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Gen Z या जड़ों से विद्रोह? सनातन पर पश्चिमी मानसिक आक्रमण का रहस्य - दिवाकर शर्मा

 



द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी दुनिया ने केवल अपनी अर्थव्यवस्था और राजनीति का पुनर्निर्माण नहीं किया, बल्कि मानव समाज को देखने की एक नई मानसिक संरचना भी तैयार की। इसी दौर में “बेबी बूमर”, “जेनरेशन एक्स”, “मिलेनियल”, “जेनरेशन Z” और “जेनरेशन अल्फा” जैसे शब्द जन्म लेने लगे। इन शब्दों का आधार कोई सनातन सांस्कृतिक दर्शन नहीं था, बल्कि पश्चिमी समाजशास्त्र, उपभोक्तावाद और राजनीतिक प्रयोग थे। “बेबी बूमर” शब्द युद्ध के बाद अचानक बढ़ी जन्मदर से निकला, जबकि “जेनरेशन X” को आधुनिक रूप से कनाडाई लेखक Douglas Coupland ने अपनी 1991 की पुस्तक Generation X: Tales for an Accelerated Culture के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाई।

कूपलैंड का उद्देश्य मूल रूप से पश्चिमी समाज में बढ़ते उपभोक्तावाद, दिशाहीनता, कॉरपोरेट जीवन के दबाव और आधुनिक युवा वर्ग की मानसिक बेचैनी को दिखाना था। वह उस पीढ़ी का चित्रण कर रहे थे जो मशीन जैसी जीवनशैली, बाजारवाद और तेज़ होती आधुनिक संस्कृति के बीच स्वयं को खोती जा रही थी। अर्थात उनका लेखन स्वयं पश्चिमी सभ्यता की आंतरिक शून्यता और मानसिक संकट का प्रतिबिंब था। परंतु विडंबना यह रही कि जिस शब्द का उपयोग उन्होंने आधुनिक जीवन की समस्या दिखाने के लिए किया, वही आगे चलकर वैश्विक बाजार और मीडिया का सबसे शक्तिशाली उपकरण बन गया।

यहीं से प्रश्न उठता है कि क्या यह अवधारणा सनातन संस्कृति के अनुरूप थी? उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” की ओर झुकता दिखाई देता है। सनातन संस्कृति मनुष्य को “लेबल” नहीं देती, बल्कि “कर्तव्य” और “संस्कार” देती है। भारत में पीढ़ियों को अंग्रेज़ी अक्षरों और उपभोक्तावादी व्यवहार के आधार पर नहीं बाँटा गया। यहाँ व्यक्ति की पहचान उसके कुल, गोत्र, आश्रम, गुरु-शिष्य परंपरा और जीवन मूल्यों से होती थी। भारतीय परंपरा में दादा-पोता संघर्ष का नहीं, ज्ञान और अनुभव के हस्तांतरण का माध्यम होते थे। “परंपरा” यहाँ जीवन का आधार थी, जबकि आधुनिक पश्चिमी “जेनरेशन मॉडल” व्यक्ति को अपनी पूर्व पीढ़ियों से अलग पहचान देने का प्रयास करता है।

रामायण में श्रीराम अपने पिता के वचन को धर्म मानते हैं। महाभारत में भीष्म, विदुर और कृपाचार्य जैसे बुजुर्ग मार्गदर्शक हैं। उपनिषदों में गुरु और शिष्य का संबंध ज्ञान पर आधारित है, विद्रोह पर नहीं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को “एवं परंपरा प्राप्तम्” कहकर ज्ञान की अखंड परंपरा का स्मरण कराते हैं। अर्थात भारत की सभ्यता “पीढ़ियों को जोड़ने” पर आधारित थी, जबकि आधुनिक पश्चिमी मॉडल धीरे-धीरे “पीढ़ियों को अलग पहचान” देने लगा।

1947 के बाद भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ, परंतु मानसिक और शैक्षणिक ढाँचे में पश्चिमी प्रभाव बना रहा। अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली, मैकॉलेवादी सोच और पश्चिमी समाजशास्त्र को आधुनिकता का प्रतीक मान लिया गया। 1991 के आर्थिक उदारीकरण और इंटरनेट क्रांति के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत को विशाल उपभोक्ता बाजार के रूप में देखना प्रारम्भ किया। उन्हें भारतीय समाज को “संस्कार आधारित परिवार” के रूप में नहीं, बल्कि “कंज्यूमर सेगमेंट” के रूप में विभाजित करना था। इसलिए “Gen Z वोटर”, “मिलेनियल माइंडसेट”, “डिजिटल पीढ़ी” और “रिल्स संस्कृति” जैसे शब्द मीडिया और विज्ञापनों के माध्यम से सामान्य बना दिए गए।

धीरे-धीरे यह केवल सामाजिक वर्गीकरण नहीं रहा, बल्कि राजनीति और सत्ता परिवर्तन का साधन बन गया। पश्चिमी देशों में विश्वविद्यालय आंदोलनों, “वोक कल्चर”, “कैंसल कल्चर”, नस्लीय दंगों और डिजिटल भीड़तंत्र के पीछे “नई पीढ़ी” का नैरेटिव खड़ा किया गया। “युवा क्रांति” के नाम पर भावनात्मक भीड़ तैयार की गई और हर विषय का राजनीतिकरण किया गया। परिवार, धर्म, इतिहास, राष्ट्रवाद, भाषा, संस्कृति व सबको वैचारिक संघर्ष का विषय बना दिया गया। “अरब स्प्रिंग” से लेकर यूरोप और अमेरिका के अनेक छात्र आंदोलनों तक एक समान पैटर्न दिखाई देता है कि पहले नई पीढ़ी को व्यवस्था-विरोधी मानसिकता दी जाती है, फिर उसे डिजिटल शक्ति बनाकर राजनीतिक दबाव तैयार किया जाता है।

भारत में भी यही मॉडल धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। सोशल मीडिया ने युवाओं को ज्ञान से अधिक प्रतिक्रिया का माध्यम बना दिया। कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूहों ने युवाओं को राष्ट्रनिर्माण की दिशा में प्रेरित करने के बजाय उन्हें तात्कालिक आक्रोश और ट्रेंड आधारित राजनीति की ओर धकेला। हर विषय को राजनीतिक युद्ध में बदलने की प्रवृत्ति बढ़ी। मंदिर से लेकर त्योहार तक, सेना से लेकर शिक्षा तक सब कुछ राजनीतिक बहस का हथियार बनने लगा।

इसी पृष्ठभूमि में भारत में तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसी उपमाएँ भी उभरती दिखाई देती हैं। राष्ट्रवादी विमर्श में यह शब्द उन राजनीतिक प्रवृत्तियों के लिए प्रयुक्त होने लगा जिन्हें लोग अवसरवाद, वैचारिक लचीलापन और हर परिस्थिति में स्वयं को बचा लेने वाली राजनीति के रूप में देखते हैं। यह केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि उस जनमानस की प्रतिक्रिया है जो महसूस करता है कि कुछ शक्तियाँ समाज को स्थायी संघर्ष, जातीय विभाजन, पीढ़ीय संघर्ष और सांस्कृतिक अपराधबोध में उलझाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती हैं।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या भारत भी पश्चिम की तरह “नई पीढ़ी बनाम पुरानी पीढ़ी” के संघर्ष में फँस जाएगा? क्या भारतीय युवा अपने ऋषियों, अपने ग्रंथों, अपने पूर्वजों और अपनी सांस्कृतिक चेतना से कटकर केवल “Gen Z influencer culture” तक सीमित हो जाएगा? यदि ऐसा हुआ तो भारत तकनीकी रूप से आधुनिक अवश्य दिखेगा, परंतु उसकी सभ्यतागत आत्मा खो जाएगी।

सनातन संस्कृति आधुनिकता की विरोधी नहीं है, परंतु वह जड़ों से कटकर आधुनिक बनने की समर्थक भी नहीं है। भारत को तकनीक चाहिए, परंतु तकनीक के साथ संस्कार भी चाहिए। भारत को डिजिटल शक्ति चाहिए, परंतु उसके साथ सभ्यतागत स्मृति भी चाहिए। क्योंकि जिस दिन कोई राष्ट्र अपनी पीढ़ियों को “संस्कार की धारा” के स्थान पर केवल “बाजार की श्रेणी” मानने लगता है, उसी दिन उसकी आत्मा धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

भारत की वास्तविक आवश्यकता “Generation Z” तैयार करने की नहीं, बल्कि ऐसी राष्ट्रनिष्ठ पीढ़ी तैयार करने की है जो आधुनिक विज्ञान भी जाने और वेदों की चेतना भी समझे; जो इंटरनेट भी चलाए और गीता भी पढ़े; जो तकनीक में विश्व का नेतृत्व करे, परंतु अपनी जड़ों से कभी अलग न हो। तभी भारत केवल उपभोक्ता समाज नहीं, बल्कि पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

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