सिद्धेश्वर मेला - परंपरा बदली या पहचान खत्म?
विवादों की धूल इतनी घनी हो चुकी है कि उसमें परंपराओं की पहचान तक दबती जा रही है। कभी जिस सिद्धेश्वर मेले का नाम लेते ही शिवपुरी की आत्मा झलक उठती थी, आज वही मेला चर्चा में भी नहीं और यह संयोग नहीं, व्यवस्था और समाज दोनों की संयुक्त उपलब्धि है।
कहते हैं समय बदलता है, पर यहाँ तो समय के साथ स्मृतियाँ भी नीलाम हो गईं। जिस मेले की शुरुआत शिवरात्रि पर प्राचीन सिद्धेश्वर मंदिर के आंगन से होती थी, जहाँ आस्था, संस्कृति और लोकजीवन का अद्भुत संगम दिखता था, उसे पहले “समय” के नाम पर खिसकाया गया, फिर “स्थान” के नाम पर हटाया गया, और अंततः “स्वरूप” के नाम पर समाप्त कर दिया गया। अब वही मेला गांधी पार्क की सीमाओं में सिमटकर, चमकते स्टॉल और ऊँची आवाज़ के डीजे के बीच अपनी पहचान तलाश रहा है।
यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे उस मानसिकता का परिणाम है, जहाँ परंपराएँ बोझ लगने लगती हैं और आधुनिकता का अर्थ केवल बाज़ार समझ लिया जाता है। जिस शहर में कभी तालाबों को जीवन माना जाता था, वहीं आज वे अतिक्रमण और उपेक्षा के शिकार हैं। जब हम अपने जलस्रोतों तक को नहीं बचा पाए, तो एक मेले की परंपरा से संवेदनशीलता की उम्मीद करना भी शायद मूर्खता ही है।
विडंबना देखिए, जिस मंच ने कभी देश को ओ पी नैयर जैसे संगीतकार और अन्नू कपूर जैसे कलाकार दिए, आज वही मंच शायद किसी प्रायोजक के बैनर के नीचे अपनी जगह ढूंढ रहा होगा। पहले जहाँ लोकगीतों की गूंज होती थी, वहाँ अब डीजे की धुन पर थिरकती भीड़ है, जिसे न इतिहास से मतलब है, न विरासत से।
और फिर हम गर्व से कहते हैं “विकास हो रहा है।”
यदि विकास का अर्थ अपनी जड़ों को काटकर कृत्रिम रोशनी में खड़ा होना है, तो निस्संदेह हम बहुत विकसित हो चुके हैं।
सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि मेला बदल गया, बल्कि यह है कि समाज ने इस बदलाव को सहज स्वीकार कर लिया। किसी ने प्रश्न नहीं किया, किसी ने विरोध नहीं किया क्योंकि अब हमारे पास समय नहीं है। हम व्यस्त हैं मोबाइल स्क्रीन पर, रील्स में, और उस आभासी दुनिया में जहाँ परंपराओं का कोई स्थान नहीं।
और जो लोग इसे स्वर्णिम युग का अंत कह रहे हैं, उन्हें मूर्ख कह देना सबसे आसान समाधान है। क्योंकि सच्चाई स्वीकार करना कठिन होता है। यह मान लेना कठिन होता है कि हमने ही अपनी विरासत को तिल-तिल कर खत्म किया है।
व्यवस्था को दोष देना भी अब एक औपचारिकता मात्र रह गया है, क्योंकि व्यवस्था आखिर बनाता कौन है? वही समाज, जो आज अपने ही अतीत से आँखें चुरा रहा है।
सिद्धेश्वर मेला केवल एक आयोजन नहीं था, वह शिवपुरी की पहचान था और पहचान जब मिटती है, तो शोर नहीं होता, बस एक सन्नाटा फैलता है। आज वही सन्नाटा है… और हम उसे भी “प्रगति” का नाम देकर संतुष्ट हैं।

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