भारत: बदलते भू-राजनीतिक समीकरण–डॉ.अमरीक सिंह ठाकुर
आज की वैश्विक राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ पुराने शक्ति संतुलन (Balance of Power) टूट रहे हैं और नए समीकरण बन रहे हैं। अक्सर मीडिया और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भारत-अमेरिका व्यापार विवाद, डोनाल्ड ट्रंप की 50% टैरिफ नीति, या हालिया शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की तियानजिन बैठक को आज की भू-राजनीतिक बेचैनी की शुरुआत बताते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि यह प्रक्रिया कहीं पहले—2024 के कज़ान (रूस) SCO शिखर सम्मेलन और डोनाल्ड ट्रंप की 50% टैरिफ नीति से भी पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नूर-खा बेस पर हमले* से प्रारंभ हो चुकी थी। उन घटनाओं ने स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि आने वाले वर्षों में एशियाई शक्तियाँ—भारत, रूस और चीन—एक नए त्रिकोणीय समीकरण की ओर बढ़ेंगी, और पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने में निर्णायक भूमिका निभाएँगी। औपनिवेशिक विरासत और पश्चिम पर अविश्वास, भारतीय मानस में अमेरिका और यूरोप पर जो गहरा अविश्वास है, उसकी जड़ें औपनिवेशिक इतिहास में हैं। 1757 के प्लासी युद्ध से लेकर 1947 तक भारत पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने गहरे जख्म दिए। अनुमानित तौर पर 20 करोड़ लोग अकाल और कुपोषण से मरे, जबकि लगभग 45–50 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की संपदा भारत से लूटी गई। इस संपत्ति ने इंग्लैंड और यूरोप को औद्योगिक समृद्धि दी, जबकि भारत निर्धनता और पिछड़ेपन में धकेल दिया गया। स्वतंत्रता के बाद भी यह स्मृति मिट नहीं पाई। यही कारण है कि भारत में आम जनता से लेकर नेतृत्व तक एक व्यापक धारणा है कि पश्चिमी शक्तियाँ दुनिया को हथियारों और व्यापारिक दबाव से नियंत्रित करती हैं, युद्धों को भड़काकर डॉलर कमाती हैं, और मानवता को भ्रमित करती हैं। इस ऐतिहासिक स्मृति का राजनीतिक अनुवाद आज भी भारत की विदेश नीति में देखने को मिलता है—“भारत किसी पर निर्भर नहीं, भारत आत्मनिर्भर है।”
भारत की प्रगति और आत्मविश्वास का उभार, 1947 से लेकर 1990 के दशक तक भारत आर्थिक संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता से जूझता रहा। लेकिन 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने तेज़ी से प्रगति की। आज 2025 में भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अनुमान है कि 2038 तक यह दुनिया की सबसे शक्तिशाली आर्थिक और सामरिक शक्ति बन सकता है। भारत का यह आत्मविश्वास न केवल आर्थिक है, बल्कि भू-राजनीतिक भी है। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा, तकनीकी नवाचार, अंतरिक्ष अनुसंधान और डिजिटल कूटनीति में भारत की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है। यही कारण है कि अमेरिका और यूरोप की हठधर्मिता या दबाव भारत को अब स्वीकार्य नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत स्पष्ट संदेश दे चुका है—“भारत अब दूसरों की शर्तों पर नहीं, अपनी शर्तों पर दुनिया से संवाद करेगा।”
SCO और त्रिकोणीय गठजोड़:
भारत-रूस-चीन, 31 अगस्त 2025 को तियानजिन (चीन) में हुई SCO बैठक केवल एक क्षेत्रीय सम्मेलन नहीं थी। यह वैश्विक शक्ति संतुलन में एक नए मोड़ का प्रतीक थी। प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की साझा तस्वीर ने यह संकेत दिया कि 21वीं सदी का भू-राजनीतिक भविष्य एशिया में तय होगा। SCO की ताकत केवल उसके सदस्य देशों की संख्या में नहीं, बल्कि उनके संसाधनों और भू-रणनीतिक स्थिति में है। भारत की जनसंख्या और तकनीकी शक्ति, रूस की ऊर्जा और सैन्य ताकत, और चीन की आर्थिक क्षमता—तीनों मिलकर ऐसी त्रिवेणी बनाते हैं जो अमेरिका-यूरोप केंद्रित व्यवस्था को चुनौती दे सकती है। ट्रंप प्रशासन के लिए यह सबसे बड़ी असहजता है। पहले ही वह BRICS के प्रति आलोचनात्मक रुख दिखा चुके हैं, और अब SCO को लेकर भी उनकी बेचैनी स्पष्ट है।
अमेरिका की बेचैनी:
टैरिफ और रणनीतिक दबाव, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 50% आयात शुल्क नीति केवल आर्थिक उपाय नहीं है; यह भारत को नियंत्रित करने की कोशिश है। परंतु यह रणनीति उलटी पड़ रही है। भारत अब व्यापारिक विकल्पों को विविध बना रहा है—रूस से ऊर्जा, मध्य एशिया से गैस पाइपलाइन, अफ्रीका में निवेश, और यूरोप के साथ संतुलित संबंध। ट्रंप की असली चिंता यह है कि भारत-रूस-चीन की मित्रता अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक कॉम्प्लेक्स के लिए खतरा है। अमेरिका लंबे समय से एशिया को "बाजार" और "सुरक्षा उपभोक्ता" की तरह देखता आया है। लेकिन जब एशियाई देश अपने सुरक्षा और आर्थिक विकल्प स्वयं गढ़ने लगते हैं, तब अमेरिकी प्रभुत्व कमजोर होता है। यही आज की भू-राजनीति का मूल तनाव है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, भारत की विदेश नीति हमेशा "रणनीतिक स्वायत्तता" पर आधारित रही है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर आज तक भारत ने यह सुनिश्चित किया कि वह किसी सैन्य गुट का हिस्सा न बने। SCO में भारत की सक्रियता इसी नीति की आधुनिक अभिव्यक्ति है। भारत रूस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, चीन के साथ आर्थिक संतुलन साध रहा है, और साथ ही अमेरिका के साथ तकनीकी साझेदारी भी कर रहा है। यह "बहु-विकल्पीय कूटनीति" ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। ऑपरेशन सिंदूर और सुरक्षा परिप्रेक्ष्य, 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नूर-खा बेस पर हुए हमले ने यह स्पष्ट कर दिया था कि एशिया का सुरक्षा परिदृश्य बदल रहा है। यह घटना न केवल सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, बल्कि इसने भारत, रूस के सुरक्षा सहयोग को भी मजबूत किया। अमेरिकी खेमे में असहजता की एक बड़ी वजह यही है कि SCO अब केवल आर्थिक या सांस्कृतिक मंच नहीं रहा, बल्कि एक सुरक्षा सहयोग मंच के रूप में उभर रहा है।
2047 का परिदृश्य:
भारत की भूमिका, भारत की जनसंख्या, तकनीकी क्षमता और आर्थिक विकास दर को देखते हुए यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि 2047 तक भारत वैश्विक शक्ति-संतुलन की धुरी होगा। ट्रंप और पश्चिमी नेतृत्व की चिंता यही है कि "भारतीय सदी" की शुरुआत हो चुकी है। भारत न केवल एशिया में, बल्कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी साझेदारी बढ़ा रहा है। यही वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को मजबूत करेगा और अमेरिका-यूरोप की पुरानी वर्चस्ववादी राजनीति को चुनौती देगा।
डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर
निदेशक - तिब्बती अध्ययन केंद्र
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय।

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