IPL की असली कीमत कौन चुका रहा? - दिवाकर शर्मा
आँकड़े बताते हैं कि IPL की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। 2008 में लगभग 10 करोड़ भारतीय दर्शक IPL से जुड़े थे। उस समय भारत की कुल आबादी लगभग 121 करोड़ थी। अर्थात देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा IPL देख रहा था। विश्व स्तर पर लगभग 13 करोड़ दर्शक इस टूर्नामेंट तक पहुँचे थे, जो उस समय विश्व जनसंख्या का लगभग 2 प्रतिशत था। 2009 में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित होने के बावजूद IPL के भारतीय दर्शक लगभग 12 करोड़ और वैश्विक दर्शक लगभग 15 करोड़ तक पहुँच गए। 2010 में यह संख्या बढ़कर लगभग 14 करोड़ भारतीय और 17 करोड़ वैश्विक दर्शकों तक जा पहुँची। 2011 तक भारत की लगभग 13 प्रतिशत आबादी IPL देखने लगी थी। 2012 और 2013 में स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाज़ी के बड़े खुलासों ने पूरे देश को झकझोर दिया, लेकिन इसके बावजूद IPL की लोकप्रियता पर स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा। 2014 और 2015 तक यह केवल क्रिकेट प्रतियोगिता नहीं रह गया था, बल्कि एक विशाल मनोरंजन उद्योग में बदल चुका था। लगभग 19 करोड़ भारतीय दर्शक और 30 करोड़ से अधिक वैश्विक दर्शक इससे जुड़ चुके थे।
फिर 2016 आया और यही वह वर्ष था जब IPL वास्तव में भारत के सामाजिक ढाँचे में गहराई तक प्रवेश कर गया। सस्ते इंटरनेट, मोबाइल डेटा और डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्मों ने IPL को गाँव-गाँव पहुँचा दिया। भारतीय दर्शकों की संख्या अचानक लगभग 35 करोड़ तक पहुँच गई। भारत की लगभग 26 प्रतिशत आबादी IPL देखने लगी। 2017 में लगभग 41 करोड़ भारतीय और 50 करोड़ वैश्विक दर्शक IPL से जुड़े। 2018 और 2019 तक यह संख्या लगातार बढ़ती रही और भारत की लगभग 36 प्रतिशत आबादी IPL देखने लगी। 2020 के कोविड काल में जब पूरा देश घरों में बंद था, तब IPL को एक “राष्ट्रीय मनोरंजन” के रूप में प्रस्तुत किया गया। लगभग 40 करोड़ से अधिक भारतीय और 80 करोड़ वैश्विक दर्शक IPL से जुड़े। 2023 में मुफ्त डिजिटल स्ट्रीमिंग ने IPL को विस्फोटक रूप से बढ़ा दिया। ग्रामीण भारत तक इसकी पहुँच हो गई। 2025 तक स्थिति यह हो गई कि भारत में लगभग 100 करोड़ combined viewers और विश्व स्तर पर लगभग 1 अरब cumulative दर्शकों की reach का दावा किया जाने लगा। अर्थात भारत की लगभग 68 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में IPL से जुड़ चुकी थी। विश्व की लगभग 12 से 13 प्रतिशत आबादी तक इसकी पहुँच हो गई।
यदि केवल आँकड़ों के आधार पर देखें तो स्पष्ट है कि IPL की लोकप्रियता में गिरावट नहीं आई, बल्कि वह निरंतर बढ़ती गई। लेकिन राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से प्रश्न केवल लोकप्रियता का नहीं होता। प्रश्न यह होता है कि क्या कोई चीज़ राष्ट्र के चरित्र को मजबूत कर रही है या उसे खोखला कर रही है? क्या वह समाज को अनुशासित बना रही है या उसे भोगवाद, लालच और मानसिक गुलामी की ओर धकेल रही है? और जब हम IPL को इस दृष्टि से देखते हैं, तब तस्वीर भयावह दिखाई देती है।
जिस खेल को कभी अनुशासन, राष्ट्रगौरव और चरित्र निर्माण का माध्यम माना जाता था, वही खेल आज रातभर चलने वाले विज्ञापनों, शराब-सरीखी betting संस्कृति, अश्लील मनोरंजन, फिल्मी चकाचौंध और करोड़ों-अरबों के जुए के बाजार में बदल चुका है। IPL के साथ सट्टेबाज़ी का जो जाल फैला, उसने भारत के लाखों युवाओं को धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया। 2013 का स्पॉट फिक्सिंग कांड केवल एक घटना नहीं था, बल्कि वह इस बात का सार्वजनिक प्रमाण था कि IPL के भीतर खेल भावना से अधिक धनबल और सट्टा नेटवर्क सक्रिय हो चुके हैं। बड़े-बड़े नाम सामने आए, खिलाड़ियों पर आरोप लगे, टीम अधिकारियों पर प्रश्न उठे, गिरफ्तारियाँ हुईं, लेकिन कुछ समय बाद पूरा मामला फिर मनोरंजन की चमक में दब गया।
इसके बाद online betting apps, Telegram betting groups, WhatsApp satta panels और विदेशी सट्टा नेटवर्क ने IPL को केवल खेल नहीं रहने दिया। दिल्ली पुलिस, महाराष्ट्र पुलिस, तेलंगाना पुलिस, मध्यप्रदेश पुलिस और देश की अनेक एजेंसियों ने हजारों लोगों को IPL betting racket में गिरफ्तार किया। 2019 से 2022 के बीच केवल दिल्ली में हजारों betting cases दर्ज हुए। करोड़ों रुपये का हवाला नेटवर्क पकड़ा गया। लेकिन दूसरी ओर IPL का प्रचार और भी आक्रामक होता गया। युवाओं को यह समझाया जाने लगा कि “एक क्लिक में पैसा कमाओ”, “अपनी टीम बनाओ”, “अपना भाग्य आज़माओ”। खेल धीरे-धीरे जुए की मानसिकता में बदलता गया।
और इसका सबसे भयावह प्रभाव समाज पर दिखाई देने लगा। तेलंगाना में betting losses के कारण आत्महत्या के मामले सामने आए। उत्तर प्रदेश में IPL betting में पैसा हारने के बाद लोगों द्वारा आत्महत्या की खबरें आईं। कई परिवार कर्ज में डूब गए। अनेक युवाओं ने instant money की लालसा में अपने भविष्य को दांव पर लगा दिया। सोशल मीडिया influencers और तथाकथित celebrities betting apps का प्रचार करने लगे। जिस राष्ट्र ने युवाओं को स्वामी विवेकानंद, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे आदर्श दिए थे, उसी राष्ट्र के युवाओं को अब “फैंटेसी करोड़पति” बनने का सपना दिखाया जाने लगा।
राष्ट्रवादी दृष्टि से सबसे बड़ा संकट केवल सट्टेबाज़ी नहीं है। सबसे बड़ा संकट यह है कि IPL ने भारत के खेल चरित्र को बदल दिया। कभी भारत में खेल राष्ट्रगौरव का विषय हुआ करता था। खिलाड़ी देश के लिए खेलते थे। खेल त्याग, अनुशासन और संघर्ष का प्रतीक था। लेकिन IPL के दौर में खेल धीरे-धीरे बाजार की वस्तु बन गया। खिलाड़ियों की बोली लगने लगी। राष्ट्रभक्ति की जगह franchise loyalty ने ले ली। युवा अब तिरंगे से अधिक franchise jersey से जुड़ने लगे। क्रिकेट अब तपस्या नहीं रहा, वह entertainment package बन गया। cheerleaders, late-night glamour, aggressive advertising और betting culture ने खेल की आत्मा को घायल किया।
यह भी विडंबना है कि जिस भारत ने दुनिया को योग, संयम और धर्म का संदेश दिया, उसी भारत में आज करोड़ों युवा रातभर IPL देखकर, betting apps पर पैसा लगाकर और virtual gambling में डूबकर अपनी मानसिक ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं। IPL के नाम पर कंपनियाँ अरबों कमा रही हैं, broadcasters हजारों करोड़ के rights बेच रहे हैं, betting syndicates फैल रहे हैं, लेकिन समाज क्या पा रहा है? बढ़ती मानसिक अशांति, कर्ज, लालच और भोगवाद।
हाँ, यह सत्य है कि IPL ने भारतीय क्रिकेट को आर्थिक रूप से मजबूत किया। अनेक खिलाड़ियों को अवसर मिले। छोटे शहरों के प्रतिभाशाली युवा सामने आए। भारत विश्व क्रिकेट की आर्थिक महाशक्ति बना। लेकिन राष्ट्रवादी दृष्टिकोण केवल आर्थिक लाभ नहीं देखता। वह यह भी देखता है कि क्या उस आर्थिक शक्ति के साथ राष्ट्र का नैतिक चरित्र भी मजबूत हुआ या नहीं।
आज स्थिति यह है कि IPL भारत का सबसे बड़ा खेल आयोजन नहीं, बल्कि सबसे बड़ा मनोरंजन-व्यापार तंत्र बन चुका है। उसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं। 2008 में जहाँ भारत की केवल 8 प्रतिशत आबादी IPL से जुड़ी थी, वहीं 2025 तक यह अनुपात लगभग 68 प्रतिशत तक पहुँच गया। विश्व स्तर पर भी इसकी पहुँच कई गुना बढ़ी। लेकिन उसी अवधि में betting networks, online gambling, fixing scandals, आर्थिक अपराध और आत्महत्या जैसी घटनाएँ भी तेजी से बढ़ीं। यही वह कटु सत्य है जिसे चमकदार विज्ञापनों और बॉलीवुड की रोशनी के पीछे छिपाने का प्रयास किया जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत IPL को केवल आर्थिक सफलता के चश्मे से न देखे, बल्कि यह भी विचार करे कि क्या यह मॉडल भारतीय संस्कृति, युवाओं के चरित्र और राष्ट्र की मानसिक शक्ति के लिए उचित है? क्योंकि कोई भी राष्ट्र केवल धन से महान नहीं बनता। राष्ट्र महान बनता है अपने चरित्र, अनुशासन, नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना से। और यदि खेल ही समाज को जुए, लालच और भोगवाद की ओर ले जाने लगे, तो वह खेल नहीं रहता, वह धीरे-धीरे सामाजिक कुरुति का रूप लेने लगता है।

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