लेबल

परिवर्तन कैसा हो? - विषभ आर्य

 

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समय के साथ युग बदलते हैं, मनुष्य की दिनचर्या बदलती है, भोजन बदलता है, विचार बदलते हैं, शिक्षा की पद्धतियाँ बदलती हैं और समाज का स्वरूप भी बदल जाता है। संसार में यह परिवर्तन सदैव चलता रहता है। किन्तु प्रश्न यह है कि हर परिवर्तन क्या उचित होता है? क्या हर बदलाव मनुष्य और समाज को सही दिशा देता है?

आज का मनुष्य आधुनिकता की दौड़ में बहुत आगे निकल आया है, परन्तु इस दौड़ में वह अपनी संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। भौतिक सुखों की चाह, क्रोध, अहंकार, स्वार्थ और व्यभिचार ने मनुष्य को भीतर से कमजोर बना दिया है। परिणाम यह हुआ कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप और ईश्वर से दूर होता चला गया। हम कहते हैं कि परिवर्तन जीवन का नियम है, परन्तु वह परिवर्तन जो मनुष्य को अपने धर्म, संस्कृति और नैतिकता से विमुख कर दे, वह परिवर्तन विनाश का कारण बनता है। ऐसा परिवर्तन समाज को पतन की ओर ले जाता है। जब मनुष्य अपनी जड़ों को भूल जाता है, तब उसका आत्मबल भी समाप्त होने लगता है।

वास्तविक परिवर्तन वह है जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाए। जो उसके भीतर ज्ञान, साहस, संयम और संस्कारों का निर्माण करे। ऐसा परिवर्तन जो समाज में सद्भावना, राष्ट्रभक्ति और नैतिकता को मजबूत करे, वही परिवर्तन स्वागत योग्य है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ। अपने ऋषि-मुनियों, महापुरुषों और क्रांतिकारियों के आदर्शों को अपनाएँ। अपने जीवन में सत्य, अनुशासन, परिश्रम और संस्कारों का समावेश करें।

यदि परिवर्तन हमें ओजस्वी, तेजस्वी, ज्ञानवान और चरित्रवान बनाता है, तो वह परिवर्तन समाज और राष्ट्र दोनों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा। ऐसा परिवर्तन ही मनुष्य को आत्मबल देता है और राष्ट्र को मजबूत बनाता है। इसलिए परिवर्तन अवश्य हो, लेकिन ऐसा परिवर्तन जो मनुष्य को पतन नहीं, बल्कि उत्कर्ष की ओर ले जाए।

एक टिप्पणी भेजें

एक टिप्पणी भेजें