जलती बसें, मरता विश्वास और मौन व्यवस्था!
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एक चार वर्षीय मासूम... जिसने शायद अभी ठीक से “माँ” कहना भी नहीं सीखा होगा… जिसकी उंगलियाँ अभी स्कूल की कॉपी पर टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनाना सीख रही थीं… जिसे शायद यह भी नहीं पता था कि “एसी स्लीपर बस” नाम की चीज़ में बैठना सुविधा नहीं, कभी-कभी मौत के मुहाने पर बैठना भी हो सकता है… वह मासूम अब इस दुनिया में नहीं है।
14-15 मई की वह रात केवल एक बस में लगी आग की घटना नहीं थी। वह इस देश की सड़कों पर दौड़ रही उस व्यवस्था का जलता हुआ चेहरा था, जो आम आदमी से किराया तो “लक्ज़री” का लेती है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर उसे भगवान भरोसे छोड़ देती है।
इंदौर से शिवपुरी आ रही एक स्लीपर एसी बस… होटल पर रुकी हुई बस… अधिकांश यात्री नीचे उतरकर चाय-नाश्ता कर रहे थे… और तभी खड़ी बस में आग लग जाती है। देखते ही देखते पूरी बस जलकर राख हो जाती है।
कल्पना कीजिए, यदि सभी यात्री उस समय बस के भीतर होते तो यह घटना केवल एक हादसा नहीं, सामूहिक नरसंहार में बदल सकती थी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम हर बार “बड़ा हादसा टल गया” कहकर स्वयं को सांत्वना देते रहेंगे? क्या भारतीय नागरिकों का जीवन अब केवल किस्मत के भरोसे चलने वाली वस्तु बन चुका है? क्या इस देश में सड़क पर सुरक्षित यात्रा करना भी अब मौलिक अधिकार नहीं रहा?
जब कोई पुल गिरता है तो कहा जाता है “दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना”… जब कोई ट्रेन टकराती है तो कहा जाता है “तकनीकी त्रुटि”… जब कोई बस जलती है तो कहा जाता है “शॉर्ट सर्किट”… और फिर कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाता है। मृतकों के परिवार रोते रह जाते हैं, लेकिन सिस्टम फिर अगले हादसे की प्रतीक्षा में सो जाता है। सवाल केवल बस मालिक का नहीं है। सवाल उस पूरी श्रृंखला का है जो ऐसे वाहनों को सड़कों पर दौड़ने की अनुमति देती है।
क्या उस बस की फिटनेस जाँच हुई थी? क्या अग्निशमन उपकरण काम कर रहे थे? क्या इमरजेंसी एग्जिट कार्यशील थे? क्या चालक और स्टाफ को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया था? क्या आरटीओ ने नियमों के अनुसार निरीक्षण किया था या कागज़ों पर मोहर लगाकर जिम्मेदारी पूरी कर दी गई? यदि बस में तकनीकी खामी थी तो वह सड़क पर कैसे उतरी? यदि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हुआ तो परमिट कैसे मिला? यदि सब कुछ सही था तो आग इतनी भयावह कैसे हुई? यही वह बिंदु है जहाँ “दुर्घटना” शब्द छोटा पड़ जाता है और “व्यवस्थित अपराध” शब्द सामने खड़ा दिखाई देता है।
यह केवल एक बस नहीं जली है... यह आम भारतीय का विश्वास जला है। यह उस पिता की उम्मीद जली है जो अपने बच्चे को सुरक्षित घर ले जाना चाहता था। यह उस माँ का हृदय जला है जो अब जीवन भर उस रात की चीखें सुनकर सोएगी और सबसे भयावह बात यह है कि हम ऐसे हादसों के अभ्यस्त बनाए जा चुके हैं।
कुछ दिन टीवी डिबेट होगी… कुछ दिन सोशल मीडिया पर क्रोध दिखेगा… कुछ नेताओं के बयान आएँगे… कुछ अधिकारियों का स्थानांतरण होगा… और फिर सब शांत।
क्या कभी किसी बड़े परिवहन कारोबारी की संपत्ति जब्त हुई?क्या कभी किसी लापरवाह अधिकारी पर हत्या का मुकदमा चला? क्या कभी किसी आरटीओ अधिकारी को जेल भेजा गया क्योंकि उसकी लापरवाही से नागरिक मरे? क्या कभी उन नेताओं से जवाब माँगा गया जिन्होंने इन्हीं कारोबारियों को मंचों पर बुलाकर “समाजसेवी”, “उद्योगपति”, “प्रदेश गौरव” जैसे सम्मान दिए?
यही इस देश की सबसे बड़ी विडम्बना है। जो कारोबारी करोड़ों के विज्ञापन देते हैं, वही सत्ता के मंचों पर सम्मानित होते हैं। जो पत्रकार उनके विज्ञापन छापते हैं, वही उनके सम्मान समारोहों में ताली बजाते दिखाई देते हैं। लेकिन जब उन्हीं की लापरवाही से किसी का बच्चा मरता है, तब पत्रकारिता का नैतिक धर्म क्या कहता है? क्या अब भी खबरों की कीमत विज्ञापन तय करेगा? क्या अब भी चैनलों की बहसें स्पॉन्सरशिप देखकर होंगी? क्या अब भी बड़े उद्योगपतियों की तस्वीरें प्रथम पृष्ठ पर और आम आदमी की जली हुई लाशें अंदर के पन्नों में दफन रहेंगी?
पत्रकारिता यदि केवल विज्ञापन प्रबंधन बन जाए तो वह लोकतंत्र की प्रहरी नहीं, दलाली का दस्तावेज़ बन जाती है और मंच यदि केवल पैसे वालों के सम्मान का माध्यम बन जाएँ तो वे समाज का दर्पण नहीं, भ्रष्ट गठजोड़ के मेले बन जाते हैं।
यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं है। यह समय प्रश्न पूछने का है। यह समय नागरिक चेतना जगाने का है। यह समय यह समझने का है कि सड़क पर सुरक्षित चलना, सुरक्षित यात्रा करना, सुरक्षित घर पहुँचना, यह किसी सरकार या व्यवसायी की दया नहीं, हर भारतीय का मौलिक अधिकार है।
यदि कोई व्यवस्था उस अधिकार की रक्षा नहीं कर पा रही, तो वह व्यवस्था कठघरे में खड़ी होगी। यदि कोई अधिकारी पैसे लेकर आँख बंद करता है, तो वह केवल भ्रष्ट नहीं, नागरिकों की मृत्यु का भागीदार है। यदि कोई व्यवसायी लाभ के लिए सुरक्षा से समझौता करता है, तो वह व्यापारी नहीं, मानव जीवन का सौदागर है और यदि समाज यह सब देखकर भी मौन रहता है, तो अगली आग किसी और बस में नहीं, शायद हमारे अपने घर में लगेगी।
आज आवश्यकता है कि हर नागरिक पूछे कि बसों की फिटनेस रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं होती? हर स्लीपर बस में अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट क्यों नहीं होता? फर्जी फिटनेस देने वाले अधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या नहीं, सीधे आपराधिक हत्या का मुकदमा क्यों नहीं चलता? यात्रियों के जीवन से खिलवाड़ करने वाले परिवहन माफियाओं की राजनीतिक संरक्षकता कब समाप्त होगी?
राष्ट्रवाद केवल सीमा पर दुश्मन से लड़ना नहीं होता। राष्ट्रवाद अपने ही देश के नागरिकों के जीवन की रक्षा करना भी होता है। यदि भारत माता के बच्चों की जान सड़कों पर असुरक्षित है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, राष्ट्रीय चेतना पर कलंक है। उस चार वर्षीय मासूम की मृत्यु केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं… यह उस व्यवस्था के चेहरे पर लगा हुआ वह काला धब्बा है जिसे अब आँसुओं से नहीं, जवाबदेही से धोना होगा।
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दिवाकर की दुनाली से

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