अंकों की दौड़ में मरता भारत का भविष्य!
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भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे यह तय करना होगा कि उसकी शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बनेगी या फिर अंकों, डिग्रियों और अंतहीन प्रतिस्पर्धा की ऐसी अंधी सुरंग, जिसमें देश का युवा धीरे-धीरे अपना आत्मविश्वास, मानसिक संतुलन और अंततः अपना जीवन तक खोता चला जाए। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों से विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या की जो भयावह घटनाएँ सामने आई हैं, वे केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक मानसिकता और रोजगार संरचना पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के प्रमाणित आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2013 में भारत में छात्र आत्महत्या के 8423 मामले दर्ज हुए थे। वर्ष 2014 में यह संख्या लगभग 8032 रही, 2015 में 8934, 2016 में 9478, 2017 में 9905, 2018 में 10159, 2019 में 10335, 2020 में 12526, 2021 में 13089, 2022 में 13044, 2023 में 13892 और 2024 में लगभग 14488 तक पहुँच गई। इसी अवधि में कुल आत्महत्याओं की संख्या भी बढ़ी, किंतु शिक्षा और परीक्षा संबंधी आत्महत्याओं की वृद्धि दर सामान्य वृद्धि से कहीं अधिक रही। वर्ष 2013 में कुल आत्महत्याओं में छात्र आत्महत्याओं का अनुपात लगभग 6.2 प्रतिशत था, जो 2024 तक बढ़कर लगभग 8.5 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह स्पष्ट संकेत है कि शिक्षा आधारित तनाव अब राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है।
इन घटनाओं का सबसे बड़ा केंद्र उन शहरों को बनाया गया जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विद्यार्थी बड़ी संख्या में पहुँचते हैं। राजस्थान का कोटा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। देशभर से लाखों विद्यार्थी वहाँ IIT-JEE, NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जाते हैं। कोटा ने भारत को हजारों इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी दिए हैं। किंतु जब कोई दुखद घटना होती है तो अचानक पूरा देश कोटा को कठघरे में खड़ा करने लगता है। यह अत्यंत अन्यायपूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण मानसिकता है। कोटा का सामान्य नागरिक किसी विद्यार्थी पर दबाव नहीं डालता। वहाँ की पूरी अर्थव्यवस्था, छोटे व्यापार, हॉस्टल, भोजनालय, पुस्तक विक्रेता, परिवहन और स्थानीय रोजगार इन्हीं विद्यार्थियों से जुड़े हैं। कोटा का समाज चाहता है कि वहाँ आने वाला हर बच्चा सफल हो, सुरक्षित रहे और अपने परिवार का सपना पूरा करे। किसी विद्यार्थी की आत्महत्या के लिए पूरे शहर को दोषी ठहराना वैसा ही है जैसे किसी एक सड़क दुर्घटना के लिए पूरे शहर को अपराधी घोषित कर देना। वास्तविक दोष उस मानसिकता का है जिसने शिक्षा को युद्ध बना दिया है और बच्चों को यह विश्वास दिला दिया है कि यदि वे अपेक्षित अंक नहीं ला पाए तो उनका जीवन व्यर्थ है।
भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की जड़ें औपनिवेशिक काल में बनाई गई उस मैकाले आधारित नीति में देखी जाती हैं जिसका उद्देश्य भारत में ऐसी पीढ़ी तैयार करना था जो अंग्रेजी सत्ता के प्रशासनिक ढाँचे की कर्मचारी बन सके। थॉमस मैकाले द्वारा 1835 में प्रस्तुत शिक्षा मॉडल का मूल लक्ष्य भारतीय आत्मा को कमजोर कर अंग्रेजी मानसिकता का प्रसार करना था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजनीतिक सत्ता तो बदल गई, लेकिन शिक्षा की आत्मा नहीं बदली। वही डिग्री आधारित, नौकरी केंद्रित, प्रमाणपत्र प्रधान और परीक्षा आधारित ढाँचा स्वतंत्र भारत में भी चलता रहा। धीरे-धीरे यह व्यवस्था शिक्षा से अधिक व्यापार बनती चली गई। आज शिक्षा सेवा नहीं, बल्कि बहु-अरब रुपये का उद्योग बन चुकी है। कोचिंग संस्थान “रैंक फैक्ट्री” में बदल गए हैं, स्कूल सामाजिक प्रतिष्ठा के केंद्र बन गए हैं और बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाने लगा कि “अच्छे अंक ही सम्मान हैं” और “सरकारी नौकरी ही जीवन की अंतिम सफलता है।”
इसके विपरीत भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा का आधार जीवन निर्माण था। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र, आत्मसंयम, राष्ट्रधर्म, सेवा, आध्यात्मिक संतुलन, कौशल और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का विकास था। गुरु और शिष्य का संबंध व्यापारिक नहीं, बल्कि पारिवारिक और संस्कार आधारित होता था। शिक्षा को “विद्या दान” कहा जाता था, न कि “उद्योग।” किसी विद्यार्थी का मूल्य उसके अंकों से नहीं, बल्कि उसके गुण, ज्ञान, शौर्य और संस्कारों से आँका जाता था। राष्ट्रवादी चिंतक मानते हैं कि जब तक भारत शिक्षा को पुनः भारतीयता, संस्कार, योग, नैतिकता और जीवन कौशल से नहीं जोड़ेगा, तब तक केवल पाठ्यक्रम बदल देने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
आज भारत की रोजगार संरचना भी इस संकट को और गंभीर बनाती है। भारत की कुल जनसंख्या लगभग 143 से 144 करोड़ के बीच मानी जा रही है, जिनमें लगभग 95 से 100 करोड़ लोग 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में आते हैं। किंतु पूरे देश में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सार्वजनिक उपक्रम, सेना, पुलिस, शिक्षा विभाग और अन्य सरकारी क्षेत्रों को मिलाकर कुल सरकारी रोजगार लगभग 2 से 2.3 करोड़ के बीच हैं। अर्थात भारत की वयस्क आबादी में केवल लगभग 2 प्रतिशत लोगों को ही प्रत्यक्ष सरकारी नौकरी मिल सकती है। इसके विपरीत भारत का लगभग 90 प्रतिशत कार्यबल असंगठित क्षेत्र में कार्य करता है। कृषि, निर्माण कार्य, छोटे व्यापार, परिवहन, दिहाड़ी श्रम, घरेलू सेवाएँ, स्वरोजगार और छोटे उद्योगों में करोड़ों लोग लगे हुए हैं। फिर भी सामाजिक मानसिकता यह बनी हुई है कि “सरकारी नौकरी नहीं मिली तो जीवन असफल है।” यही मानसिकता लाखों युवाओं को वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्र में फँसाए रखती है।
भारत की तुलना यदि चाइना से की जाए तो अंतर और स्पष्ट दिखाई देता है। चीन ने अपनी शिक्षा नीति को सीधे राष्ट्रशक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और औद्योगिक उत्पादन से जोड़ा। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण करने वाले तकनीकी मानव संसाधन तैयार करना बना। चीन ने विज्ञान, तकनीक, रक्षा उत्पादन, मैन्युफैक्चरिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों को शिक्षा से सीधे जोड़ा। परिणामस्वरूप आज चीन विश्व का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग केंद्र बन चुका है। हुआवेई, बीवायडी, और जियोमी जैसी कंपनियाँ केवल उद्योग नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी शिक्षा और औद्योगिक नीति की उपज हैं।
इसके विपरीत भारत लंबे समय तक डिग्री, प्रमाणपत्र और प्रतियोगी परीक्षाओं के जाल में उलझा रहा। यहाँ बच्चों को उत्पादन, कौशल, कृषि नवाचार, तकनीकी निर्माण और उद्यमिता की ओर प्रेरित करने के बजाय नौकरी की कतार में खड़ा किया गया। परिणामस्वरूप लाखों डिग्रीधारी बेरोजगार तैयार हुए, जबकि उद्योगों को कुशल मानव संसाधन की कमी महसूस होती रही।
आज़ादी के बाद के दशकों में आत्महत्या के मामलों का स्वरूप भी इसी परिवर्तन को दर्शाता है। 1950 से 1970 के बीच आत्महत्या के आँकड़ों का व्यवस्थित रिकॉर्ड सीमित था, किंतु सामाजिक और आर्थिक कारण प्रमुख थे। 1980 के दशक में बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की संस्कृति तेजी से बढ़ी। 1990 के दशक में उदारीकरण और निजीकरण के बाद कोचिंग उद्योग का विस्तार हुआ। 2000 के बाद IIT-JEE, मेडिकल और सरकारी नौकरियों की प्रतिस्पर्धा ने अभूतपूर्व मानसिक दबाव पैदा किया। 2010 के बाद सोशल मीडिया तुलना, बेरोजगारी, पारिवारिक अपेक्षाएँ और शिक्षा का व्यापारीकरण इस संकट को और गहरा करते गए। कोविड काल के बाद स्थिति और भयावह हो गई जब ऑनलाइन शिक्षा, आर्थिक असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने विद्यार्थियों के मानसिक संतुलन को प्रभावित किया।
आज आवश्यकता केवल शिक्षा सुधार की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मानसिकता परिवर्तन की है। भारत को ऐसी शिक्षा चाहिए जो बच्चों को केवल अंक नहीं, बल्कि जीवन जीना सिखाए। ऐसी शिक्षा जो नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार उत्पन्न करने वाले युवा तैयार करे। ऐसी शिक्षा जिसमें योग, ध्यान, नैतिक शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा, कौशल विकास, कृषि तकनीक, रक्षा निर्माण, उद्यमिता और स्थानीय उत्पादन को समान महत्व मिले। भारत को अपने युवाओं को यह समझाना होगा कि जीवन किसी परीक्षा परिणाम से बड़ा है, असफलता अंत नहीं बल्कि अनुभव है और राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारी नौकरी से नहीं होता।
यदि भारत वास्तव में विश्वगुरु बनना चाहता है तो उसे अपनी शिक्षा की आत्मा पुनः प्राप्त करनी होगी। आधुनिक विज्ञान और तकनीक आवश्यक हैं, किंतु उनके साथ भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, आत्मसंयम और राष्ट्रधर्म का संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। अन्यथा अंक, रैंक और प्रतियोगिता की यह अंधी दौड़ आने वाली पीढ़ियों से उनका बचपन, उनका आत्मविश्वास और उनका जीवन छीनती रहेगी, जबकि भारत की सनातन सभ्यता हमेशा से मनुष्य को केवल अर्थ कमाने की मशीन नहीं, बल्कि चेतना, संस्कार और राष्ट्रशक्ति का वाहक मानती रही है।
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दिवाकर की दुनाली से

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