नेता नहीं, नायक चुनता भारत - दिवाकर शर्मा
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तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर सिनेमा का परदा सत्ता के गलियारों तक पहुँचता दिखाई दे रहा है। दक्षिण भारत के सुपरस्टार विजय को लेकर उनके समर्थकों के बीच ऐसा वातावरण तैयार किया जा रहा है मानो वे आने वाले समय में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने वाले हों। फिल्मों में भ्रष्ट व्यवस्था को चुनौती देने वाला “जननायक” अब राजनीतिक मंचों पर भी उसी छवि के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। विशाल फैन क्लब राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल रहे हैं, फिल्मी संवाद राजनीतिक नारों में परिवर्तित हो रहे हैं और सिनेमा हॉल की तालियाँ वोटों की संभावनाओं में बदलती दिखाई दे रही हैं। दक्षिण भारत में यह कोई नई कहानी नहीं है। यहाँ अभिनेता केवल कलाकार नहीं रहते, वे भावनाओं के शासक बन जाते हैं। कभी एम. जी. रामाचन्द्रन को जनता ने परदे से उठाकर मुख्यमंत्री बना दिया, फिर जे. जयाललिता ने उसी विरासत को आगे बढ़ाया। आंध्र प्रदेश में एन टी रामा राव ने फिल्मों के देवतुल्य नायक की छवि को सीधे राजनीतिक सत्ता में बदल दिया। अब विजय को लेकर भी वही वातावरण तैयार होता दिखाई दे रहा है, जहाँ अभिनेता और नेता के बीच की रेखा लगभग समाप्त हो जाती है।
लेकिन यह कहानी केवल तमिलनाडु की नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहाँ आज़ादी के बाद राजनीति और सिनेमा ने मिलकर जनता की मानसिकता को आकार दिया। 1947 में भारत अंग्रेजों से तो आज़ाद हो गया, लेकिन इसके बाद सबसे बड़ा संघर्ष केवल सीमाओं की रक्षा का नहीं था, बल्कि भारतीय मन को दिशा देने का था। यह दिशा संसद ने जितनी नहीं दी, उससे कहीं अधिक सिनेमा ने दी। नेता मंचों से भाषण देते रहे, लेकिन अभिनेता सीधे जनता के घरों, भावनाओं और सपनों में उतरते चले गए। धीरे-धीरे सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं रहा, वह मानसिकता निर्माण की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन गया।
यदि कोई व्यक्ति भारतीय समाज को समझना चाहता है, तो उसे केवल चुनाव परिणाम नहीं देखने चाहिए, बल्कि उसे यह देखना चाहिए कि किस दशक में कौन-सी फिल्में सुपरहिट हुईं, किन अभिनेताओं को देवता बनाया गया और किन विचारों को “प्रगतिशील” कहकर जनता के मन में उतारा गया। क्योंकि भारत में कई बार फिल्में भविष्य की राजनीति का ट्रेलर साबित हुई हैं।
आजादी के शुरुआती वर्षों में देश पर नेहरूवादी समाजवाद और वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव था। उसी समय मुंबई फिल्म उद्योग में भी प्रगतिशील लेखक संघ और IPTA जैसे संगठनों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। फिल्मों में गरीब बनाम अमीर, मजदूर बनाम पूंजीपति, धर्म बनाम आधुनिकता और परंपरा बनाम तथाकथित वैज्ञानिक सोच को प्रमुखता दी जाने लगी। यह केवल संयोग नहीं था। पटकथाएँ लिखने वाले अनेक लेखक मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थे। परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे फिल्मों में राष्ट्रवाद की जगह “व्यवस्था विरोध” और “परंपराओं पर प्रश्न” प्रमुख विषय बन गए।
राज कपूर की फिल्मों में समाजवादी भावनाएँ स्पष्ट दिखाई देती थीं। “श्री 420” का गरीब नायक पूंजीवादी समाज से संघर्ष करता दिखाई देता था। गुरु दत्त की फिल्मों में व्यवस्था से निराश व्यक्ति था। दिलीप कुमार के किरदार संघर्षशील आम आदमी के प्रतीक बने। फिर 70 का दशक आया। देश इमरजेंसी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से जूझ रहा था। उसी समय अमिताभ बच्चन “एंग्री यंग मैन” बनकर उभरे। जनता ने उनके भीतर अपना गुस्सा देखा। फिल्मों में कानून को तोड़कर न्याय करने वाला नायक लोकप्रिय होने लगा। यह वही समय था जब जनता के भीतर व्यवस्था के प्रति घृणा गहराने लगी थी।
धीरे-धीरे भारतीय फिल्मों में हिंदू प्रतीकों और पारंपरिक मूल्यों को हास्य, पाखंड या पिछड़ेपन से जोड़कर दिखाने का चलन बढ़ा। मंदिर का पुजारी लालची, साधु ढोंगी और धार्मिक व्यक्ति कट्टर दिखाया जाने लगा, जबकि तथाकथित विद्रोही पात्र को महान और आधुनिक बताया गया। यह सब केवल मनोरंजन नहीं था। यह दर्शकों के अवचेतन में विचारों का बीजारोपण था। फिल्मों ने यह तय करना शुरू कर दिया कि नई पीढ़ी किसे “हीरो” मानेगी और किसे “खलनायक”।
लेकिन भारतीय सिनेमा पूरी तरह एक दिशा में नहीं बहा। समय-समय पर राष्ट्रवादी चेतना भी परदे पर प्रकट होती रही। मनोज कुमार को “भारत कुमार” यूँ ही नहीं कहा गया। “उपकार”, “पूरब और पश्चिम” और “क्रांति” जैसी फिल्मों ने भारतीय संस्कृति, किसान, सेना और राष्ट्रभक्ति को केंद्र में रखा। 1990 के दशक में जब आतंकवाद और पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा चरम पर थी, तब सनी देओल की “बॉर्डर” और “गदर” ने राष्ट्रवाद की नई लहर पैदा की। बाद में अक्षय कुमार ने “बेबी”, “हॉलिडे”, “एयरलिफ्ट” और “केसरी” जैसी फिल्मों के माध्यम से सेना, राष्ट्र और सुरक्षा विषयों को लोकप्रिय बनाया। अनुपम खेर जैसे कलाकारों ने खुलकर राष्ट्रवादी पक्ष रखा और इसके कारण उन्हें फिल्म उद्योग के भीतर विरोध भी झेलना पड़ा।
दूसरी ओर शबाना आज़मी, जावेद अख्तर, नसीरुद्दीन शाह और स्वरा भास्कर जैसे कलाकार राजनीतिक और वैचारिक बहसों में लगातार सक्रिय दिखाई दिए। असहिष्णुता, राष्ट्रवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार विरोध इनके वक्तव्यों के प्रमुख विषय बने। कुछ कलाकारों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को लेकर विवादित टिप्पणियाँ कीं। यह प्रभाव केवल फिल्मों तक सीमित नहीं था, बल्कि करोड़ों प्रशंसकों की मानसिकता तक पहुँच रहा था। फिर प्रश्न उठता है कि आखिर भारत में अभिनेता इतना प्रभावशाली क्यों हो जाता है? इसका उत्तर भारतीय मनोविज्ञान में छिपा है। भारत सदियों से नायक-पूजक समाज रहा है। राम, कृष्ण, अर्जुन, महाराणा प्रताप, शिवाजी, भगत सिंह, भारतीय समाज हमेशा किसी “नायक” के पीछे खड़ा होता आया है। सिनेमा ने इसी भावनात्मक संरचना को समझ लिया। अभिनेता अब केवल कलाकार नहीं रहे, वे आधुनिक युग के “दृश्य देवता” बन गए। उनके संवाद युवाओं की भाषा बन गए, उनका पहनावा फैशन बन गया और उनका विचार राजनीतिक रुझान बन गया।
दक्षिण भारत ने इस शक्ति को सबसे पहले समझा। तमिलनाडु में सिनेमा सीधे राजनीति की सीढ़ी बन गया। एम. करूणानिधि जैसे नेताओं ने फिल्मों के संवादों में द्रविड़ राजनीति और सामाजिक संदेशों को पिरोया। एम. जी. रामाचन्द्रन ने फिल्मों में गरीबों के मसीहा की छवि बनाई और जनता ने उसी छवि को वास्तविक जीवन में भी सच मान लिया। यही मॉडल बाद में जे. जयाललिता के साथ भी दिखाई दिया। आंध्र प्रदेश में एन. टी. रामा राव ने फिल्मों में भगवान राम और कृष्ण की भूमिकाएँ निभाईं। जनता ने उन्हें केवल अभिनेता नहीं, “दैवीय व्यक्तित्व” की तरह देखना शुरू कर दिया। परिणाम यह हुआ कि वे सीधे मुख्यमंत्री बन गए।
उत्तर भारत का बॉलीवुड लंबे समय तक तथाकथित सेक्युलर और ग्लोबल छवि बनाने में लगा रहा, जबकि दक्षिण भारतीय सिनेमा ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पूरी तरह छोड़ा नहीं। यही कारण है कि आरआरआर, काँटारा, पुष्पा: The Rise और K.G.F: Chapter 1 जैसी फिल्मों ने पूरे भारत में अभूतपूर्व प्रभाव डाला। इन फिल्मों में मिट्टी, परंपरा, शक्ति, धर्म, सम्मान और सांस्कृतिक गौरव का ऐसा मिश्रण था, जिसकी तलाश भारतीय दर्शक लंबे समय से कर रहे थे। विशेषकर “कांतारा” में लोकदेवता और परंपरा का चित्रण यह संकेत देता है कि भारत की जनता अपनी जड़ों से जुड़ी कहानियों को फिर से स्वीकार करने लगी है।
यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सिनेमा केवल समाज का दर्पण है, या वह समाज को अपनी इच्छानुसार ढाल भी रहा है? यदि फिल्मों में लगातार एक विशेष प्रकार की जीवनशैली, विचारधारा और राजनीतिक सोच दिखाई जाए, तो क्या वह आने वाली पीढ़ियों की मानसिकता नहीं बदलती? जब फिल्मों में परिवार को बोझ, धर्म को अंधविश्वास और पश्चिमी जीवनशैली को आधुनिकता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका प्रभाव धीरे-धीरे समाज पर दिखाई देने लगता है। राजनीति ने भी इस शक्ति को समझा। इसलिए चुनावों में फिल्मी सितारों की भीड़ दिखाई देती है। कभी कांग्रेस ने फिल्मी चेहरों का उपयोग किया, तो बाद में अन्य दलों ने भी उसी मॉडल को अपनाया। जनता के मन में अभिनेता का प्रभाव इतना गहरा हो चुका था कि कई बार लोग नेता को नहीं, उसके साथ खड़े अभिनेता को देखकर वोट देने लगे। यही कारण है कि राजनीतिक दल अब केवल घोषणापत्र नहीं बनाते, वे “इमेज” बनाते हैं। और इस इमेज निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम सिनेमा और मीडिया बन चुका है।
आज OTT और डिजिटल प्लेटफॉर्म के युग में यह संघर्ष और तीखा हो चुका है। अब युद्ध केवल बॉक्स ऑफिस का नहीं, मानसिकता का है। वेब सीरीज और फिल्मों के माध्यम से नई पीढ़ी के भीतर विचारों को स्थापित किया जा रहा है। एक ओर भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और सभ्यता की पुनर्स्थापना की कोशिशें हैं, तो दूसरी ओर वैश्विक उदारवाद, पहचान की राजनीति और वैचारिक प्रयोगों की नई धारा। परदे पर चल रही कहानी अब केवल कहानी नहीं, आने वाले भारत के मानस का प्रारूप है। शायद यही कारण है कि भारत में सिनेमा और राजनीति का संबंध हमेशा रहस्यमय भी रहेगा और खतरनाक भी। क्योंकि सत्ता संसद में बनती है, लेकिन मानसिकता… परदे पर।
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दिवाकर की दुनाली से

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