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कॉकरोच जनता पार्टी - Gen-Z को भड़काने वाला डिजिटल प्रोपेगेंडा?

 

भारत इस समय केवल राजनीतिक संघर्ष के दौर से नहीं गुजर रहा, बल्कि वह एक ऐसे डिजिटल युद्ध का सामना कर रहा है जिसमें मीम, ट्रेंड, वायरल वीडियो और सोशल मीडिया नैरेटिव को हथियार बनाकर युवाओं की मानसिकता को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से अचानक खड़ा किया गया इंटरनेट अभियान भी अब इसी बड़े खेल का हिस्सा माना जाने लगा है।

कुछ ही दिनों में लाखों फॉलोअर्स, विदेशी लोकेशन से सक्रिय अकाउंट, संगठित मीम नेटवर्क, एक जैसी भाषा बोलते इन्फ्लुएंसर्स और न्यायपालिका से लेकर सरकार तक पर सुनियोजित कटाक्ष, यह सब केवल संयोग नहीं लगता। सोशल मीडिया पर लगातार यह चर्चा चल रही है कि इस तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारत के युवाओं विशेषकर Gen-Z पीढ़ी में व्यवस्था-विरोधी मानसिकता पैदा करना है। ऐसी मानसिकता, जो धीरे-धीरे लोकतांत्रिक असहमति से आगे बढ़कर अराजकता, संस्थाओं के प्रति अविश्वास और सड़क आधारित टकराव की ओर धकेली जा सके।

इस पूरे विवाद की शुरुआत भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant के उस बयान से हुई जिसे सोशल मीडिया पर संदर्भ से काटकर इस प्रकार प्रस्तुत किया गया मानो उन्होंने बेरोजगार युवाओं को “कॉकरोच” कहा हो। जबकि बाद में स्वयं उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका आशय उन लोगों से था जो फर्जी डिग्री और झूठे दावों के सहारे व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें भारत के युवाओं पर गर्व है।

लेकिन आज का डिजिटल तंत्र सत्य नहीं, सनसनी पर चलता है। कुछ सेकंड की एडिटेड क्लिप, उत्तेजक कैप्शन और संगठित ट्रेंड मिलकर ऐसा वातावरण बना देते हैं जहाँ तथ्य गौण और भावनाएँ प्रधान हो जाती हैं। इसी माहौल का लाभ उठाकर “कॉकरोच जनता पार्टी” को सोशल मीडिया पर वायरल किया गया।

इस अभियान से जुड़े प्रमुख नामों में अभिजीत दीपके का नाम सामने आया, जिनकी पृष्ठभूमि राजनीतिक कम्युनिकेशन और सोशल मीडिया रणनीति से जुड़ी रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वे आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम से जुड़े रहे और दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में भी कम्युनिकेशन से संबंधित भूमिका निभा चुके हैं। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि यह कोई सहज मीम पेज नहीं, बल्कि डिजिटल नैरेटिव निर्माण की समझ रखने वाले लोगों द्वारा चलाया गया अभियान है।

सोशल मीडिया पर यह आरोप भी व्यापक रूप से लगाए जा रहे हैं कि इस अभियान को विदेशों में बैठे कुछ राजनीतिक इन्फ्लुएंसर्स और संगठित डिजिटल नेटवर्क बढ़ावा दे रहे हैं। अनेक लोगों का दावा है कि इसके फॉलोअर्स का बड़ा हिस्सा भारत से बाहर पाकिस्तान, बांग्लादेश, मध्य-पूर्व और पश्चिमी देशों से जुड़ा दिखाई देता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि भले अलग विषय हो, लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठता है कि भारत की न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं का मजाक उड़ाने वाले अभियान को विदेशी डिजिटल इकोसिस्टम से इतना समर्थन क्यों मिल रहा है?

यह भी समझना आवश्यक है कि पिछले कुछ वर्षों में नेपाल, बांग्लादेश और अन्य देशों में सोशल मीडिया आधारित आंदोलनों को किस प्रकार राजनीतिक अस्थिरता और सड़क अराजकता में बदलने का प्रयास किया गया। पहले मीम बनते हैं, फिर संस्थाओं का उपहास शुरू होता है, फिर युवाओं में व्यवस्था के प्रति घृणा भरी जाती है और अंततः उन्हें “क्रांति” के नाम पर सड़क पर उतारने की कोशिश होती है। यही कारण है कि भारत में भी अनेक राष्ट्रवादी चिंतकों को “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसा अभियान केवल हास्य नहीं, बल्कि मानसिक युद्ध का हिस्सा प्रतीत हो रहा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरी मुहिम में युवाओं की वास्तविक समस्याओं का समाधान कहीं दिखाई नहीं देता। बेरोजगारी पर गंभीर चर्चा नहीं, केवल व्यंग्य है। लोकतंत्र पर वैचारिक विमर्श नहीं, केवल ट्रोल संस्कृति है। राष्ट्र निर्माण का कोई विजन नहीं, केवल वायरल होने की होड़ है। युवाओं को प्रेरित करने के बजाय उन्हें “लेजी”, “कॉकरोच” और डिजिटल विद्रोही जैसी पहचान देना अंततः उनकी ऊर्जा को दिशाहीन बनाने का प्रयास है।

भारत का युवा वह शक्ति है जिसने दुनिया को दिखाया कि वह स्टार्टअप बना सकता है, सेना में जाकर सीमा की रक्षा कर सकता है, चंद्रयान को चाँद तक पहुँचा सकता है और वैश्विक मंचों पर भारत का नाम ऊँचा कर सकता है। उस युवा को मीम संस्कृति और इंटरनेट अराजकता तक सीमित कर देना राष्ट्र की प्रतिभा का अपमान है।

कुछ राजनीतिक समूहों और उनके डिजिटल समर्थकों को यह भ्रम है कि केवल सोशल मीडिया पर हवा बनाकर भारत की जनता को भ्रमित किया जा सकता है। लेकिन भारत का लोकतंत्र ट्विटर ट्रेंड से नहीं चलता। यह गाँव, किसान, सैनिक, मजदूर, मध्यमवर्ग और राष्ट्रहित की भावना से चलता है। सोशल मीडिया तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक जमीन पर नेतृत्व की स्वीकार्यता न हो। यही कारण है कि वर्षों से चल रहे तमाम डिजिटल प्रोपेगेंडा के बावजूद भारत की जनता बार-बार राष्ट्रहित, स्थिरता और विकास के पक्ष में निर्णय देती रही है।

लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार है, लेकिन संगठित रूप से न्यायपालिका, सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना अंततः राष्ट्र को कमजोर करता है। भारत को आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो डिजिटल ट्रेंड का हिस्सा बनने के बजाय राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बनें। जो मीम नहीं, मिशन चुनें। जो अराजकता नहीं, उत्तरदायित्व चुनें।

भारत कोई कमजोर राष्ट्र नहीं है जिसे कुछ वायरल हैशटैग और विदेशी समर्थित डिजिटल अभियानों से अस्थिर किया जा सके। यह वह देश है जिसने हजारों वर्षों की सभ्यता, संघर्ष और बलिदान के बाद अपनी लोकतांत्रिक संस्थाएँ खड़ी की हैं। इन्हें ट्रोल संस्कृति के हवाले नहीं किया जा सकता। राष्ट्र सर्वोपरि था, है और रहेगा।

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