डीप स्टेट की गिरफ्त में शिवपुरी? - दिवाकर शर्मा
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क्या शिवपुरी में भी कोई डीप स्टेट है, या यह केवल एक भ्रम है? यह प्रश्न सुनने में भले ही किसी राजनीतिक थ्रिलर फिल्म की कहानी जैसा लगे, लेकिन यदि शिवपुरी के इतिहास, वर्तमान और लगातार बनी हुई कुछ समस्याओं को ध्यान से देखा जाए तो यह सवाल कई लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से उठ सकता है।
शिवपुरी को बसाने वाले सिंधिया राजवंश ने बहुत पहले ही इस क्षेत्र की एक बड़ी समस्या को पहचान लिया था। उन्होंने समझ लिया था कि यहां की भौगोलिक और भूगर्भीय परिस्थितियों के कारण पानी का संकट कभी भी गंभीर रूप ले सकता है। यही कारण था कि शहर और उसके आसपास अनेक तालाबों का निर्माण कराया गया। उस समय तालाब केवल जलस्रोत नहीं थे, बल्कि पूरे शहर की जीवनरेखा थे।
लेकिन फिर क्या हुआ? धीरे-धीरे तालाब सिकुड़ने लगे। कहीं उन पर अतिक्रमण हुआ, कहीं उनकी जमीनों का स्वरूप बदल गया, कहीं उनके कैचमेंट क्षेत्र समाप्त कर दिए गए और कहीं उन स्थानों पर कॉलोनियां विकसित हो गईं। आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से कई निर्माण समय के साथ वैध भी हो गए। सवाल यह है कि जिन जलाशयों को भविष्य के संकट को देखते हुए बनाया गया था, वे आखिर किसकी आंखों के सामने गायब होते गए?
पानी का संकट बढ़ा तो समाधान के नाम पर गली-गली बोरवेल खोदे गए। जमीन के नीचे से पानी निकाला जाता रहा। जब भूजल स्तर और नीचे चला गया तो टैंकरों का दौर शुरू हुआ। पानी एक जरूरत से बढ़कर कारोबार बन गया। जनता की प्यास बुझाने के नाम पर राजनीति भी हुई, आंदोलन भी हुए, वादे भी हुए और चुनाव भी लड़े गए। कुछ युवाओं ने जल संरक्षण और स्थायी समाधान के लिए आंदोलन शुरू किया। लोगों में उम्मीद जगी कि शायद अब कुछ बदलेगा। लेकिन समय बीता और वह आंदोलन भी धीरे-धीरे शांत हो गया। शहर की प्यास वहीं की वहीं रह गई।
सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि जिन लोगों के कार्यकाल में करोड़ों रुपये की जल परियोजनाओं पर सवाल उठे, जिन योजनाओं के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ, उन्हीं लोगों को समय-समय पर विकास का प्रतीक बताकर फिर से नेतृत्व सौंपने की मांग क्यों उठती है? क्या जनता भूल जाती है, या फिर कोई ऐसा तंत्र है जो स्मृतियों से अधिक कथाओं को महत्व देता है?
अब पानी से आगे बढ़ते हैं। शिवपुरी की दूसरी बड़ी समस्या है अनियंत्रित भू-अतिक्रमण और अव्यवस्थित शहरी विस्तार। शहर के पुराने लोगों से बात कीजिए। वे आपको ऐसे अनेक स्थान बताएंगे जहां कभी बरसात का पानी जमा होता था, जहां प्राकृतिक नाले बहते थे, जहां जमीन दलदली थी या जो क्षेत्र जल निकासी के लिए महत्वपूर्ण थे। आज उन्हीं स्थानों पर मकान, बाजार और कॉलोनियां दिखाई देती हैं।
कई क्षेत्रों में वर्षों पहले यूकेलिप्टस के पेड़ लगाए गए थे। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो यूकेलिप्टस एक ऐसी प्रजाति है जो अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पानी का उपयोग करती है और नमी वाले क्षेत्रों में जल सोखने की क्षमता के कारण कई स्थानों पर लगाई जाती रही है। हालांकि आधुनिक पर्यावरण विशेषज्ञ इसकी उपयोगिता और दुष्प्रभावों पर अलग-अलग मत रखते हैं, लेकिन यह तथ्य दर्ज है कि इसका प्रयोग कई जगह जलभराव वाले क्षेत्रों को अपेक्षाकृत सूखा बनाने के उद्देश्य से किया गया। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिन क्षेत्रों में कभी दलदली या अत्यधिक नमी वाली परिस्थितियां थीं, वहां आज पक्के निर्माण कैसे खड़े हो गए? क्या यह केवल प्राकृतिक परिवर्तन था या सुनियोजित मानवीय हस्तक्षेप?
यहां एक और दिलचस्प बात दिखाई देती है। जो लोग अनैतिक और अवैध तरीकों से धन कमाने में सफल होते हैं, वे अक्सर समझ जाते हैं कि केवल धन पर्याप्त नहीं है। प्रभाव चाहिए। संरक्षण चाहिए। निर्णय प्रक्रिया तक पहुंच चाहिए। और इसके लिए सबसे आसान रास्ता राजनीति, सामाजिक संगठनों, व्यापारिक मंचों और प्रभावशाली समूहों तक पहुंच बनाना होता है।
क्या शिवपुरी में भी वर्षों से ऐसा ही होता आया है? क्या कुछ लोगों ने पहले जमीनों पर प्रभाव बनाया, फिर व्यवस्था पर प्रभाव बनाया और बाद में राजनीति पर प्रभाव स्थापित किया? क्या यही कारण है कि कई बार ईमानदार और स्वतंत्र सोच रखने वाले लोग किनारे कर दिए जाते हैं, जबकि प्रभावशाली समूहों के अनुकूल लोगों को लगातार आगे बढ़ाया जाता है?
यहां किसी एक व्यक्ति, दल या संगठन की बात नहीं हो रही। क्योंकि यदि ध्यान से देखा जाए तो ऐसी मानसिकता किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं होती। यह हर उस जगह पहुंच जाती है जहां से प्रभाव प्राप्त किया जा सकता हो। राजनीति, व्यापार, सामाजिक संगठन, धार्मिक मंच, ठेकेदारी, संस्थाएं सब जगह।
यही वह बिंदु है जहां "डीप स्टेट" शब्द चर्चा में आता है। डीप स्टेट का अर्थ किसी गुप्त संगठन से नहीं है। इसका अर्थ उस मानसिकता से है जो यह मानने लगती है कि व्यवस्था कानून से नहीं, प्रभाव से चलती है। नियम सबके लिए नहीं होते। फैसले संस्थाएं नहीं, नेटवर्क लेते हैं। जनता केवल वही देखती है जो उसे दिखाया जाता है।
यदि अपराध बढ़ते हैं और लोग उसे सामान्य मानने लगते हैं… यदि बेरोजगारी बढ़ती है और लोग उसे नियति मान लेते हैं… यदि पानी का संकट वर्षों तक बना रहता है और लोग उसे भाग्य समझ लेते हैं… यदि अतिक्रमण को विकास और अव्यवस्था को प्रगति का नाम दिया जाने लगे… तो क्या यह केवल प्रशासनिक विफलता है, या फिर समाज की सोच को धीरे-धीरे उसी दिशा में ढाल दिया गया है?
सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब लोग समस्याओं को समस्या मानना ही छोड़ देते हैं। जब यह मान लिया जाता है कि "यही तो चलता है।" जब यह मान लिया जाता है कि "सिस्टम उनसे है, वे सिस्टम से नहीं।" जब यह मान लिया जाता है कि कुछ लोगों की इच्छा ही अंतिम सत्य है। और शायद यहीं से वह अदृश्य शक्ति जन्म लेती है जिसे लोग अलग-अलग नाम देते हैं प्रभाव तंत्र, लॉबी, नेटवर्क या फिर डीप स्टेट।
प्रश्न यह नहीं है कि शिवपुरी में वास्तव में कोई डीप स्टेट है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या इस शहर की समस्याएं केवल संयोग हैं? क्या तालाबों का गायब होना, भूजल का संकट, अतिक्रमण, अव्यवस्थित विकास, बढ़ता प्रभाव तंत्र और जनता की बदलती मानसिकता एक-दूसरे से पूरी तरह असंबंधित घटनाएं हैं? या फिर इनके पीछे कोई ऐसी सोच काम करती रही है जो दिखाई कम देती है और प्रभाव अधिक डालती है?
उत्तर पाठक स्वयं खोजें। क्योंकि कई बार किसी शहर की सबसे बड़ी कहानी वह नहीं होती जो दिखाई देती है, बल्कि वह होती है जो वर्षों से सबकी आंखों के सामने घट रही होती है और फिर भी दिखाई नहीं देती।
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दिवाकर की दुनाली से

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