फतेहपुर के अर्गल राज्य में गौतम राजपूतों का उदय, सूर्यवंश और शाक्य परंपरा से संबंध : आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
गौतम राजपूतों की उत्पत्ति का संबंध भगवान राम के वंशज कुश से प्रारंभ हुई सूर्यवंशी शाखा से जोड़ा जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार यह वंश आगे चलकर कपिलवस्तु के प्राचीन शाक्य कुल से संबद्ध हुआ, जिसमें Gautama Buddha का जन्म हुआ।
“गौतम” गोत्र का पालन करने के कारण गौतम क्षत्रिय स्वयं को महर्षि गौतम या शाक्य वंशीय परंपरा से संबंधित मानते हैं। वंश भास्कर के अनुसार, भगवान राम के वंशजों में से एक ने नेपाल क्षेत्र में राज्य स्थापित किया, जहां से शाक्य वंश का विस्तार हुआ। महाराणा शाक्य सिंह के नाम से यह वंश “शाक्य” कहलाया और इसकी राजधानी कपिलवस्तु रही।
इसी वंश में आगे चलकर शुद्धोधन हुए, जिनके पुत्र सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के रूप में विख्यात हुए। गौतम बुद्ध के वंशजों को ही परंपरानुसार “गौतम राजपूत” कहा गया। इस वंश में राव, रावत, राणा और राजा जैसी उपाधियाँ प्रचलित रहीं।
अश्वघोष के मतानुसार गौतम गोत्र की उत्पत्ति
बौद्ध साहित्य के विद्वान अश्वघोष के अनुसार, कपिल नामक तपस्वी मुनि के आश्रम में इक्ष्वाकु वंशी राजकुमार शिक्षा हेतु गए। अपने गुरु के गोत्र को धारण करने के कारण वे “गौतम गोत्री” कहलाए। इस प्रकार गौतम नाम का संबंध गुरु परंपरा से भी जोड़ा जाता है।
फतेहपुर के अर्गल राज्य में गौतम राजपूतों का उदय
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद में स्थित अर्गल क्षेत्र गौतम राजपूतों का प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र रहा है। यह प्राचीन रियासत अपनी शक्ति, समृद्धि और सांस्कृतिक चेतना के लिए जानी जाती थी। प्रारंभ में इसे अयोध्या के सूर्यवंश से संबंधित माना गया, बाद में इसे शाक्य वंश से भी जोड़ा गया।
अर्गल राज्य की स्थापना शाक्य क्षत्रियों के एक दल द्वारा की गई, जिन्होंने कोशल नरेश के आक्रमण के बाद नए राज्य की स्थापना की।
अर्गल के प्रमुख शासक और धरोहर
राजा अंगददेव ने रिंद नदी के किनारे “अर्गल” नामक बस्ती बसाकर इसे राजधानी बनाया। उनकी पुत्री अंगारमती का विवाह राजा कर्णदेव से हुआ था। उन्होंने अर्गल से तीन मील दक्षिण “सीकरी कोट” नामक किला बनवाया, जिसके ध्वंसावशेष आज भी विद्यमान हैं।
वंशावली इस प्रकार वर्णित है—
राजा अंगददेव
बलिभद्रदेव
श्रीमानदेव
ध्वजमान देव
शिवमान देव
राजा शिवमान देव ने रिंद नदी तट पर अर्गलेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया, जहाँ आज भी शिवव्रत का मेला लगता है।
चंद्रावर का युद्ध और अर्गल की भूमिका
1194 ई. में चंद्रावर (इटावा) के मैदान में कन्नौज नरेश जयचंद और कुतुबुद्दीन ऐबक के मध्य युद्ध हुआ। उस समय अर्गल नरेश रत्नसेन के भाई वीरसेन ने जयचंद की ओर से युद्ध में भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए।
ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार जयचंद ने अपने खजाने को अर्गल नरेश के पास सुरक्षित रखा था। 13वीं शताब्दी में भरों द्वारा अर्गल के कुछ भागों पर अधिकार किया गया, किंतु बाद में पुनः शक्ति संगठित की गई।
बैसवारा और अर्गल का संबंध
1320 के आसपास अर्गल के राजा नचिकेत सिंह तथा बैस ठाकुर अभय सिंह का उल्लेख मिलता है। अभय सिंह ने अर्गल की सहायता की और उन्हें डौडिया खेड़ा सहित रायबरेली व फतेहपुर के क्षेत्र प्रदान किए गए। इस प्रकार बैसवारा क्षेत्र का विस्तार हुआ।
चौसा युद्ध और मुगल काल
चौसा के युद्ध में स्थानीय गौतम शासकों की भूमिका का उल्लेख मिलता है। बाद में मुगल शासनकाल में अर्गल पर आक्रमण हुआ और राज्य को अधीन कर लिया गया।
1556 ई. में Akbar के शासनकाल में कालपी के सूबेदार ने अर्गल नरेश को पराजित कर इस रियासत को मुगलों के अधीन कर लिया।
15वीं–16वीं शताब्दी में राजा मर्दन सिंह और त्रिलोक चंद के समय अर्गल राज्य शक्तिशाली रहा। यमुना तट पर निर्मित विशाल किला आज भी इतिहास का साक्षी है, यद्यपि अब वह खंडहर रूप में है।
वर्तमान में गौतम राजपूतों का विस्तार
आज गौतम राजपूत उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, फतेहपुर, बदायूं, कानपुर, बलिया, आजमगढ़, प्रतापगढ़, बहराइच आदि जिलों सहित बिहार और मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी निवास करते हैं।
अर्गल का किला और मंदिर आज भी इस गौरवशाली परंपरा की स्मृति को जीवित रखते हैं।
गौतम राजपूतों का इतिहास सूर्यवंशी परंपरा, शाक्य वंश और अर्गल राज्य की ऐतिहासिक गाथाओं से जुड़ा हुआ है। यह वंश त्याग, वीरता और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए प्रसिद्ध रहा। अर्गल राज्य उत्तर भारत के मध्यकालीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में स्मरण किया जाता है।
लेखक परिचय
आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
(भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त। वर्तमान में बस्ती, उत्तर प्रदेश में निवास करते हुए साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति एवं अध्यात्म विषयों पर लेखन एवं चिंतनरत।)
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