शिवपुरी का छुपा सट्टा-जुआ नेटवर्क - एक चौंकाने वाला सच
शिवपुरी। शहर के बीचों-बीच बसे मटका पार्क, गांधी पार्क, पुरानी अनाज मंडी और पुराने रेलवे स्टेशन का इलाका इन दिनों एक ऐसे सच को उजागर कर रहा है, जो सबकी आँखों के सामने होते हुए भी जैसे नजरों से ओझल बना हुआ है। यह वही क्षेत्र है जहाँ एक ओर विवेकानंद कॉलोनी और गांधी कॉलोनी जैसी पॉश बस्तियां हैं, तो दूसरी ओर गांधी पार्क में मेला लगा हुआ है, जहाँ परिवारों और बच्चों की भारी भीड़ उमड़ रही है।
लेकिन इसी भीड़ और चहल-पहल के बीच सट्टा और जुए की गतिविधियाँ जिस तरह सामने आ रही हैं, वह चौंकाने वाला है।
दिनांक 11.04.2026 को मटका पार्क के पास से अर्पित रावत (25 वर्ष, निवासी ग्राम पडोरा) को ऑनलाइन आईपीएल सट्टा खिलाते पकड़ा गया। उसके पास से वन प्लस मोबाइल और 1500 रुपये नगद बरामद हुए।
दिनांक 14.04.2026 को पुरानी अनाज मंडी क्षेत्र से शिवम गर्ग (36 वर्ष, निवासी नमोनगर) को सट्टा पर्चियों और 950 रुपये नगद के साथ गिरफ्तार किया गया। इसी दिन पुराने रेलवे स्टेशन मैदान पर जुआ खेलते हुए धर्मेन्द्र खटीक (40 वर्ष), राजू माहौर (52 वर्ष) और मनोज जोगी (45 वर्ष) को पकड़ा गया, जिनके पास से ताश की गड्डी और 2780 रुपये जब्त किए गए।
दिनांक 15.04.2026 को गांधी पार्क के पास मुकेश जाटव (46 वर्ष, निवासी लालमाटी) को सट्टा खिलाते हुए पकड़ा गया, जिसके पास से 1100 रुपये और सट्टा पर्चियां मिलीं. उसी दिन पुराने रेलवे स्टेशन क्षेत्र से रवि जाटव (33 वर्ष, निवासी न्यू ब्लॉक) को भी 1050 रुपये और सट्टा सामग्री के साथ गिरफ्तार किया गया।
दिनांक 22.04.2026 को पुरानी अनाज मंडी में जुआ खेलते हुए अरविन्द राठौर (34 वर्ष) और नीरज राठौर (22 वर्ष, दोनों निवासी मनियर) को पकड़ा गया, जिनसे 1500 रुपये और ताश की गड्डी जब्त की गई।
दिनांक 23.04.2026 को इसी क्षेत्र में सट्टा मामले में कार्रवाई करते हुए ऋषभ जादौन (19 वर्ष, निवासी तुलसी कॉलोनी) को पकड़ा गया, जिसके पास से सट्टा पर्चियां और 1200 रुपये बरामद हुए। (दूसरे आरोपी से मिलाकर कुल 5800 रुपये की जब्ती बताई गई है)।
इन लगातार कार्रवाइयों से एक बात साफ होती है कि यह घटनाएँ अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही क्षेत्र में फैले उस नेटवर्क की परतें हैं, जो धीरे-धीरे सामने आ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या है इस छोटे से इलाके में कि कुछ ही दिनों के भीतर इतने सट्टेबाज और जुआरी पकड़े जाते हैं? क्या यह केवल संयोग है? या फिर यह क्षेत्र एक संगठित अवैध गतिविधियों का केंद्र बन चुका है?
जब सिटी कोतवाली से कुछ ही दूरी पर, मेले की भीड़ के बीच, पॉश कॉलोनियों के आसपास यह सब हो रहा हो, तो यह मान लेना मुश्किल है कि यह सब किसी की नजर में नहीं आ रहा होगा। लगातार गिरफ्तारियाँ यह जरूर दिखाती हैं कि पुलिस सक्रिय है, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि समस्या केवल “पकड़ने” से खत्म नहीं हो रही।
अब सवाल शहर से है कि, .... क्या हम सच में अनजान हैं… या जानकर भी अनदेखा कर रहे हैं?

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