बंगाल 2016–2026 - बदलती राजनीति, टूटते मिथक और नए भारत का उदय - दिवाकर शर्मा
पश्चिम बंगाल की 2016 से 2026 तक की राजनीतिक यात्रा केवल चुनावी आँकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भूचाल का इतिहास है जिसने राज्य की राजनीति, समाज, विचारधारा और सत्ता संरचना की जड़ों तक को हिला दिया। यह वह दशक रहा जिसमें बंगाल ने केवल सरकारों का उत्थान-पतन नहीं देखा, बल्कि उसने यह भी देखा कि कैसे दशकों से अजेय माने जाने वाले राजनीतिक किले धीरे-धीरे दरकने लगते हैं और कैसे मतदाता का मानस इतिहास से निकलकर भविष्य की राजनीति लिखना शुरू कर देता है।
एक समय बंगाल कांग्रेस का अभेद्य गढ़ था। फिर 34 वर्षों तक वामपंथ ने ऐसा राजनीतिक साम्राज्य खड़ा किया जिसे लोकतांत्रिक दुनिया का सबसे लंबा निर्वाचित कम्युनिस्ट शासन कहा गया। उसके बाद ममता बनर्जी ने “माँ, माटी और मानुष” के नारे के साथ वामपंथ को उखाड़ फेंका और तृणमूल कांग्रेस को बंगाल की सबसे बड़ी शक्ति बना दिया। लेकिन 2016 के बाद पहली बार बंगाल की जनता ने यह महसूस करना शुरू किया कि केवल सत्ता बदलना पर्याप्त नहीं है, व्यवस्था बदलना भी आवश्यक है।
2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 211 सीटें जीतकर लगभग 45 प्रतिशत वोट हासिल किए। भाजपा मात्र 3 सीटों पर थी और उसका वोट प्रतिशत लगभग 10 प्रतिशत था। उस समय भाजपा को बंगाल में एक सीमित राजनीतिक शक्ति माना जाता था। दूसरी ओर वाम-कांग्रेस गठबंधन अभी भी लगभग 70 सीटों के साथ विपक्ष में मौजूद था। राजनीतिक विश्लेषकों को लगता था कि बंगाल में तृणमूल का प्रभुत्व लंबे समय तक कायम रहेगा। लेकिन राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि सबसे मजबूत दिखाई देने वाली सत्ता के भीतर ही उसके पतन के बीज जन्म लेने लगते हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बंगाल में लगभग 17 प्रतिशत तक पहुँचा था। तब इसे “मोदी लहर” का प्रभाव माना गया। लेकिन 2019 तक वही भाजपा 40 प्रतिशत से अधिक वोट प्राप्त कर 42 में से 18 लोकसभा सीटें जीत चुकी थी। यह केवल चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि बंगाल की राजनीति अब स्थायी रूप से बदल रही है। 2021 तक भाजपा 3 सीटों से बढ़कर 77 सीटों तक पहुँच गई। बंगाल पहली बार पूरी तरह द्विध्रुवीय राजनीति में बदल चुका था। वामदल और कांग्रेस लगभग राजनीतिक शून्य में पहुँच गए थे।
यह बदलाव केवल वोटों का गणित नहीं था, बल्कि मतदाता के मानस का परिवर्तन था। दशकों तक विचारधारा आधारित राजनीति करने वाला बंगाल अब परिणाम आधारित राजनीति की ओर बढ़ रहा था। जनता अब केवल यह नहीं देख रही थी कि कौन “सेकुलर” है, कौन “वामपंथी” है या कौन “क्षेत्रीय” है। वह यह देख रही थी कि कौन सुरक्षा देगा, कौन रोजगार देगा, कौन भ्रष्टाचार रोकेगा और कौन भविष्य का स्पष्ट विजन प्रस्तुत करेगा।
वामपंथ का पतन इस परिवर्तन की सबसे बड़ी पृष्ठभूमि बना। 1977 से 2011 तक वाम मोर्चा ने लगातार 34 वर्षों तक बंगाल पर शासन किया। भूमि सुधार, पंचायत मॉडल और मजदूर राजनीति ने उसे ग्रामीण बंगाल में गहरी जड़ें दी थीं। लेकिन समय के साथ वही मॉडल उसकी कमजोरी बन गया। उद्योगों का पलायन, निजी निवेश की कमी, युवाओं में बेरोजगारी और संगठनात्मक जड़ता ने वाम राजनीति को धीरे-धीरे खोखला कर दिया। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन ने उस प्रक्रिया को तेज कर दिया। टाटा नैनो परियोजना का बंगाल से बाहर जाना केवल एक औद्योगिक घटना नहीं थी, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतीक था जिसमें बंगाल विकास और निवेश की दौड़ में पिछड़ता जा रहा था।
कांग्रेस की स्थिति भी अलग नहीं रही। कभी बंगाल की मुख्य राजनीतिक धुरी रही कांग्रेस धीरे-धीरे नेतृत्वविहीन होती गई। उसका जनाधार पहले तृणमूल में और बाद में भाजपा की ओर खिसकता चला गया। कांग्रेस बंगाल में ऐसा कोई चेहरा तैयार नहीं कर सकी जो जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प बन सके। परिणाम यह हुआ कि राज्य की राजनीति में उसकी उपस्थिति प्रतीकात्मक बनकर रह गई।
इसी खाली स्थान को भाजपा ने भरा। भाजपा ने बंगाल में केवल चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि उसने बंगाल की राजनीतिक भाषा बदलने का प्रयास किया। उसने सांस्कृतिक पहचान, हिंदू अस्मिता, सीमा सुरक्षा, घुसपैठ, राजनीतिक हिंसा और विकास जैसे मुद्दों को केंद्र में लाकर एक नया नैरेटिव खड़ा किया। भाजपा ने बूथ स्तर तक संगठन फैलाया, सोशल मीडिया का व्यापक उपयोग किया और केंद्रीय नेतृत्व को लगातार सक्रिय रखा। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने बंगाल को केवल एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण मोर्चे के रूप में देखा।
2021 का चुनाव इस रणनीति का परिणाम था। तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीतकर सत्ता तो बचा ली, लेकिन भाजपा ने 38 प्रतिशत से अधिक वोट प्राप्त कर यह स्पष्ट कर दिया कि अब बंगाल की राजनीति स्थायी रूप से बदल चुकी है। वामदल और कांग्रेस का संयुक्त वोट बैंक टूटकर तृणमूल और भाजपा के बीच विभाजित हो चुका था। मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा भाजपा को रोकने के लिए तृणमूल के साथ गया, जबकि सत्ता विरोधी हिंदू और युवा वोट भाजपा की ओर स्थानांतरित हो गया।
तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनकल्याणकारी योजनाएँ रहीं। कन्याश्री, रूपश्री, स्वास्थ्य साथी और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने महिलाओं और गरीब वर्गों में उसकी मजबूत पकड़ बनाई। लेकिन दूसरी ओर कटमनी, शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पंचायत भ्रष्टाचार और राजनीतिक हिंसा जैसे आरोपों ने उसकी छवि को लगातार नुकसान पहुँचाया। ग्रामीण क्षेत्रों में यह भावना मजबूत होने लगी कि स्थानीय स्तर पर सत्ता कुछ समूहों तक सीमित हो गई है। युवाओं में बेरोजगारी और उद्योगों की कमी को लेकर असंतोष बढ़ता गया।
महिला मतदाता इस पूरे दशक की सबसे निर्णायक शक्ति बनकर उभरीं। बंगाल में महिलाओं की मतदान भागीदारी लगातार बढ़ी और कई क्षेत्रों में उन्होंने चुनावी परिणामों की दिशा तय की। प्रारंभिक वर्षों में महिला मतदाताओं का बड़ा हिस्सा तृणमूल कांग्रेस के साथ रहा, लेकिन समय के साथ सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और भविष्य की स्थिरता जैसे मुद्दे उनके लिए भी महत्वपूर्ण होते गए।
बंगाल की राजनीति में सांस्कृतिक अस्मिता का संघर्ष भी इस दशक की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक रहा। भाजपा ने दुर्गा पूजा, जय श्रीराम, सीमा सुरक्षा और हिंदू पहचान को प्रमुख मुद्दा बनाया, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने बंगाली अस्मिता और क्षेत्रीय गौरव को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। यह संघर्ष केवल चुनावी नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक संघर्ष भी बन गया।
सीमावर्ती जिलों में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा भी तेजी से उभरा। भाजपा ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसंख्या संतुलन से जोड़ा, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण की रणनीति बताया। लेकिन यह स्पष्ट था कि सीमावर्ती क्षेत्रों में इस मुद्दे का प्रभाव मतदाताओं पर दिखाई देने लगा था।
इस पूरे दशक का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बंगाल अब स्थायी राजनीतिक गढ़ों की राजनीति से बाहर निकल चुका है। जनता अब केवल भावनात्मक नारों या ऐतिहासिक संघर्षों के आधार पर निर्णय नहीं ले रही। वह विकास, सुरक्षा, पहचान, नेतृत्व और प्रशासनिक परिणामों को एक साथ देख रही है।
लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अभी बाकी है। इतिहास गवाह है कि बंगाल केवल सरकारें नहीं बदलता, बल्कि राजनीतिक युग समाप्त कर देता है। कांग्रेस इसका उदाहरण है। वामपंथ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अब यही प्रश्न तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ा है। यदि वह सत्ता से बाहर होती है, तो क्या उसका भी वही भविष्य होगा? और दूसरी ओर भाजपा के सामने भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। यदि वह बंगाल में स्थायी शक्ति बनती है, तो क्या वह अपनी वैचारिक पहचान और संगठनात्मक अनुशासन को सुरक्षित रख पाएगी, या फिर अवसरवादी राजनीति धीरे-धीरे उसे भी उसी रास्ते पर ले जाएगी जिस रास्ते पर कभी कांग्रेस, फिर वामदल और बाद में तृणमूल चली गई?
बंगाल आज केवल एक राज्य नहीं है। यह भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन चुका है। यहाँ जो परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं, वे आने वाले भारत की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। यह दशक स्पष्ट संकेत देता है कि भारतीय लोकतंत्र अब स्थायी वैचारिक किलों का नहीं, बल्कि निरंतर प्रतिस्पर्धा, परिणाम आधारित राजनीति और बदलती जनचेतना का दौर बन चुका है। आने वाले वर्षों में बंगाल केवल यह तय नहीं करेगा कि राज्य पर कौन शासन करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भारत की राजनीति भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ेगी।

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