शिवपुरी में एक निजी अस्पताल में प्रसूता की मृत्यु के बाद सरकारी डॉक्टरों की निजी अस्पतालों में भूमिका, इलाज में कथित लापरवाही और स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सर्वोदय नगर निवासी गगन अग्रवाल ने कलेक्टर को शिकायत देकर आरोप लगाया है कि उनकी पत्नी निधि अग्रवाल की सिजेरियन डिलीवरी के बाद हालत बिगड़ती रही, लेकिन उपचार कर रहीं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शिखा जैन समय पर देखने नहीं पहुंचीं। परिजनों का आरोप है कि करीब 12 घंटे तक डॉक्टर की अनुपस्थिति के कारण स्थिति गंभीर होती गई, ब्लीडिंग बढ़ी, किडनी प्रभावित हुई और बाद में मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान प्रसूता की मृत्यु हो गई। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि सरकारी डॉक्टर निजी अस्पताल में सेवाएं दे रहे थे और अस्पताल नियमों के विरुद्ध संचालित किया जा रहा था। परिजनों ने अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने, दोषी डॉक्टरों पर एफआईआर और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
वहीं दूसरी ओर, डॉक्टर पक्ष ने इन आरोपों को एकतरफा मानने से बचने की बात कही है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शिखा जैन का कहना है कि मरीज की स्थिति पहले से जटिल थी और उसके पूर्व में भी कई ऑपरेशन हो चुके थे। उनका कहना है कि मरीज को मेडिकल कॉलेज रेफर करने की सलाह दी गई थी तथा प्लेटलेट्स कम होने के कारण उसे वहां भर्ती कराया गया था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी डॉक्टर किसी निजी अस्पताल में नियमित निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकते, लेकिन आपात स्थिति में विशेषज्ञ राय देने या गंभीर मरीज को देखने के लिए बुलाया जाना अलग विषय है। डॉक्टर का यह भी कहना है कि कई बार परिजन पूरी चिकित्सीय स्थिति को समझे बिना केवल अंतिम परिणाम देखकर आरोप लगाने लगते हैं, जबकि चिकित्सा विज्ञान में हर ऑपरेशन और प्रसव के साथ जोखिम जुड़े रहते हैं।
यह मामला केवल एक परिवार के दुख और आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और निजी अस्पतालों के बीच बने उस अनौपचारिक तंत्र पर भी सवाल खड़े करता है, जो वर्षों से चर्चा का विषय रहा है। आम लोगों के बीच यह धारणा बनी हुई है कि कई सरकारी डॉक्टर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निजी अस्पतालों में सेवाएं देते हैं। यदि ऐसा नियमों के विरुद्ध हो रहा है तो प्रशासन को स्पष्ट नीति और सख्त निगरानी की आवश्यकता है। वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि छोटे शहरों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण निजी अस्पताल कई बार सरकारी विशेषज्ञों की सलाह पर निर्भर रहते हैं, जिससे गंभीर मरीजों को तत्काल मदद मिल सके।
इस पूरे प्रकरण में परिजनों की पीड़ा और आक्रोश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी परिवार के लिए प्रसूता की मृत्यु केवल एक मेडिकल घटना नहीं, बल्कि जीवनभर का आघात होती है। यदि वास्तव में समय पर उपचार में देरी हुई है, मरीज की मॉनिटरिंग ठीक से नहीं हुई या अस्पताल ने अपनी क्षमता से अधिक गंभीर केस लिया, तो इसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है। लेकिन दूसरी ओर केवल जनभावना या सोशल मीडिया दबाव के आधार पर किसी डॉक्टर को दोषी ठहराना भी न्यायसंगत नहीं माना जा सकता, क्योंकि कई बार गंभीर प्रसव मामलों में सभी प्रयासों के बावजूद मरीज को बचा पाना संभव नहीं हो पाता।
ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता निष्पक्ष और तकनीकी जांच की होती है। मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री, ऑपरेशन रिकॉर्ड, डॉक्टरों की विजिट डिटेल, रेफरल टाइमिंग, ICU सुविधाएं और उपचार की प्रक्रिया की विशेषज्ञ समिति द्वारा जांच होनी चाहिए। यदि कहीं लापरवाही सिद्ध होती है तो कार्रवाई हो, लेकिन यदि चिकित्सकीय जटिलता कारण रही हो तो तथ्यों को भी सामने लाया जाए। स्वास्थ्य व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि न तो मरीज पक्ष की पीड़ा दबे और न ही बिना जांच डॉक्टरों को अपराधी घोषित किया जाए।
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