बड़ा प्रश्न - क्या संघ का राष्ट्रवाद दिशा बदल रहा है?
राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में खड़े किसी भी संगठन पर जब प्रश्न उठते हैं तो वे केवल व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस विचारधारा की दिशा पर उठते हैं, जिसने पीढ़ियों को प्रभावित किया है। मोहन भागवत जब यह कहते हैं कि “राजनेता चुनाव जीतने के लिए एजेंडे चलाते हैं, समाज बदलेगा तो राजनीति बदलेगी”, तो यह कथन भारतीय लोकतंत्र की गहरी परतों को छूता है। एक पक्ष इसे राजनीतिक यथार्थ की स्वीकारोक्ति मानता है—कि सत्ता का चरित्र चुनावी गणित से संचालित होता है और दीर्घकालिक परिवर्तन समाज की चेतना से आता है। दूसरा पक्ष पूछता है—क्या नेतृत्व का दायित्व केवल समाज की प्रतीक्षा करना है, या उसे दिशा देना भी है? इतिहास बताता है कि समाज और नेतृत्व का संबंध एकतरफा नहीं होता; दोनों एक-दूसरे को आकार देते हैं। “जैसा राजा वैसी प्रजा” जितना सत्य है, उतना ही यह भी कि “जैसी प्रजा वैसा राजा”।
संघ की स्थापना ही इसलिए हुई थी कि बिखरे हुए हिंदू समाज को संगठित कर एक सांस्कृतिक आत्मविश्वास दिया जा सके। शाखाएँ, प्रशिक्षण, अनुशासन और सेवा—इन सबने दशकों तक एक ऐसी कार्यशैली गढ़ी, जिसमें नेतृत्व अग्रिम पंक्ति में दिखता था। आज यदि यह कहा जाए कि समाज बदलेगा तो राजनीति बदलेगी, तो कुछ स्वयंसेवक यह अनुभव कर सकते हैं कि संगठन अपनी पारंपरिक भूमिका से पीछे हट रहा है। पर समर्थक यह तर्क देंगे कि संघ ने सदैव स्वयं को प्रत्यक्ष राजनीति से ऊपर रखा है और समाज-निर्माण को ही प्राथमिकता दी है। प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में यह दूरी स्पष्ट है, या राजनीतिक समीकरणों के बीच संगठन की वैचारिक रेखा धुंधली पड़ रही है?
हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजने की प्रवृत्ति को रोकने की बात को दो दृष्टियों से देखा जा सकता है। एक ओर यह तर्क है कि इतिहास की पीड़ा को नकार कर कोई भी राष्ट्र आत्मसम्मान नहीं बचा सकता। आक्रमणों की स्मृति केवल अतीत नहीं, पहचान का हिस्सा भी है। दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि निरंतर संघर्ष की मानसिकता समाज को स्थिरता से वंचित करती है। यदि राष्ट्रवाद का उद्देश्य केवल अतीत की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि भविष्य की संरचना है, तो क्या संयम और संतुलन भी उसकी रणनीति का अंग नहीं होना चाहिए? क्या यह संभव नहीं कि इतिहास की स्मृति को सम्मान देते हुए वर्तमान में सामाजिक समरसता का मार्ग खोजा जाए?
यूजीसी कानून को मानने की बात हो या आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों पर बदलते वक्तव्य—इनसे भ्रम उत्पन्न होना स्वाभाविक है। आलोचक कहेंगे कि वैचारिक स्पष्टता के बिना संगठन की विश्वसनीयता कमज़ोर पड़ती है। समर्थक कहेंगे कि राष्ट्रहित में समयानुकूल लचीलापन आवश्यक है। कोई भी विचार यदि स्थिर और जड़ हो जाए तो वह परिस्थितियों से कट जाता है; पर यदि वह अत्यधिक लचीला हो जाए तो अपनी पहचान खो देता है। नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है—सिद्धांत और व्यावहारिकता के बीच संतुलन साधना।
“संघ में आना है तो बर्बाद होने को तैयार हो जाओ”—यह वाक्य संघ की त्यागमयी परंपरा का प्रतीक है। स्वयंसेवकों ने निजी स्वार्थ त्याग कर समाजकार्य किया है। किंतु आज का युवा अवसरों, प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आकांक्षाओं की दुनिया में जी रहा है। क्या राष्ट्रवाद केवल त्याग का संदेश देगा, या उसे उपलब्धि, आत्मगौरव और नेतृत्व के अवसर से भी जोड़ेगा? यदि संगठन आधुनिक पीढ़ी को आकर्षित करना चाहता है तो त्याग को प्रेरणा में, और अनुशासन को नेतृत्व में रूपांतरित करना होगा। त्याग तब तक सार्थक है जब तक वह उद्देश्य की स्पष्टता से जुड़ा हो।
“क्या हमने हिंदुओं का ठेका ले रखा है?”—यह कथन एक व्यापक दृष्टि की ओर संकेत करता है। यदि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति सांस्कृतिक रूप से इस भूमि से जुड़ा है, तो यह समावेशी दृष्टिकोण है। परंतु पहचान की राजनीति के युग में शब्दों की स्पष्ट परिभाषा अनिवार्य है। यदि “हिंदू” सांस्कृतिक अवधारणा है तो उसकी सीमाएँ और दायरा स्पष्ट होना चाहिए। यदि वह धार्मिक पहचान से परे एक सभ्यतागत विचार है तो संवाद की भाषा भी वैसी ही होनी चाहिए। अस्पष्टता से भ्रम पैदा होता है, और भ्रम से अविश्वास।
जनसंख्या संतुलन, तीन बच्चों का संदेश, आरक्षण की समीक्षा, कानून और जनमत—इन सभी विषयों पर संघ प्रमुख के वक्तव्यों को अलग-अलग खाँचों में नहीं देखा जा सकता। वे व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा हैं। आलोचक आशंका व्यक्त करते हैं कि वोट बैंक की राजनीति राष्ट्रवाद की धार को कुंद कर रही है। समर्थक कहते हैं कि दीर्घकालीन सामाजिक स्थिरता के लिए संगठन को सामंजस्यपूर्ण भाषा अपनानी ही होगी। संभव है कि नेतृत्व तत्कालिक आक्रोश से ऊपर उठकर दीर्घकालिक रणनीति सोच रहा हो; संभव यह भी है कि कार्यकर्ताओं को उस रणनीति की स्पष्ट जानकारी न होने से असमंजस हो रहा हो।
राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक उभार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक धैर्य और संगठनात्मक अनुशासन का परिणाम है। संघ का इतिहास इस बात का साक्षी है कि उसने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने विचार को जीवित रखा। इसलिए किसी भी वर्तमान वक्तव्य को उस दीर्घ परंपरा के संदर्भ में देखना चाहिए। साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि विचार की जीवंतता प्रश्नों से ही सिद्ध होती है। यदि स्वयंसेवक या समर्थक प्रश्न उठाते हैं, तो वह विरोध नहीं, बल्कि आत्ममंथन का आग्रह है।
समाज और संगठन के बीच संबंध पूरक है। समाज बिना दिशा के बिखर सकता है, और संगठन बिना समाज के निर्जीव हो सकता है। नेतृत्व का दायित्व है कि वह सिद्धांतों की स्पष्टता बनाए रखे, संवाद की भाषा को संतुलित रखे और कार्यकर्ताओं के मन में विश्वास उत्पन्न करे। समाज का दायित्व है कि वह भावनाओं के बजाय विवेक से विचार करे और दीर्घकालिक लक्ष्य को समझे।
अंततः यह विमर्श किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि उस विचार के भविष्य का है जिसे राष्ट्रवाद कहा जाता है। यदि राष्ट्रवाद केवल नारों में सीमित हो जाए तो वह क्षणिक हो जाता है; यदि वह आत्मचिंतन, समन्वय और संकल्प का संगम बने तो वह स्थायी शक्ति बनता है। आज आवश्यकता है कि नेतृत्व और समाज दोनों पारदर्शी संवाद करें, भ्रम को स्पष्टता में बदलें और सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच संतुलन स्थापित करें।
राष्ट्र की चेतना निरंतर प्रवाहमान है। उसमें कभी आक्रोश की लहर उठती है, कभी समन्वय की धारा बहती है। यदि संगठन उस प्रवाह को समझते हुए अपनी दिशा तय करता है, तो प्रश्न भी शक्ति बन जाते हैं और समर्थन भी। राष्ट्रवाद की परिपक्वता इसी में है कि वह आलोचना से घबराए नहीं और समर्थन से अंधा न हो। जब प्रश्न और उत्तर दोनों ईमानदारी से सामने आएँगे, तभी विचार की धारा और अधिक सशक्त होगी।

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