की वैचारिक घबराहट, पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन, सनातन मूल्यों पर आधारित भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक यात्रा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका, तथा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी – भारतीय जनता पार्टी – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संवाद के व्यापक एशियाई निहितार्थ, हाल के दिनों में जब भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधियों का औपचारिक आगमन हुआ, तो इस घटनाक्रम ने भारत के वामपंथी खेमे में असाधारण बेचैनी पैदा कर दी। प्रश्न यह नहीं था कि कोई विदेशी राजनीतिक दल भारत क्यों आया, बल्कि असली सवाल यह था कि “चीन अब भाजपा से संवाद क्यों कर रहा है?” यही प्रश्न भारतीय वामपंथ की वैचारिक नींव को झकझोर देने वाला सिद्ध हुआ। वास्तव में दशकों तक चीन पर एक प्रकार का नैतिक और वैचारिक एकाधिकार भारतीय वामपंथ के पास रहा। चीन उनके लिए केवल एक देश नहीं, बल्कि एक वैचारिक आदर्श, संदर्भ-बिंदु और तथाकथित “क्रांतिकारी सपना” था। किंतु जब वही चीन भारत में वामपंथ को दरकिनार कर सीधे भाजपा से संवाद करने लगा, तो यह उनके लिए मात्र राजनीतिक घटना नहीं रही, बल्कि गहरी वैचारिक असहजता और अपमान का कारण बन गई। 

भारतीय जनता पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच हुआ संवाद किसी वैचारिक गठजोड़ या समर्थन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह अंतर-पार्टी और राजनयिक संवाद की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, जैसा विश्व के अनेक लोकतंत्रों में होता है। न इसमें वैचारिक सहमति है, न आत्मसमर्पण और न ही गठबंधन। इसके बावजूद वामपंथ इस अंतर को जानबूझकर धुंधला करने का प्रयास करता है, क्योंकि उसकी राजनीति लंबे समय तक इस भ्रम पर आधारित रही है कि चीन से निकटता ही नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाण है। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी की नीति स्पष्ट रही है—संवाद होगा, लेकिन केवल राष्ट्रहित की शर्त पर। तिब्बत का प्रश्न वामपंथ की नैतिकता की वास्तविक परीक्षा थी । आज वामपंथ भाजपा पर यह आरोप लगाता है कि उसने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया, जबकि यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों के विरुद्ध है। 1954 में पंचशील समझौते के अंतर्गत पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने तिब्बत को औपचारिक रूप से चीन का अंग स्वीकार किया था। उस समय न भाजपा सत्ता में थी और न ही वामपंथ ने उस निर्णय का विरोध किया; बल्कि उसने उसका नैतिक समर्थन ही किया। 

1959 में जब तिब्बत में चीनी सेना द्वारा दमन और नरसंहार हुआ और दलाई लामा भारत आए, तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे “चीन का आंतरिक मामला” कहकर खारिज कर दिया। यही वह क्षण था, जहाँ वामपंथ की कथित मानवता और अंतरराष्ट्रीय नैतिकता की परतें खुलकर सामने आ गईं। 1962 के भारत–चीन युद्ध के दौरान भी वामपंथ की वैचारिक स्थिति स्पष्ट रूप से उजागर हुई। जब पूरा देश आक्रोश, पीड़ा और राष्ट्रीय संकट के दौर से गुजर रहा था, तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेता चीन के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कर रहे थे। इतिहास साक्षी है कि कुछ वामपंथी नेताओं को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वे भारत के भीतर शत्रु का नैरेटिव फैलाने में संलिप्त पाए गए। यह केवल वैचारिक मतभेद का प्रश्न नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय निष्ठा का गंभीर संकट था। इसके विपरीत, भाजपा की विदेश नीति कभी एकांगी नहीं रही। मोदी सरकार के कार्यकाल में डोकलाम में चीन को रोका गया, गलवान में दृढ़ और स्पष्ट संदेश दिया गया तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य और कूटनीतिक दबाव बनाए रखा गया। भाजपा की नीति यही रही है कि चीन से बातचीत भी की जाए और आवश्यकता पड़ने पर सीमाओं पर ठोस जवाब भी दिया जाए। 

यही संतुलन वामपंथ को सबसे अधिक असहज करता है। वास्तव में वामपंथ की बेचैनी का कारण यह नहीं है कि भाजपा कार्यालय में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि क्यों आए। उसकी वास्तविक चिंता यह है कि चीन अब उसका “वैचारिक भाई” नहीं रहा, भारत में चीन से संवाद करने का उसका कथित विशेषाधिकार समाप्त कर दिया है। वामपंथ जहाँ चीन से भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव चाहता है, वहीं भाजपा राष्ट्रीय हित के ठोस आधार पर संवाद करती है। जो लोग मातृभूमि की अवधारणा को नकारते रहे, तिब्बत पर मौन साधे रहे और 1962 में चीन के साथ खड़े दिखाई दिए, उन्हें आज भाजपा पर राष्ट्रहित से समझौते का आरोप लगाने का नैतिक अधिकार नहीं है। भाजपा– चीन की कम्युनिस्ट पार्टी संवाद दरअसल वामपंथ की वैचारिक गुलामी के अंत और भारत की आत्मविश्वासी, संतुलित और परिपक्व कूटनीति की शुरुआत का संकेत है। यही कारण है कि इस औपचारिक संवाद ने भारतीय वामपंथ की नींद उड़ा दी है और उसकी बेचैनी खुलकर सामने आ गई है। 

पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन, सनातन मूल्यों पर आधारित भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक यात्रा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका, तथा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी – भारतीय जनता पार्टी – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संवाद के व्यापक एशियाई निहितार्थ, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उभरती बहुध्रुवीय एशिया की नई वैचारिक धुरी, इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक केवल सत्ता-संतुलन के बदलावों का काल नहीं है, बल्कि यह विचारधाराओं की पुनर्समीक्षा, सभ्यतागत स्मृति की वापसी और वैकल्पिक विकास मॉडलों की खोज का समय भी है। ऐसे समय में भारत की राजनीतिक यात्रा विशेषकर भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक संरचना केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि वह एक सभ्यतागत विमर्श का रूप ले लेती है। इस विमर्श की जड़ें पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन में निहित हैं, जो व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के बीच संतुलन की बात करता है।  

एकात्म मानव दर्शन पश्चिमी द्वंद्वों से परे भारतीय विकल्प, पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन न तो पूँजीवादी भोगवाद का अनुकरण है और न ही राज्य-केंद्रित समाजवाद का प्रतिरूप। यह दर्शन मानव को केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सत्ता के रूप में देखता है। भारतीय जनता पार्टी ने इस विचार को केवल वैचारिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नीति-निर्माण, शासन और सामाजिक हस्तक्षेप के स्तर पर इसे लागू करने का प्रयास किया। अंत्योदय, आत्मनिर्भर भारत, ग्रामोदय, सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास ये सभी नारे नहीं, बल्कि एकात्म मानव दर्शन की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ हैं। यहाँ विकास का अर्थ केवल GDP वृद्धि नहीं, बल्कि मानव गरिमा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता है। सनातन मूल्यों पर आधारित राजनीतिक चेतना, भाजपा को एक विशिष्ट राजनीतिक दल बनाता है उसका सनातन मूल्यों से संवाद। सनातन का अर्थ जड़ता नहीं, बल्कि वह सतत प्रवाह है जो समय के साथ स्वयं को पुनर्परिभाषित करता है। 

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भारतीय जीवन-दर्शन के ये चार स्तंभ राजनीतिक निर्णयों में भी संतुलन की माँग करते हैं। यह संतुलन आज भारत की नीतियों में दिखाई देता है—चाहे वह पर्यावरण-संवेदनशील विकास हो, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, या फिर तकनीक और परंपरा का सहअस्तित्व। इसी संदर्भ में तीर्थ, मंदिर, सांस्कृतिक गलियारों और विरासत स्थलों के पुनरुद्धार को केवल “आस्था की राजनीति” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता; यह सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था, स्थानीय रोजगार और सभ्यतागत निरंतरता का प्रश्न भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक संगठन से सभ्यतागत संरक्षक तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केवल एक संगठन के रूप में देखना उसके कार्य-विस्तार को सीमित करके आंकना होगा। संघ की भूमिका सामाजिक पूंजी निर्माण, चरित्र-निर्माण और राष्ट्रबोध के विकास में रही है। शिक्षा, सेवा, आपदा-प्रबंधन, जनजातीय क्षेत्रों में कार्य, पर्यावरण संरक्षण—ये सभी क्षेत्र संघ के सामाजिक हस्तक्षेप की व्यापकता को दर्शाते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि संघ सत्ता-केन्द्रित संस्था नहीं है। वह दीर्घकालिक सामाजिक चेतना पर कार्य करता है। यही कारण है कि भारत की राजनीतिक स्थिरता, नेतृत्व-निर्माण और संस्थागत निरंतरता में संघ की वैचारिक छाया स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। 

एशिया का बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य, वैश्विक व्यवस्था आज स्पष्ट रूप से बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है। पश्चिमी प्रभुत्व के एकछत्र दौर के बाद एशिया—विशेषकर भारत और चीन—विश्व राजनीति के केंद्र में आ रहे हैं। ऐसे में हालिया चीन की कम्युनिस्ट पार्टी – भारतीय जनता पार्टी – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संवाद को केवल एक कूटनीतिक घटना के रूप में देखना अपर्याप्त होगा। जब विश्व के दो सबसे बड़े संगठित राजनीतिक ढाँचे—चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय जनता पार्टी—औपचारिक संवाद करते हैं, और उस संवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक-वैचारिक संगठन की उपस्थिति होती है, तो यह संकेत देता है कि राज्य से परे समाज और विचारधारा भी अब अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। प्रतीक, संकेत और रणनीति, इस प्रकार की मुलाक़ातें केवल प्रोटोकॉल नहीं होतीं। वे राजनीतिक संस्कृति, नेतृत्व-निर्माण की प्रक्रियाओं और दीर्घकालिक सोच को समझने का प्रयास होती हैं। चीन यह भली-भाँति समझता है कि भारत की राजनीतिक निरंतरता केवल सरकारों से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक-वैचारिक ढाँचे से संचालित होती है। यह संवाद यह भी दर्शाता है कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद संवाद और अध्ययन की राजनीति संभव है। 

भारत ने अपनी संप्रभुता, सीमाओं और राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता किए बिना यह स्पष्ट किया है कि वह टकराव नहीं, बल्कि संतुलन और संवाद के पक्ष में है। विचारधाराओं का संकट और पुनर्समीक्षा, वैश्विक स्तर पर कई पारंपरिक राजनीतिक विचारधाराएँ आज अस्तित्वगत संकट से गुजर रही हैं। औद्योगिक युग के लिए विकसित किए गए मॉडल डिजिटल, सांस्कृतिक और बहुध्रुवीय विश्व की जटिलताओं को समझने में अक्षम होते जा रहे हैं। ऐसे में भारत का सभ्यतागत-आधारित राजनीतिक मॉडल जो न तो पूर्णतः पश्चिमी है, न ही आयातित—अंतरराष्ट्रीय विमर्श में ध्यान आकर्षित कर रहा है। यह आकर्षण किसी पराजय या विजय का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि विकास, संस्कृति और मानवता के बीच संतुलन की खोज वैश्विक आवश्यकता बन चुकी है। भारत–चीन–एशिया, प्रतिस्पर्धा के साथ सहअस्तित्व, भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा एक वास्तविकता है भू-राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा शून्य-योग खेल नहीं है। एशिया का भविष्य टकराव से नहीं, बल्कि संयमित प्रतिस्पर्धा और सीमित सहयोग से सुरक्षित हो सकता है। 

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता—जो किसी एक ध्रुव के साथ पूर्ण संरेखण से इंकार करती है आज उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यही कारण है कि भारत वैश्विक मंचों पर संवाद करता है, लेकिन अपनी शर्तों पर। एक नई वैचारिक यात्रा की शुरुआत, भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक यात्रा, पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन से प्रेरित होकर, आज केवल राष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रही। वह एशियाई और वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सामाजिक-सांस्कृतिक ढाँचा इस यात्रा को गहराई और निरंतरता प्रदान करता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी – भारतीय जनता पार्टी – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संवाद संवाद को यदि इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि विचारों, मॉडलों और सभ्यताओं के बीच संवाद का संकेत है। यह संवाद किसी एक विचारधारा की विजय या पराजय का उद्घोष नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि आने वाली दुनिया में वही मॉडल टिकाऊ होंगे जो मानव-केंद्रित, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी और संवाद-क्षम होंगे। इक्कीसवीं सदी का भारत स्वयं को न तो किसी के विरुद्ध परिभाषित कर रहा है, न ही किसी के अनुकरण से। वह अपनी जड़ों से जुड़कर, आधुनिकता से संवाद करते हुए, एक नई सभ्यतागत भूमिका की ओर अग्रसर है—और यही इस युग का सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत है।

डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर

निदेशक 

तिब्बती अध्ययन केंद्र



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